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Agyeya : Kuchh Rang, Kuchh Raag

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श्रीलाल जी द्वारा की गई रचना की मीमांसा आलोचना के पूर्वाग्रहों से मुक्त रहती है। वह किसी ढर्रे की आलोचना नहीं होती है, न किसी स्थापना की आलोचना होती है। वह रचना को समझने की कोशिश होती है। इस पुस्तक में श्रीलाल जी ने कहानीकार अज्ञेय के बारे में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही है कि ‘वे लोक-जीवन के कथाकार हैं। वे पहले कथाकार हैं जिन्होंने इतिवृत्तात्मकता के बोझ को हलका किया है।’ पुस्तक का दूसरा अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास और अज्ञेय’ है। श्रीलाल जी ने हिन्दी उपन्यास की विकास-गाथा कही, जिसमें उन्होंने किस प्रकार चालीस वर्षों में हिन्दी उपन्यास ने प्रौढ़ता प्राप्त की और किस प्रकार ‘शेखर : एक जीवनी’ के प्रकाशन से हिन्दी उपन्यास अपनी अनेक पुरानी सीमाओं को पीछे छोड़ देता है—इसका महत्त्वपूर्ण विवेचन किया है। उसी प्रसंग में उन्होंने हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध उपन्यासों को लिया है। पुस्तक का अन्तिम अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी व्यंग्य : अज्ञेय के सन्दर्भ के साथ’ समकालीन हिन्दी के व्यंग्य-लेखन का सजग सर्वेक्षण है। एक तरह से व्यंग्य विधा का आन्तरिक विश्लेषण है। अज्ञेय के व्यंग्य-लेखन की विशिष्टता पर उनकी एक वाक्य की टिप्पणी बड़ी सूक्ष्म है—‘रमणीय गम्भीरता के हलके चापल्य की कौंध।’ हिन्दी व्यंग्य लेखकों की चर्चा के प्रसंग में श्रीलाल जी ने यूरोपीय व्यंग्य की सूक्ष्म विवेचना भी दी है। श्रीलाल जी का निष्कर्ष यह है कि ‘एक शताब्दी की यात्रा कर चुकने के बाद हिन्दी व्यंग्य ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली है। वह साहित्य की प्रमुख धारा से दूर नहीं है।’ इस छोटी-सी पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं अपनी तमाम पढ़ी हुई पुस्तकों को फिर से पढ़ रहा हूँ। ऐसी पुस्तकें कम लिखी जाती हैं। समग्र दृष्टि से मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि श्रीलाल जी ने आकार में छोटी पर अपने पाठकीय आयाम में व्यापक और विस्तृत तथा उन्मुक्त समीक्षा के द्वारा बिना किसी प्रयत्न के आधुनिक साहित्य को देखने की दृष्टि दी है। —विद्यानिवास मिश्र

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श्रीलाल जी द्वारा की गई रचना की मीमांसा आलोचना के पूर्वाग्रहों से मुक्त रहती है। वह किसी ढर्रे की आलोचना नहीं होती है, न किसी स्थापना की आलोचना होती है। वह रचना को समझने की कोशिश होती है।

इस पुस्तक में श्रीलाल जी ने कहानीकार अज्ञेय के बारे में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही है कि ‘वे लोक-जीवन के कथाकार हैं। वे पहले कथाकार हैं जिन्होंने इतिवृत्तात्मकता के बोझ को हलका किया है।’

पुस्तक का दूसरा अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास और अज्ञेय’ है। श्रीलाल जी ने हिन्दी उपन्यास की विकास-गाथा कही, जिसमें उन्होंने किस प्रकार चालीस वर्षों में हिन्दी उपन्यास ने प्रौढ़ता प्राप्त की और किस प्रकार ‘शेखर : एक जीवनी’ के प्रकाशन से हिन्दी उपन्यास अपनी अनेक पुरानी सीमाओं को पीछे छोड़ देता है—इसका महत्त्वपूर्ण विवेचन किया है। उसी प्रसंग में उन्होंने हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध उपन्यासों को लिया है।

पुस्तक का अन्तिम अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी व्यंग्य : अज्ञेय के सन्दर्भ के साथ’ समकालीन हिन्दी के व्यंग्य-लेखन का सजग सर्वेक्षण है। एक तरह से व्यंग्य विधा का आन्तरिक विश्लेषण है। अज्ञेय के व्यंग्य-लेखन की विशिष्टता पर उनकी एक वाक्य की टिप्पणी बड़ी सूक्ष्म है—‘रमणीय गम्भीरता के हलके चापल्य की कौंध।’ हिन्दी व्यंग्य लेखकों की चर्चा के प्रसंग में श्रीलाल जी ने यूरोपीय व्यंग्य की सूक्ष्म विवेचना भी दी है। श्रीलाल जी का निष्कर्ष यह है कि ‘एक शताब्दी की यात्रा कर चुकने के बाद हिन्दी व्यंग्य ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली है। वह साहित्य की प्रमुख धारा से दूर नहीं है।’

इस छोटी-सी पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं अपनी तमाम पढ़ी हुई पुस्तकों को फिर से पढ़ रहा हूँ। ऐसी पुस्तकें कम लिखी जाती हैं। समग्र दृष्टि से मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि श्रीलाल जी ने आकार में छोटी पर अपने पाठकीय आयाम में व्यापक और विस्तृत तथा उन्मुक्त समीक्षा के द्वारा बिना किसी प्रयत्न के आधुनिक साहित्य को देखने की दृष्टि दी है।

—विद्यानिवास मिश्र

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2012
Weight
254 grams
ISBN-13
9788126722280
Pages
96
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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