Muslim Man Ka Aaina
Author:
Rajmohan GandhiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 399.2
₹
499
Available
स्वस्थ हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों और भारतीय जनगण के बीच सहिष्णुता के लिए यह ज़रूरी है कि मुसलमान हिन्दुओं के और हिन्दू मुसलमानों के मानस को समझें। यह पुस्तक इसी भावना को लेकर भारत और पाकिस्तान के आठ प्रसिद्ध मुस्लिम नेताओं के जीवन को रेखांकित करती है, और उनके कहे-अनकहे पहलुओं को हमारे सामने लाती है। जिन लोगों के जीवनेतिहास के माध्यम से इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में झाँकने का प्रयास किया है, उनमें ये नाम शामिल हैं : सैयद अहमद ख़ाँ, मुहम्मद इक़बाल, मुहम्मद अली, मुहम्मद अली जिन्ना, फ़ज़लुल हक़, अबुल कलाम आज़ाद, लियाक़त अली ख़ाँ, ज़ाकिर हुसैन।</p>
<p>पुस्तक हमारे मन-मस्तिष्क में बनी मुसलमानों के प्रति उन सभी भ्रान्त धारणाओं को वैचारिक स्तर पर तोड़ती है जिन्हें हम तथाकथित ‘इतिहास’ के रूप में जानते आए हैं। हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की मानसिक संरचना में कितनी एकरूपता है और कितनी भिन्नता तथा दोनों ही समुदाय हर पहलू से कितने एक-दूसरे के नज़दीक हैं, पुस्तक हमें विस्तार से बताती है।</p>
<p>‘अंडरस्टैंडिंग दि मुस्लिम माइंड’ अंग्रेज़ी पुस्तक से अनूदित राजमोहन गांधी की यह पुस्तक हमें अत्यन्त विनम्रता से उन ज़िन्दगियों को समझाने का प्रयत्न करती है, जिनके विषय में हम जानते हुए भी बहुत कम जानते हैं।
ISBN: 9789360869946
Pages: 400
Avg Reading Time: 13 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Kashmir Ka Sahitya
- Author Name:
Prof. Kripashankar Chaubey +1
- Book Type:

