Santalia Aur Santal
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‘सन्तालिया और सन्ताल’ पश्चिमी कैनन के बाहर की संस्कृतियों और समाजों के प्रति एक पाश्चात्य लेखक के आकर्षण का अनूठा परिणाम है। ई. जी. मन ने राजमहल पहाड़ियों की तलहटी से लेकर बीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर और कटक में अवस्थित विन्ध्य की दक्षिण-पूर्वी पर्वतमाला तक फैले क्षेत्र को ‘सन्तालिया’ अर्थात सन्ताल-भूमि कहा है, जिसे तब सन्ताल परगना के नाम से जाना जाता था, जहाँ वे सहायक आयुक्त के रूप में कार्यरत रहे थे। उनकी बौद्धिक जिज्ञासा, भारत के स्वदेशी समुदायों खासकर आदिवासी सन्ताल-समूह से सहानुभूतिपूर्ण जुड़ाव ने उन्हें सन्ताल-जीवन की पेचीदगियों, उनके रीति-रिवाजों, विश्वासों, कथा-किंवदन्तियों, गीत-संगीत और जमीन से उनके सहजीवी सम्बन्धों को गहराई से समझने का अवसर दिया। मन ने इस पुस्तक में सन्तालों के जन्म से लेकर मृत्यु तक उनके जीवन के तमाम पक्षों का वर्णन किया है। उन्होंने इन आदिम लोगों को सहज, सरल, ईमानदार और सच बोलने वाला पाया, जिनका जीवन इन गुणों के बावजूद नशे और अन्धविश्वास की दोहरी बुराइयों से पीड़ित था। उन्होंने सन्तालों द्वारा घने जंगलों को साफ कर खेती के लिए जमीन निकालने और उनकी जमीनों को हड़प लेने वाले बंगाली महाजनों के प्रति उनकी सतर्कता का विवरण भी दिया है। ऐतिहासिक सन्ताल-विद्रोह और सन्तालों के बीच ईसाई मिशनरियों के कार्यों का पर्याप्त उल्लेख भी इस पुस्तक में किया गया है। इन विवरणों में सचाई के प्रति लेखक का आग्रह इस हद तक स्पष्ट है कि वह विद्रोह के लिए सन्तालों पर उंगली उठाने के बजाय महाजनों की लोलुपता और धूर्तता तथा व्यवस्था में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को रेखंकित करता है। वस्तुतः सिर्फ मानववैज्ञानिक ब्योरों से परे, यह पुस्तक परम्परा और आधुनिकता के दोराहे पर खड़े लोगों की आकांक्षाओं और उनके आगे बढ़ने की राह के अवरोधों को दर्शाती है। साथ ही परिवर्तन के मुहाने पर पहुँच चुकी एक संस्कृति की सूक्ष्म समझ प्रदान करती है। सन्देह नहीं कि अपने एन्साइक्लोपीडिक विस्तार और दुर्लभ प्रामाणिकता के कारण यह पुस्तक स्थायी महत्त्व प्राप्त कर चुकी है।
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‘सन्तालिया और सन्ताल’ पश्चिमी कैनन के बाहर की संस्कृतियों और समाजों के प्रति एक पाश्चात्य लेखक के आकर्षण का अनूठा परिणाम है। ई. जी. मन ने राजमहल पहाड़ियों की तलहटी से लेकर बीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर और कटक में अवस्थित विन्ध्य की दक्षिण-पूर्वी पर्वतमाला तक फैले क्षेत्र को ‘सन्तालिया’ अर्थात सन्ताल-भूमि कहा है, जिसे तब सन्ताल परगना के नाम से जाना जाता था, जहाँ वे सहायक आयुक्त के रूप में कार्यरत रहे थे। उनकी बौद्धिक जिज्ञासा, भारत के स्वदेशी समुदायों खासकर आदिवासी सन्ताल-समूह से सहानुभूतिपूर्ण जुड़ाव ने उन्हें सन्ताल-जीवन की पेचीदगियों, उनके रीति-रिवाजों, विश्वासों, कथा-किंवदन्तियों, गीत-संगीत और जमीन से उनके सहजीवी सम्बन्धों को गहराई से समझने का अवसर दिया।
मन ने इस पुस्तक में सन्तालों के जन्म से लेकर मृत्यु तक उनके जीवन के तमाम पक्षों का वर्णन किया है। उन्होंने इन आदिम लोगों को सहज, सरल, ईमानदार और सच बोलने वाला पाया, जिनका जीवन इन गुणों के बावजूद नशे और अन्धविश्वास की दोहरी बुराइयों से पीड़ित था। उन्होंने सन्तालों द्वारा घने जंगलों को साफ कर खेती के लिए जमीन निकालने और उनकी जमीनों को हड़प लेने वाले बंगाली महाजनों के प्रति उनकी सतर्कता का विवरण भी दिया है। ऐतिहासिक सन्ताल-विद्रोह और सन्तालों के बीच ईसाई मिशनरियों के कार्यों का पर्याप्त उल्लेख भी इस पुस्तक में किया गया है।
इन विवरणों में सचाई के प्रति लेखक का आग्रह इस हद तक स्पष्ट है कि वह विद्रोह के लिए सन्तालों पर उंगली उठाने के बजाय महाजनों की लोलुपता और धूर्तता तथा व्यवस्था में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को रेखंकित करता है।
