Hindi Upanyas Ka Stree-Path
About the book
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है। मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं। पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज। यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
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About the Book
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है।
मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं।
पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2015
- Weight
- 416 grams
- ISBN-13
- 9788126728732
- Pages
- 232
- Reading time
- ~8 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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