- Description: भारत की बहुभाषिकता भारत की शक्ति है तो भारतीय सृजनधर्मी साहित्य का सौंदर्य भी। कश्मीर का साहित्य वहां के जन की सृजनधर्मिता में विकसित हुई। लगभग 40 वर्षों से कश्मीर को दूर से देखा जा रहा था। इस दूर से देखने का असर कश्मीर में प्रस्फुटित साहित्य को देखने-जानने पर भी हुआ। परिणामतः कश्मीरी साहित्य विशेषतः कश्मीरी भाषा में लिखा गया। कश्मीर में रहकर जो कश्मीरी भाषा में लिखा जा रहा था, वह सब अपरिचित-सा हो गया। विस्थापित कश्मीरी समूह जहां विस्थापन की पीड़ा में सिमटकर रह गया, वही कश्मीर के अंदर जो लोग लिख रहे थे, घाटी में जो लोग लिख रहे थे, उनमें जाने-अनजाने कश्मीरियत की पहचान, ऐसी पहचान जो शेष भारत से अलग, अलहदा यह देखने लगा। और कश्मीर के लेखन में भारत अनुपस्थिति-सा हो गया। साहित्य में भारत लोग की और लोक मन की उपस्थिति है। स्वतंत्रता के पूर्व यहां तक की बीसवीं सदी में नब्बे के दशक के पूर्व तक के सृजनात्मक लेखन में यह लोक मन सर्वत्र परिलक्षित होता है और कश्मीर के वैशिष्ट्य के साथ भारतीयता का अनुरणन करता है पर नब्बे के बाद अलग, अलहदा कश्मीर और उस पर पांथिक उन््माद तथा आतंक की छाया ने सबकुछ खत्म कर दिया। संवेदना और सद्भाव, जो कुछ लिखा जा रहा था, उससे तिरोहित हो गया। नेह छोह नाते लुप्त हो गए। पर काल का परिवर्तन हुआ है। भारत का भारत के लिए कश्मीर का भाव जम्मू कश्मीर की आवोहवा में प्रसारित हुआ है। भारत के साथ एकात्म और अभिन्न भाव जम्मू कश्मीर के स्वर सब ओर गुंजरित हो रहे हैं। ऐसे में कश्मीर के साहित्यिक संसार का एक सम्यक् आकलन आवश्यक और अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है। इस अपरिहार्यता को दृष्टिगत कर प्रस्तुत ग्रंथ कश्मीर के साहित्य संसार की संक्षिप्त समीक्षा है। कविता, कहानी, साहित्य, कश्मीर की भाषा की विशिष्टताओं को प्रतिनिधि तौर पर प्रस्तुत करने की यह कोशिश है.
Khalji Kaleen Bharat
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत ग्रन्थ ख़लज़ी बादशाहों के, समय के लिहाज़ से अल्प किन्तु महत्त्व की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक शासनकाल (1290-1320 ई.) से सम्बन्धित है।
डॉ. अतहर अब्बास रिज़वी ने इस पुस्तक में जिन तत्कालीन ग्रन्थों के परम आवश्यक उद्धरणों का समावेश किया है उनमें हैं—ज़ियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख़े फ़ीरोज़शाही’, ‘अमीर ख़ुसरो’ के पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ (‘मिफ़ताहुल फ़ुतूह’, ‘ख़ज़ाइनुल फ़ुतूह’, ‘दिवलरानी ख़िज्र ख़ानी’, ‘नुह सिपेहर’ और ‘तुग़लक़नामा’), साथ ही मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु से कुछ ही पहले लिखनेवाले एसामी की ‘फ़ुतूहुस्सलातीन’।
इब्ने बतूता की यात्रा के उल्लेख से भी ख़लज़ी वंश से सम्बन्धित उद्धरण दिए गए हैं। कुछ काल पीछे के लिखे हुए तीन अन्य ग्रन्थों का भी समावेश इसलिए कर लिया गया है कि जिन मूल ग्रन्थों के आधार पर वे लिखे गए हैं, उनके अप्राप्य हो जाने के कारण उनकी अहमियत बढ़ गई है। ये ग्रन्थ हैं यहया बिन अहमद का ‘तारीख़े मुबारक शाही’, अबुल क़ासिम हिन्दू शाह फ़रिश्ता अस्तराबादी का ‘गुलशने इब्राहीमी’ जिसकी प्रसिद्धि ‘तीरीख़े फ़रिश्ता’ के नाम से है, और जफ़रुलवालेह के नाम से प्रचलित अरबी में लिखा हुआ गुजरात का इतिहास।
विद्वान अनुवादक ने इन ग्रन्थों का आलोचनात्मक विवेचन किया है जिसके चलते यह पुस्तक इतिहासज्ञों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी सुग्राह्य हो गई है।
Vigyan Fantasi Kathayen
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description: "किस्से कहानियों की तरह विज्ञान की दुनिया भी कम अचरज से भरी नहीं है। विज्ञान फंतासी कथाएँ प्रकाश मनु की विज्ञान कथाओं का ताजा संग्रह है, जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों के साथ ही खेल और कल्पना का भी वितान तना हुआ है और हर क्षण कुछ नया घटित हो रहा है, जो परीकथाओं की दुनिया से कहीं अधिक चित्ताकर्षक और जादुई है। मनुजी की विज्ञान कथाओं में कहीं उड़ते हुए रोबोटनुमा पेड़ की कल्पना है तो कहीं मन को नियंत्रित करनेवाले हाइटेक सुपर कंप्यूटर की। कहीं कोई रोबोट गिलगिल सेवन चौकीदार बनकर अपने रहस्यपूर्ण कारनामे से सबको अचंभित कर डालता है तो कहीं वह अनोखी चिडि़या शिंगाई फू शुम्मा के रूप में एक छोटे बच्चे को लंबी अंतरिक्ष यात्रा पर ले चलता है। ‘मंगल ग्रह की लाल चिडि़या’ और ‘चंद्रलोक की अदृश्य दुनिया’ सरीखी कहानियाँ चाँद और मंगल ग्रह पर मनुष्य अस्तित्व की संभावना की कुछ अधिक कल्पनाशीलता के साथ पड़ताल करती हैं। ‘गोपी की फिरोजी टोपी’ और ‘पप्पू की रिमझिम छतरी’ में कंप्यूटर और लेजर किरणों की दुनिया का एक आश्चर्यलोक है, जो आज भले ही खेल की तरह लग रहा हो, पर कल हकीकत में बदल सकता है। पुस्तक में ‘दुनिया का सबसे अनोखा सुपर हाइटेक चोर’ जैसी रोमांचक कहानियाँ हैं तो ‘प्रोफेसर जोशी बादलों के देश में’ जैसी अद्भुत कथाएँ भी, जो परीकथाओं के समांतर उड़ती हुई अपनी राह बनाती हैं।"
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
- Rating:
- Book Type:

- Description: जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
Rashtrapita Mahatma Gandhi
- Author Name:
Mahesh Sharma
- Book Type:

- Description: देश की आजादी तथा दु:खी मानवता के उद्धार के लिए गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे। उनकी यात्रा पोरबंदर से आरंभ होकर राजकोट, इंग्लैंड, डरबन, जोहांसबर्ग, अहमदाबाद और कलकत्ता आदि से गुजरती हुई दिल्ली में समाप्त हुई। वे अंत समय तक देश-निर्माण, सांप्रदायिक सौहार्द, एकता-अखंडता के लिए कार्य करते रहे। अहिंसा गांधीजी का अचूक अस्त्र था, जो एटम बम से भी ज्यादा ताकतवर था। अंग्रेज सरकार उनके सत्याग्रह और अहिंसा से बहुत खौफ खाती थी। उन्होंने खादी को घर-घर पहुँचाया और स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया। स्वयं अछूतें के साथ रहकर उनके दु:ख-दर्द को महसूस किया और उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया। उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा करनी पड़ी। सत्याग्रह की ताकत ने गांधीजी को महात्मा बनाया और इसके बल पर उन्होंने आजादी के समर में प्रत्येक देशवासी को एक सिपाही के रूप में बदल दिया। सत्यवादिता ने उनमें आत्मिक शक्ति भर दी थी कि उनके एक आह्वान पर लाखों लोग सिर कटाने को तैयार हो जाते थे। गांधीजी के बारे में जितना लिखा-पढ़ा जाए, कम है। कृतज्ञ राष्ट्र ने अपने प्यारे बापू को ‘राष्ट्रपिता’ के सम्मान से विभूषित किया। एक युगपुरुष और महान् व्यक्ति के अंतहीन कार्यों की ब्योरेवार जानकारी देती एक प्रेरणादायी पुस्तक।
Bharat Vaibhav
- Author Name:
Chakradhar Semwal
- Book Type:

- Description: "‘गागर में सागर’ यानी कुछ किताबी पन्नों में शस्य-श्यामला माँ भारती का अतुल वैभव समेटने का यह विनम्र प्रयास है। मानव सभ्यता के प्रामाणिक वैज्ञानिक दस्तावेज, हमारे शिल्पियों एवं वास्तुकारों से निर्मित भारत के सात महान् आश्चर्य, योग-आयुर्वेद के चमत्कारी नुस्खे, अणु-परमाणु, अंतरिक्ष यान, परखनली शिशु के मूल स्रोतों की समीक्षा, संगीत एवं त्योहारों की रसधाराएँ, विश्व के समुद्री कुंभ मेले का सजीव चित्रण, प्रकृति एवं पर्यावरण की समीक्षा, भारत की अतुल धन-संपदा एवं आजादी के प्रतीक चित्तौड़गढ़ किले का विशद वर्णन तथा अनेकता में एकता के समावेश से पुरातन एवं वर्तमान के महामिलन का संयोग अनायास ही सुलभ हुआ है। समुद्र-मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों की तरह ही शायद यह अतुल वैभव भी पौराणिकता के लबादे में हमारी आँखों से ओझल हो जाता, परंतु भला हो उस आधुनिक परमाणु बम के जनक रॉबर्ट ओपेनहाइमर एवं अन्य पाश्चात्य विद्वानों का, जिन्होंने खुले मन से आज की औद्योगिक एवं विज्ञान की क्रांतियों का श्रेय हमारे ज्ञान के खजानों, वेद, उपनिषद्, रामायण, पुराण एवं गीता को प्रदान किया है। भारत के गौरवशाली अतीत का जयघोष करनेवाली अत्यंत पठनीय कृति। "
The Shaurya Unbound
- Author Name:
Nitu +1
- Book Type:

- Description: The lead Internal Security Fore of the country, the central Reserve Police Force holds the proud distinction of being the highest decorated Central Armed Police Force of the country. 'The Shaurya, Unbeaten', Chronicles the stories of the C.R.P.F brave hearts with indomitable courage, grit and determination in the face of adversity.
Aaj Ke Aiene Mein Rashtravad
- Author Name:
Ravikant
- Book Type:

- Description: जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और थोथी देशभक्ति के जुमले उछालकर जेएनयू को बदनाम किया जा रहा था, तब वहाँ छात्रों और अध्यापकों द्वारा राष्ट्रवाद को लेकर बहस शुरू की गई। खुले में होनेवाली ये बहस राष्ट्रवाद पर कक्षाओं में तब्दील होती गई, जिनमें जेएनयू के प्राध्यापकों के अलावा अनेक रचनाकारों और जन-आन्दोलनकारियों ने राष्ट्रवाद पर व्याख्यान दिए। इन व्याख्यानों में राष्ट्रवाद के स्वरूप, इतिहास और समकालीन सन्दर्भों के साथ उसके ख़तरे भी बताए-समझाए गए। राष्ट्रवाद कोई निश्चित भौगोलिक अवधारणा नहीं है। कोई काल्पनिक समुदाय भी नहीं। यह आपसदारी की एक भावना है, एक अनुभूति जो हमें राष्ट्र के विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों से जोड़ती है। भारत में राष्ट्रवाद स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान विकसित हुआ। इसके मूल में साम्राज्यवाद-विरोधी भावना थी। लेकिन इसके सामने धार्मिक राष्ट्रवाद के ख़तरे भी शुरू से थे। इसीलिए टैगोर समूचे विश्व में राष्ट्रवाद की आलोचना कर रहे थे तो गांधी, अम्बेडकर और नेहरू धार्मिक राष्ट्रवाद को ख़ारिज कर रहे थे। कहने का तात्पर्य यह कि राष्ट्रवाद सतत् विचारणीय मुद्दा है। कोई अन्तिम अवधारणा नहीं। यह किताब राष्ट्रवाद के नाम पर प्रतिष्ठित की जा रही हिंसा और नफ़रत के मुक़ाबिल एक रचनात्मक प्रतिरोध है। इसमें जेएनयू में हुए तेरह व्याख्यानों को शामिल किया गया है। साथ ही योगेन्द्र यादव द्वारा पुणे और अनिल सद्गोपाल द्वारा भोपाल में दिए गए व्याख्यान भी इसमें शामिल हैं।
Teesri Aankh
- Author Name:
Anil Joshi +1
- Book Type:

- Description: इतिहास तीसरी आँख होता है । मनुष्य की दो आँखें आगे देखती हैं, इतिहास की आँख पीछे देखती है। जो समाज जितना पीछे भूतकाल में देख सकता है, वह उतना आगे भविष्य में दूर तक विचार भी कर सकता है। जो धनुर्धर होता है, वह प्रत्यंचा को श्रुति यानी कान तक खींचता है, दूर संधान करने की कोशिश करता है। -धर्म की ग्लानि से इस राष्ट्र का दर्शन क्या है ? हमारे राष्ट्र का इतिहास क्या है? हमारे राष्ट्र की परंपरा क्या है ? हमारे राष्ट्र का वैशिष्ट्य क्या है ? हमारे राष्ट्र का उद्देश्य क्या है? हमारे राष्ट्र की विश्व- जगत् में विशेषता क्या है ? हमारे राष्ट्र का विश्व - दृष्टि से कर्तव्य क्या है ? वैश्विक जागृति में जिम्मेदारी क्या है? -डॉ. हेडगेवार और राष्ट्र दृष्टि से डॉ. अंबेडकर ने धारा 370 का विरोध किया और जब शेख अब्दुल्ला ने डॉ. अंबेडकर जी को कहा कि हमको कश्मीर के लिए कुछ अधिक अधिकार दीजिए तो डॉ. साहब ने शेख अब्दुल्ला से कहा, तुम चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार मिले, पर भारत और भारतीयों को तुम कोई अधिकार नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानून मंत्री हूँ और मैं अपने देश के साथ इस तरह की धोखाधड़ी और विश्वासघात करने में शामिल नहीं हो सकता । डॉ. भीमराव अंबेडकर : एक असाधारण बहुआयामी व्यक्तित्व से
Mera Lahuluan Punjab
- Author Name:
Khushwant Singh
- Book Type:

-
Description:
बैसाख की पहली तिथि पंजाबी पंचांग के अनुसार नववर्ष दिवस के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन 13 अप्रैल, 1978 को जरनैल सिंह भिंडरावाले ने धूम-धड़ाके से पंजाब के रंगमंच पर पदार्पण किया। इस घटना से न केवल पंजाब के जन-जीवन में तूफ़ान आया बल्कि पूरे देश के लिए इसके दूरगामी परिणाम हुए। पूरा पंजाब अशान्त और आतंकवाद के हाथों क्षत-विक्षत हो गया और धीरे-धीरे यह समस्या इतनी पेचीदा बन गई कि देश की अखंडता के लिए यह सचमुच का ख़तरा बनती दिखाई दी। सुप्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह की प्रस्तुत पुस्तक सुस्पष्ट रूप से इस समस्या का इतिहास दर्शाती है, स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद पंजाबियों के गिले-शिकवों और असन्तोष का विवरण देती है, और सभी प्रमुख घटनाओं पर रोशनी डालती है।
लेखक का व्यक्तिगत जुड़ाव पुस्तक को विशेष प्रामाणिकता प्रदान करता है, जो लगभग इसके प्रत्येक पृष्ठ पर प्रकट है। इसमें लेखक ने एक तरफ़ पंजाब की राजनीति तथा दूसरी ओर केन्द्र सरकार द्वारा जानबूझकर खेले जानेवाले शरारतपूर्ण राजनीतिक खेलों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत के सबसे उन्नतिशील राज्य की प्रगति के मार्ग में गत्यवरोध आ गया, यहाँ की कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था तहस-नहस होने लगी, इसका प्रशासन और न्यायपालिका पंगु बनकर रह गए। जो लोग इस गत्यवरोध को अधिक गहराई से समझना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।
Vaidehi Okhad Janai : Meera Aur Pashchimi Gyan-Mimansa
- Author Name:
Madhav Hada
- Book Type:

-
Description:
‘वैदहि ओखद जाणै’ पुस्तक में मीरां को उसकी अपनी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी से अलग, पश्चिमी विद्वत्ता के सांस्कृतिक मानकों पर समझने-परखने के प्रयासों की पड़ताल है। पश्चिमी विद्वत्ता से मीरां का सम्बन्ध उपनिवेशकाल से ही है। कर्नल जेम्स टॉड ने मीरां को ‘रहस्यवादी संत-भक्त और पवित्रात्मा कवयित्री’ की पहचान दी, जबकि जर्मन विद्वान् हरमन गोएत्ज़ ने ख़ास पश्चिमी नज़रिये से उसके जीवन की पुनर्रचना की। फ्रांसिस टैफ़्ट सहित कुछ पश्चिमी विद्वानों ने उसके जीवन को ‘किंवदंती’ में सीमित कर दिया, जबकि स्ट्रैटन हौली खींच-खाँचकर उसकी कविता के विरह को भारतीय समाज की कथित लैंगिक असमानता में ले गए। विनांद कैलवर्त, स्ट्रैटन हौली आदि ने मीरां को बहुत मनोयोग से पढ़ा-समझा, लेकिन उन्होंने उसकी कविता को पांडुलिपीय प्रमाणों के अभाव, भाव विषयक बहुवचन और भाषा सम्बन्धी वैविध्य के कारण कुछ हद तक अप्रामाणिक ठहरा दिया।
टॉड का कैनेनाइजेशन औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विस्तार व स्थिरता और व्यापक नीति का हिस्सा था, जबकि हरमन गोएत्ज की मीरां के जीवन की पुनर्रचना पश्चिमी मनीषा के जीवन को देखने-समझने के विभक्त नज़रिये का नतीजा है। मीरां की पहचान और मूल्यांकन में प्रयुक्त अन्य कसौटियों—‘ऑथेंटिक’, एकरूपता, संगति आदि का भी दरअसल मीरां के जीवन और कविता की पहचान और मूल्यांकन में इस्तेमाल बहुत युक्तिसंगत नहीं है। पश्चिम का सांस्कृतिक बोध अलग प्रकार का है, क्योंकि इसका विकास चर्च के अनुशासन में हुआ है, जबकि भारतीय सांस्कृतिक बोध इस तरह के किसी अनुशासन से हमेशा बाहर, स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ। भक्ति आन्दोलन तो भारतीय मनीषा की स्वातंत्र्य चेतना का विस्फोट है और स्वतंत्रता हमेशा बहुवचन में ही चरितार्थ होती है। मीरां की कविता भी इसीलिए श्रुत और स्मृत पर निर्भर ‘जीवित’ कविता है और इसका स्वर बहुवचन है।
इस पुस्तक में मीरां सम्बन्धी पश्चिमी विद्वत्ता की इन धारणाओं का प्रत्याख्यान है। यह प्रत्याख्यान इसलिए ज़रूरी है कि आम भारतीय मीरां के सम्बन्ध में अपनी सदियों से चली आ रही धारणाओं के प्रति मन में किसी संशय को जगह देने से पहले विचार करें।
Manavadhikar Ka Manveeya Chehara
- Author Name:
Subhash Mishra
- Book Type:

