Kavya Ke Tattva
Author:
Aacharya Devendranath SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
प्रस्तुत पुस्तक का उद्देश्य है भारतीय दृष्टि से काव्य के उपादानों का परिचय कराना। सुगमता और संक्षिप्तता इसकी विशेषताएँ हैं। उदाहरण विषय को स्पष्ट करने के साधन हैं। अत: उनकी सटीकता तथा उपयुक्तता को महत्त्व दिया गया है और उनके चयन में सावधानी बरती गई है। इस पुस्तक में दिए गए उदाहरण विषय के स्पष्टीकरण एवं स्मरण में निस्सन्देह सहायक सिद्ध होंगे।
ISBN: 9789352211159
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘मीरा और मीरा’ छायावाद की मूर्तिमान गरिमा महीयसी महादेवी वर्मा के चार व्याख्यानों का संग्रह है। महादेवी जी ने ये व्याख्यान जयपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की राजस्थान शाखा के निमंत्रण पर दिए थे।
इन चार व्याख्यानों के शीर्षक हैं–मीरा का युग, मीरा की साधना, मीरा के गीत और मीरा का विद्रोह। इनमें महादेवी ने मध्यकालीन स्त्री की स्थिति का विशेष सन्दर्भ लेकर भक्ति, मुक्ति, आत्मनिर्णय, विद्रोह और निजपथ-निर्माण आदि को विश्लेषित किया है।
‘मीरा और मीरा’ को प्रकाशित करते हुए हमें इसलिए भी विशेष प्रसन्नता है कि यह समय अस्मिता-विमर्श का है। स्त्री-विमर्श के ‘समय विशेष’ में स्त्री-अस्मिता के दो शिखर व्यक्तित्वों का ‘रचनात्मक संवाद’ महत्त्वपूर्ण है। इन दो दीपशिखाओं के आलोक में परम्परा और आधुनिकता के जाने कितने निहितार्थ स्पष्ट होते हैं। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ की लेखिका ने ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ का गायन करने वाली रचनाकार के मन में प्रवेश किया है। यह दो समयों (मध्यकाल और आधुनिक युग) का संवाद भी है।
यह सोने पर सुहागा ही कहा जाएगा कि प्रस्तुत पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार व विमर्शकार अनामिका ने लिखी है। कहना न होगा कि यह लम्बी भूमिका एक मुकम्मल आलोचनात्मक आलेख है।
Aalok Parv
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ियाँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।
Acharya Nand Dulare Vajpeyi
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Rachna Se Samvad
- Author Name:
Malayaj
- Book Type:

- Description: मलयज की आलोचना की सबसे महत्त्वपूर्ण क्षमता है निर्णय लेना, निष्कर्ष तक पहुँचना और निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए पाठ के साथ रचना-प्रक्रिया और लेखक की अनुभूति को समझना। रचना की समीक्षा करते समय उनके लिए सिर्फ रचना ही खास नहीं बल्कि रचनाकार की अनुभूति भी खास है जिसका अध्ययन वे रचना के समानान्तर करते हैं और तत्पश्चात अपने निष्कर्ष देते हैं। रचनाकार की अनुभूति के अध्ययन करने की प्रक्रिया रचना के पाठ के समानान्तर चलती है। एक अन्य अर्थ में उनकी आलोचना अधिक रचनात्मक मालूम होती है। उनके समीक्षा लेख रचनात्मकता की पृष्ठभूमि पर खड़े होकर अपने निष्कर्षों तक पहुँचते हैं। उनके समीक्षा लेखों को पढ़ते हुए बहुधा आभास होता है कि मलयज कोई रचना लिख रहे हैं। उनके पास आलोचना की बिल्कुल नयी भाषा है इस भाषा में आलोचना का पाठ किसी रचना के पाठ सरीखा लगता है। मलयज की भाषा में अपनी बात को कहने का जोखिम लेने की क्षमता है इसलिए उनके कई लेखों के शीर्षक तक कई रचनाकारों और उनके प्रशंसक पाठकों को नागवार लगे हैं। त्रिलोचन और शमशेर पर लिखे उनके लेख इस बात की तस्दीक़ करेंगे। अपनी बात को कहने में मलयज कोई उदार रवैये की खोज में नहीं दिखते। बल्कि तल्ख़ से तल्ख़ बात को कैसे सलीके और उदारता से कहा जाए ये उन्हें आता है। आज आलोचना जिस सलीके और नएपन या विशिष्टता की चाहत रखती है वह मलयज की आलोचना हमें सिखा सकती है। मलयज रचना प्रक्रिया की सैद्धांतिकी को अपनी आलोचना में व्यवहृत करने का प्रयास करते जान पड़ते हैं। ये कुछ ऐसी बाते हैं जो उन्हें उनके समकालीनों ही नहीं बल्कि आज के और उनसे पूर्व के आलोचकों से भी विशिष्ट बनाती हैं।
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