वस्तुतः सिर्फ मानववैज्ञानिक ब्योरों से परे, यह पुस्तक परम्परा और आधुनिकता के दोराहे पर खड़े लोगों की आकांक्षाओं और उनके आगे बढ़ने की राह के अवरोधों को दर्शाती है। साथ ही परिवर्तन के मुहाने पर पहुँच चुकी एक संस्कृति की सूक्ष्म समझ प्रदान करती है। सन्देह नहीं कि अपने एन्साइक्लोपीडिक विस्तार और दुर्लभ प्रामाणिकता के कारण यह पुस्तक स्थायी महत्त्व प्राप्त कर चुकी है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 280 grams
- ISBN-13
- 9789360863845
- Pages
- 128
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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विगत दशकों में पारिस्थितिकी और उससे जुड़े मसलों के प्रति विशेष रुचि दिखाई पड़ी है, ख़ास तौर पर जलवायु-परिवर्तन को लेकर होनेवाली बहसों के सन्दर्भ में इस तरफ़ सुधीजन का ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन पारिस्थितिकी का विमर्श सिर्फ़ जलवायु तक सीमित नहीं है। इसमें जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के साथ मनुष्य के रिश्तों के अलावा मनुष्य जाति के सम्मुख प्रकृति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का अध्ययन भी शामिल होता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ इस पुस्तक में पारिस्थितिकी के इतिहास को देखा-समझा गया है। ‘भारत का लोक इतिहास’ परियोजना के तहत प्रकाशित यह पुस्तक भी इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह गहन अध्ययन और प्रामाणिक सामग्री पर आधारित है। मूल स्रोतों के उद्धरणों तथा पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, वन विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास पर विशेष टिप्पणियों से समृद्ध इस पुस्तक में विषय से सम्बन्धित अन्य उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख भी किया गया है जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित होंगे। सूचनाओं की सटीकता को बरकरार रखते हुए, पुस्तक को अतिरिक्त तकनीकी विवरणों से मुक्त रखा गया है ताकि इतिहास के छात्रों के अलावा यह सामान्य पाठकों के लिए भी रुचिकर सिद्ध हो।
Sindhu Sabhyata
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंख्ला की यह दूसरी पुस्तक सिन्धु सभ्यता के बारे में है। इसे इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘प्रागैतिहास’ की अगली कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता के और विस्तृत विवरण के अलावा इसमें अन्य समकालीन और उसके बाद की संस्कृतियों का सर्वेक्षण भी किया गया है। साथ ही भारत के मुख्य भाषा परिवारों के उद्भव पर विमर्श भी इसमें शामिल है। सिन्धु घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आरम्भिक कांस्य युग और उसके सांस्कृतिक पहलू तथा सिन्धु सभ्यता की व्यापकता, जनसंख्या, कृषि, हस्तशिल्प, व्यापार, क़स्बों और शहरों की बनावट के साथ इसमें जनता, समाज और राज्यसत्ता आदि का भी प्रमाण-आधारित विश्लेषण किया गया है। तालिकाओं, चित्रों और विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थ सूचियों के साथ यह पुस्तक शृंखला की अन्य पुस्तकों की ही तरह संग्रहणीय और पठनीय सिद्ध होगी।
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
- Book Type:

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जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
Gandhi Ka Saintalis
- Author Name:
Pushya Mitra +1
- Book Type:

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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva +1
- Book Type:

- Description:
अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Loktantra Ki Chaukidari
