Gyan Aur Karm
(0)
Author:
Vishnukant ShastriPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
895
716 (20% off)
Available
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...ईशावास्योपनिषद् अपने लघु कलेवर में अर्थ का विस्तृत आकाश समेटे हुए है।...सन्तों का आश्वासन है कि गुरु कृपा से पिपीलिका भी विहंगम मार्ग की अधिकारिणी हो जाती है। ईशावास्य को प्रवचन-यात्रा के प्रतिपाद में मुझे अपने गुरु ब्रह्मीभूत स्वामी अखंडानन्द सरस्वती की कृपा के सम्बल का अनुभव होता रहा, तभी तो यह वाचिक परिक्रमा पूरी हो सकी।...इस पुस्तक में जो भी है, वह गुरु जी की तथा शंकर, रामानुज, विनोबा सदृश अन्य पूर्वाचार्यों की कृपा का सुफल है...।
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...ईशावास्योपनिषद् अपने लघु कलेवर में अर्थ का विस्तृत आकाश समेटे हुए है।...सन्तों का आश्वासन है कि गुरु कृपा से पिपीलिका भी विहंगम मार्ग की अधिकारिणी हो जाती है। ईशावास्य को प्रवचन-यात्रा के प्रतिपाद में मुझे अपने गुरु ब्रह्मीभूत स्वामी अखंडानन्द सरस्वती की कृपा के सम्बल का अनुभव होता रहा, तभी तो यह वाचिक परिक्रमा पूरी हो सकी।...इस पुस्तक में जो भी है, वह गुरु जी की तथा शंकर, रामानुज, विनोबा सदृश अन्य पूर्वाचार्यों की कृपा का सुफल है...।
Book Details
-
ISBN9788180313103
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आज पूरी पृथ्वी ‘ग्लोबल वार्मिंग' की चपेट में है, जिसका प्रमुख कारण औद्योगीकरण भी है। जितनी मजबूरी आधुनिक जीवन के लिए औद्योगीकरण है उससे अधिक ज़रूरी जीवन के लिए पर्यावरण है। यदि जीवन पर संकट उत्पन्न होगा तो किसी भी तरह के उद्योग की प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी। यह सन्दर्भ-ग्रन्थ इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि औद्योगीकरण से उत्पन्न जो समस्या है, वह जीवन के प्रति कितनी भयावह है। पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण के आविर्भाव के साथ विकास के अवसर, प्रकारान्तर से उसकी गति भी बढ़ी। नई अर्थव्यवस्था पुरानी सामन्तवादी अर्थव्यवस्था से गुणात्मक रूप से भिन्न थी, क्योंकि इसमें एक ही जगह पर बहुसंख्यक व्यक्ति एक ही प्रकार का कार्य करते थे। शनैः-शनै: उसके आसपास अन्य कार्य करने हेतु उपक्रम लगते गए और इस प्रकार उद्योगों का एक संकुल एक वृहत् क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से अस्तित्व में आया। स्पष्ट है कि ऐसे संकुल तभी विकसित हुए होंगे, जब उन भूखंडों, जहाँ पर उद्योग लगे होने के स्वामी वहाँ से विस्थापित हुए हाँगे। इन नवीन उद्योगों में कार्य करने हेतु श्रमिक निश्चित ही दूसरी जगहों से विस्थापित होकर ही आए होंगे। इन समस्याओं के कारण विशुद्ध विस्थापन के तथ्य को नहीं माना जा सकता। समस्याओ के लिए निश्चित ही कहीं-न-कहीं पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण उत्तरदायी थे। इसलिए विस्थापन की समस्या की सम्यक् विवेचना हेतु आवश्यक विस्थापन अपने आप में अत्यन्त सारगर्भित, बहुअर्थी अवधारणा है।
Vakya Sanrachana Aur Vishleshan : Naye Pratiman
- Author Name:
Badrinath Kapoor
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हिन्दी की प्रकृति और प्रवृत्ति को जानना-समझना डॉ. बदरीनाथ कपूर का व्यसन रहा है। ‘बेसिक हिन्दी’, ‘परिष्कृत हिन्दी व्याकरण’, ‘हिन्दी व्याकरण की सरल पद्धति’ तथा ‘नवशती हिन्दी व्याकरण’ आदि पुस्तकें इसी व्यसन की सूचक हैं। ‘नवशती हिन्दी व्याकरण’ में कुछ नई प्रस्थापनाएँ भी की गई थीं जो परम्परा से हटकर थीं। प्रस्तुत पुस्तक क्रियाओं के सम्बन्ध में किए गए उनके चिन्तन का सुफल परिणाम है। उनका मानना है कि क्रियापदों में ही ऐसे सूत्र निहित हैं जिनके आधार पर वाक्य की संरचना की जा सकती है। उन्होंने इन सूत्रों को ‘क्रिया-निर्देश’ की संज्ञा दी है। कुल सूत्र चालीस हैं और पाँच-पाँच सूत्रों के इनके आठ सर्ग हैं। इन्हीं के आधार पर इस पुस्तक में हिन्दी वाक्यों की विशेषतः सरल वाक्यों की— संरचना करने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में वाक्य-संरचना और विश्लेषण दोनों साथ-साथ दिये गए हैं जिससे स्पष्ट हो कि क्रिया-निर्देशों और नवशती हिन्दी व्याकरण की स्थापनाओं (दोनों) का उद्देश्य एक है। हिन्दी वाक्य-संरचना के नए प्रतिमान प्रस्थापित करनेवाली डॉ. बदरीनाथ कपूर की यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक हिन्दी भाषा की सूत्रबद्धता को स्थापित करती है और सिद्ध करती है कि हिन्दी एक सुचिन्तित और सुनियोजित भाषा है। हिन्दी भाषा की अस्मिता और गरिमा की वृद्धि करनेवाली इस महत्त्वपूर्ण कृति का संयोजन वैज्ञानिक और गणितीय पद्धति पर हुआ है। छात्रों-अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी।
