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Anuvad Ki Prakriya Taknik Aur Samasyayen

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अनुवाद भाषिक कला है और किसी भाषा-रचना को दूसरी भाषा में पुनर्सृजित करने का कौशल भी। पुनर्सृजन के इस कला-कौशल में भाषा की शर्तों का अतिक्रमण होता है। तथापि यह अतिक्रमण अराजक क़तई नहीं होता। सृजन की अकुलाहट के बावजूद यह सदैव सुन्दर और रुचिकर ही होता है। किन्तु अनुवाद का दूसरा यथार्थ यह भी है कि भाषाविज्ञान से सम्बद्ध होकर मशीन से सम्भव होने के कारण अनुवाद आधुनिक समय में जितना कला है, उतना ही विज्ञान भी है। अनुवाद की यही फ़ि‍तरत (फ़ि‍त्रत) है, जो उसे किंचित् मुश्किल कर्म बनाती है। इस मुश्किल से पार पाने में अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक सहायता करती हैं। तभी सटीक, समतुल्य और संगत अनुवाद सम्भव हो पाता है। अनुवाद की राह में समस्याओं के कई पठार भी आते हैं, जिन्हें अनुवादकर्ता को अपने ज्ञान और सूझबूझ से तोड़ना पड़ता है। ज़ाहिर है, अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक अपनी समस्त शर्तों एवं सावधानियों के द्वारा उसे परिपाक तक पहुँचाती हैं। समस्याएँ इसमें बाधक नहीं वरन् ताक़त बनकर उभरती हैं। अनुवाद के पुनर्सृजन अथवा अनुसृजन अर्थात् समानान्तर सृजन होने का यही राज है। अनुवाद के इस राज को प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. श्रीनारायण समीर ने बड़ी बारीकी और धैर्य के साथ उद्घाटित किया है। इस उद्घाटन में भाषा की रवानी और ताज़गी एक सर्वथा नए आस्वाद की अनुभूति कराती है, जिसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है।

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अनुवाद भाषिक कला है और किसी भाषा-रचना को दूसरी भाषा में पुनर्सृजित करने का कौशल भी। पुनर्सृजन के इस कला-कौशल में भाषा की शर्तों का अतिक्रमण होता है। तथापि यह अतिक्रमण अराजक क़तई नहीं होता। सृजन की अकुलाहट के बावजूद यह सदैव सुन्दर और रुचिकर ही होता है।

किन्तु अनुवाद का दूसरा यथार्थ यह भी है कि भाषाविज्ञान से सम्बद्ध होकर मशीन से सम्भव होने के कारण अनुवाद आधुनिक समय में जितना कला है, उतना ही विज्ञान भी है। अनुवाद की यही फ़ि‍तरत (फ़ि‍त्रत) है, जो उसे किंचित् मुश्किल कर्म बनाती है। इस मुश्किल से पार पाने में अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक सहायता करती हैं। तभी सटीक, समतुल्य और संगत अनुवाद सम्भव हो पाता है।

अनुवाद की राह में समस्याओं के कई पठार भी आते हैं, जिन्हें अनुवादकर्ता को अपने ज्ञान और सूझबूझ से तोड़ना पड़ता है। ज़ाहिर है, अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक अपनी समस्त शर्तों एवं सावधानियों के द्वारा उसे परिपाक तक पहुँचाती हैं। समस्याएँ इसमें बाधक नहीं वरन् ताक़त बनकर उभरती हैं। अनुवाद के पुनर्सृजन अथवा अनुसृजन अर्थात् समानान्तर सृजन होने का यही राज है। अनुवाद के इस राज को प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. श्रीनारायण समीर ने बड़ी बारीकी और धैर्य के साथ उद्घाटित किया है। इस उद्घाटन में भाषा की रवानी और ताज़गी एक सर्वथा नए आस्वाद की अनुभूति कराती है, जिसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2012
Weight
402 grams
ISBN-13
9788180317309
Pages
228
Reading time
~8 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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