- Author Name:
Steven Levitsky and Daniel Ziblatt +1
- Book Type:

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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। — दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। — डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
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यह किताब कश्मीर के उथल-पुथल भरे इतिहास में कश्मीरी पंडितों के लोकेशन की तलाश करते हुए उन सामाजिक-राजनैतिक प्रक्रियाओं की विवेचना करती है जो कश्मीर में इस्लाम के उदय, धर्मान्तरण और कश्मीरी पंडितों की मानसिक-सामाजिक निर्मिति तथा वहाँ के मुसलमानों और पंडितों के बीच के जटिल रिश्तों में परिणत हुईं। साथ ही, यह किताब आज़ादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुए उन अन्तर्विरोधों की भी पहचान करती है जिनसे आज़ाद भारत में कश्मीर, जम्मू और शेष भारत के बीच बने तनावपूर्ण सम्बन्धों और इस रूप से कश्मीर घाटी के भीतर पंडित-मुस्लिम सम्बन्धों ने आकार लिया। नब्बे के दशक में पंडितों के विस्थापन के लिए ज़िम्मेदार परिस्थितियों की विस्तार से विवेचना करते हुए यह किताब विस्थापित पंडितों के साथ ही उन कश्मीरी पंडितों से संवाद स्थापित करती है जिन्होंने कभी कश्मीर नहीं छोड़ा, और उनके वर्तमान और भविष्य के आईने में कश्मीर को समझने की कोशिश करती है। धारा 370 हटाए जाने से पहले और बाद में, दोनों स्थितियों में, घाटी में रह रहे पंडितों के आख्यान को शामिल करनेवाली यह पहली किताब है जिसके लिए लेखक ने कश्मीर के विभिन्न इलाक़ों में यात्राएँ की हैं और पंडित परिवारों से विस्तार से बातचीत की है।
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
Ashok Kumar Pandey
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Davanal : Maovad Se Jang
- Author Name:
Nandini Sundar +2
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पिछले दो दशकों के दौरान, मध्य भारत में व्यापक रूप से वनों से आच्छादित और खनिज के मामले में समृद्ध बस्तर का इलाका देश में सबसे अधिक सैन्यीकृत स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। सरकार माओवादी उग्रवाद को भारत की ‘सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताती है। वर्ष 2005 में राज्य-प्रायोजित एक हथियारबन्द आन्दोलन, सलवा जुडुम, ने सैकड़ों गाँवों को जला दिया और मलेशिया, वियतनाम एवं अन्य जगहों पर विकसित आतंकवाद-विरोधी रवैये का अनुसरण करते हुए उन गाँवों के निवासियों को राज्य-नियंत्रित शिविरों में हाँक दिया। बलात्कार और हत्याओं के अलावा, ‘आत्मसमर्पण’ कर चुके सैकड़ों माओवादी समर्थकों को जबरन सहायक के रूप में भरती किया गया। संघर्ष आज भी जारी है, जो आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और माओवादी कैडरों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। वर्ष 2007 में, नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य लोगों ने इस संघर्ष से उत्पन्न मानवाधिकार-हनन के मुद्दे पर भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा। वर्ष 2011 में दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, न्यायालय ने हथियारबन्द गिरोह के लिए राज्य के समर्थन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि, सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया है। ‘दावानल : माओवाद से जंग’ पुस्तक भारत के हृदयस्थल में चल रहे इस क्रूर युद्ध का वर्णन करती है और देश की अदालतों, मीडिया, राजनीति और अन्त में भारतीय लोकतंत्र की हकीकत बयान करती है। यह इलाके की व्यापक यात्राओं, अदालती साक्ष्यों, सरकारी दस्तावेजों और उन घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका पर आधारित है।
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