Hindi Katha Sahitya : Ek Drishti
- Author Name:
Satyaketu Sankrit
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‘हिन्दी कथा साहित्य : एक दृष्टि’ का प्रयोजन हिन्दी कथा साहित्य की रचनात्मक यात्रा का आलोचनात्मक विवेचन है। सत्यकेतु सांकृत ने गम्भीर अध्ययन के उपरान्त हिन्दी कथा साहित्य की दोनों शाखाओं (उपन्यास तथा कहानी) की संरचना को परखा है। 20वीं सदी के अन्तिम चरण में हिन्दी उपन्यासों की क्या स्थिति थी, इसे स्पष्ट करते हुए लेखक ने उनके सरोकारों को भी टटोला है। प्रेमचन्द, रेणु, राहुल सांकृत्यायन और अन्य रचनाकारों की कथा-यात्रा का विवरण इस पुस्तक के विभिन्न आलेखों में है।
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य की थाह लगाते हुए सत्यकेतु एक उचित निष्कर्ष निकालते हैं, ‘प्रेमचन्द भारतीय पुनर्जागरण को उसके व्यापक सन्दर्भ में देखते थे। वे समझते थे कि देश को औपनिवेशिक ग़ुलामी से तभी मुक्ति मिल सकती है जब पूरा देश सामाजिक दृष्टि से लिंग-भेद, धर्म-भेद, जाति-भेद आदि अन्तर्विरोधों से मुक्त हो।’ विभिन्न रचनाओं का ऐसा सूत्रात्मक विश्लेषण पुस्तक को विशिष्ट बनाता है।
प्रायः आलोचनात्मक पुस्तकों में अनुसन्धान का पक्ष क्षीण होता है। पाठक अनुभव करेंगे कि भाषा-संरचना, सरोकार और समेकित प्रभाव को जाँचते हुए लेखक ने एक सन्तुलन रखा है। आलोचना और अनुसन्धान का यह मिश्रण पुस्तक का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। कथा साहित्य में रुचि रखनेवाले पाठकों व शोधार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है।
BHARAT-CHINA LAC TAKRAV
- Author Name:
Mukesh Kaushik
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भारत और चीन के बीच अप्रैल 2020 से लेकर फरवरी 2021 के बीच एल.ए.सी. पर सैनिकों का आमना-सामना हुआ। करीब 10 महीने तक जंग जैसे हालात बने रहे। यह पुस्तक इस तनातनी का सबसे प्रामाणिक ब्योरा लेकर आई है। यह आधिकारिक स्तर पर दिए गए वक्तव्यों, सैन्य तैनाती से जुड़े शीर्ष अधिकारियों और संसद् से लेकर राजनीतिक बैठकों तक के विचार-विमर्श का विवरण पेश करती है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर.के.एस. भदौरिया के अलावा चीनी समकालीन अध्ययन केंद्र के प्रमुख ले. जनरल एस. एल. नरसिंहन ने इस पुस्तक में योगदान दिया है। यह पुस्तक एल.ए.सी. पर तनातनी शुरू होने से पहले की सच्चाई, गलवान की खूनी रात और कैलाश रेंज पर भारतीय सेना की तैनाती का बहुत सटीक विवरण देती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा विदेश मंत्री एस. जयशंकर की कूटनीति और सैन्य नीति को भी इसमें बेबाकी से पेश किया गया है। कई मायनों में यह पुस्तक भारत-चीन के बीच सैन्य संबंधों का संग्रहणीय दस्तावेज है।
Rashtrabhasha Hindi
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
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इस पुस्तक में राहुल जी के भाषा-सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों और भाषणों को संकलित किया गया है, जिनमें उन्होंने सामान्यत: भारत की भाषा-समस्या और विशेषत: हिन्दी पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा-सम्बन्धी जो सवाल पचास साल पहले हमारे सामने थे, वे कमोबेश आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ ज़्यादा ही उग्र हुए हैं। मसलन अंग्रेज़ी का मसला, जिसने व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को दूसरे-तीसरे दर्जे पर पहुँचा दिया है। इसके अलावा वैज्ञानिक और पारिभाषिक शब्दावली की समस्या है, जिस पर अभी भी काफ़ी काम किए जाने की ज़रूरत है। राहुल जी इन निबन्धों में इन सभी बिन्दुओं पर गहराई और अधिकार के साथ विचार करते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर स्थापित करने की पैरवी करते हुए वे अन्य भारतीय भाषाओं को भी उनका उचित और सम्मानित स्थान दिए जाने की ज़रूरत महसूस करते हैं। उनका सुझाव है कि हरेक बालक-बालिका को अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए, और सारे देश में जहाँ भी निर्धारित अल्पमत संख्या में विद्यार्थी मिलें, वहाँ उनके लिए अपनी भाषा के स्कूल खोलने चाहिए।
इसके अलावा हिन्दी की संरचना, विकास, साहित्य और इतिहास आदि अनेक पहलुओं पर राहुल जी के स्पष्ट विचार इन निबन्धों में संकलित हैं।
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