- Description: मानव-जाति के भाग-निर्माण में जितनी शक्तियों ने योगदान दिया है और दे रही हैं, उन सब में धर्म के रूप में प्रगट होनेवाली शक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण कोई नहीं है। सभी सामाजिक संगठनों के मूल में कहीं-न-कहीं यही अद्भुत शक्ति काम करती रही है तथा अब तक मानवता की विविध इकाइयों को संगठित करनेवाली सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा इसी शक्ति से प्राप्त हुई है। हम सभी जानते हैं कि धार्मिक एकता का संबंध प्रायः जातिगत, जलवायुगत तथा वंशानुगत एकता के संबंधों से भी दृढ़तर सिद्ध होता है।
Vedic Kaal
- Author Name:
S. Irfan Habib
- Book Type:

-
Description:
‘भारत के लोक इतिहास’ श्रृंखला के इस खंड का विषय 1500 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के बीच का काल-खंड है जिसके तहत ऋग्वेद और उसके बाद के ग्रन्थों को क्रमशः व्यवस्थित किया गया है और उस युग के भूगोल, प्रव्रजन, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और समाज के साथ-साथ धर्म और दर्शन आदि पहलुओं का अन्वेषण किया गया है। लेखकों की कोशिश रही है कि उक्त आदिग्रन्थों के माध्यम से तत्कालीन जन-जीवन की पुनर्रचना कर आम पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाया जाए। इस प्रक्रिया में लैंगिक और वर्ग-आधारित सामाजिक विभाजनों को ख़ास तौर पर देखने की कोशिश की गई है।
पुस्तक के एक अध्याय में पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर प्रमुख क्षेत्रीय संस्कृतियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है। इतिहास में लोहे का आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना है जो इसी युग में सम्पन्न हुई थी, सो उसका वर्णन किंचित् विस्तार से हुआ है। साथ ही जाति व्यवस्था के आरम्भ पर भी इस पुस्तक में अपेक्षित प्रकाश डाला गया है।
मूल ग्रन्थों के उद्धरणों, तार्किक व्याख्याओं और विश्लेषणों, अनेक प्रामाणिक चित्रों और नक़्शों से समृद्ध यह पुस्तक न सिर्फ़ रुचिकर, बल्कि पाठकों को विचारोत्तेजक भी लगेगी।
Namo Sarkar Ke Teen Varsh
- Author Name:
Praveen Gugnani
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Aarakshan
- Author Name:
Arvind Mohan
- Book Type:

- Description: भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था। आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती है। ‘जातियों का लोकतंत्र’ शृंखला की यह पुस्तक भारत में आरक्षण की अवधारणा के पैदा होने, उसके लागू किए जाने, उसके विरोध और उसके समर्थन आदि हर पहलू पर विचार करती है। इसमें संकलित एक-एक आलेख को आरक्षण पर केन्द्रित प्रामाणिक अध्ययन माना जा सकता है, जिन्हें इसके सम्पादक, अरविन्द मोहन ने निश्चय ही इस उद्देश्य से जुटाया है कि हम आज, जबकि आरक्षण को बस एक चुनावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, यह जान सकें कि आरक्षण बतौर एक व्यवस्था और बतौर एक विचार क्या है! यह पुस्तक आरक्षण के पीछे के तर्कों, इसे लेकर हुई बहसों, तथ्यों और विकल्पों, सबसे अवगत कराती है। इसके अध्ययन से एक सामान्य पाठक भी जान सकेगा कि लगातार बहस में रहनेवाले आरक्षण को लेकर हमें एक सामाजिक रूप में कैसे सोचना चाहिए; कि क्या वह महज एक आर्थिक प्रश्न है, या कि उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्योचित व्यवहार और सम्मान से भी है!
Manipur in Flames: Conspiracy of The Cross
- Author Name:
Jagdamba Mall
- Book Type:

- Description: This book is a compelling analysis of the causes behind the unrest in Manipur since 3rd May 2023. It examines the factors, consequences and involvement of national and international organisations, including Church bodies like AMCO, CBCNEI, BWA and WCC along with global players like USA, UK, China and UNO. The book narrates the history of Manipur. The contribution of Meitei community in nation building is highlighted. It explores the immigration of Kuki population from Myanmar, encouraged by British Political Agent Major W. McCulloch (1844-67) with ulterior motives, the separation of Hills administration and the Church's conspiracy to convert Kukis to Christianity to create a rift with Meitei Hindus and India. This is a must-read for historians, sociologists, political activists, social workers and research scholars.
Bihar Ek Etihasik Adhyayan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

-
Description:
बिहार में ऐतिहासिक गतिविधियों की शुरुआत उत्तरवैदिक काल से होती है। इस इलाक़े में ई.पू. छठी शताब्दी के दौरान विकास की गति तेज़ हो गई। प्रारम्भ में इसे मगध के नाम से जाना गया। राजगृह और गया का इलाक़ा प्रारम्भ में तथा मौर्यकाल के दौरान गंगा नदी के उत्तर और दक्षिण का इलाक़ा ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया। पाटलिपुत्र विश्व के प्रमुख नगरों में से एक हो गया। शुंग और कुषाण राजवंश के बाद सम्पूर्ण आधुनिक बिहार के इलाक़े पर किसी एक राजवंश का प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रहा।
पूर्व मध्यकाल में आधुनिक बंगाल और उत्तर प्रदेश के शासकों ने बिहार को खंडित कर दिया। यह सिलसिला बाद के सैकड़ों वर्षों तक चलता रहा। मराठों का आधिपत्य भी इसके कुछ हिस्से पर स्थापित रहा।
शेरशाह और अकबर के ज़माने में बिहार का पुनः एक राजनीतिक नक़्शा तैयार हुआ।
अंग्रेज़ीकाल में बिहार का अस्तित्व बंगाल के उपनिवेश के समान 1912 ई. और उसके बाद तक बना रहा।
मौर्यकाल के बाद बिहार की आर्थिक स्थिति अफ़ग़ानों और मुग़लशासकों के काल में बेहतर हुई। बिहार के कई छोटे-छोटे क़स्बे आर्थिक बेहतरी और उद्योग के केन्द्र रहे। अंग्रेज़ीकाल में चीनी मिलें बिहार के क़रीब 30 स्थानों में स्थापित हुईं। बिहार में नदियों की भूमिका काफ़ी अनुकूल रही। तिरहुत की ज़मीन भारतवर्ष में सर्वाधिक उपजाऊ थी। भारतवर्ष में सबसे ज़्यादा पेय जल-सुविधा आज भी यहीं है।
Davanal : Maovad Se Jang
- Author Name:
Nandini Sundar
- Book Type:

- Description: पिछले दो दशकों के दौरान, मध्य भारत में व्यापक रूप से वनों से आच्छादित और खनिज के मामले में समृद्ध बस्तर का इलाका देश में सबसे अधिक सैन्यीकृत स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। सरकार माओवादी उग्रवाद को भारत की ‘सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताती है। वर्ष 2005 में राज्य-प्रायोजित एक हथियारबन्द आन्दोलन, सलवा जुडुम, ने सैकड़ों गाँवों को जला दिया और मलेशिया, वियतनाम एवं अन्य जगहों पर विकसित आतंकवाद-विरोधी रवैये का अनुसरण करते हुए उन गाँवों के निवासियों को राज्य-नियंत्रित शिविरों में हाँक दिया। बलात्कार और हत्याओं के अलावा, ‘आत्मसमर्पण’ कर चुके सैकड़ों माओवादी समर्थकों को जबरन सहायक के रूप में भरती किया गया। संघर्ष आज भी जारी है, जो आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और माओवादी कैडरों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। वर्ष 2007 में, नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य लोगों ने इस संघर्ष से उत्पन्न मानवाधिकार-हनन के मुद्दे पर भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा। वर्ष 2011 में दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, न्यायालय ने हथियारबन्द गिरोह के लिए राज्य के समर्थन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि, सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया है। ‘दावानल : माओवाद से जंग’ पुस्तक भारत के हृदयस्थल में चल रहे इस क्रूर युद्ध का वर्णन करती है और देश की अदालतों, मीडिया, राजनीति और अन्त में भारतीय लोकतंत्र की हकीकत बयान करती है। यह इलाके की व्यापक यात्राओं, अदालती साक्ष्यों, सरकारी दस्तावेजों और उन घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका पर आधारित है।
Madhyakaleen Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

-
Description:
सल्तनत काल में चरखा भारत में लोकप्रिय हुआ। इरफ़ान हबीब कहते हैं कि निश्चित रूप से चरखा और धुनिया की कमान सम्भवत: 13वीं और 14वीं शताब्दी में बाहर से भारत आए होंगे। प्रमाण मिलते हैं कि काग़ज़ लगभग 100 ई. के आसपास चीन में बनाया गया। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, अलबरूनी ने स्पष्ट किया है कि 11वीं सदी के आसपास प्रारम्भिक वर्षों में मुस्लिम पूरी तरह से काग़ज़ का इस्तेमाल करने लगे थे। बहरत में इसका निर्माण तेरहवीं शताब्दी में ही आरम्भ हुआ जैसा कि अमीर ख़ुसरो ने उल्लेख किया है।
भारत में मुस्लिम सल्तनतों के स्थापित होने के बाद अरबी चिकित्सा विज्ञान ईरान के मार्ग से भारत पहुँचा। उस समय तक इसे यूनानी तिब्ब के नाम से जाना जाता था। परन्तु अपने वास्तविक रूप में यह यूनानी, भारतीय, ईरानी और अरबी चिकित्सकों के प्रयत्नों का एक सम्मिश्रण था। इस काल में हिन्दू वैद्यों और मुस्लिम हकीमों के बीच सहयोग एवं तादात्म्य स्थापित था। भारतीय चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से मुग़ल साम्राज्य को स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। दिल्ली की वास्तु-कला का वास्तविक गौरव भी मुग़लकालीन है। संगीत के क्षेत्र में सितार और तबला भी मुस्लिम संगीतज्ञों की देन है।
विभिन्न क्षेत्रों के इन्हीं सब तथ्यों के दायरे में यह पुस्तक तैयार की गई है। तीस अध्यायों की इस पुस्तक में ख़ास के विपरीत आम के कारनामों एवं योगदानों पर रोशनी डालने का प्रयास किया गया है। व्हेनत्सांग के विवरण को सबसे पहले पेश किया गया है ताकि मध्यकाल की सामन्तवादी पृष्ठभूमि को भी समझा जा सके। धातु तकनीक, रजत तकनीक, स्वर्ण तकनीक, काग़ज़ का निर्माण आदि के अलावा लल्ल, वाग्भट, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य, वतेश्वर, आर्यभट द्वितीय, श्रीधर, भास्कराचार्य द्वितीय, सोमदेव आदि व्यक्तित्वों के कृतित्व पर भी शोध-आधारित तथ्यों के साथ प्रकाश डाला गया है।
1965 Bharat-Pak Yuddha Ki Anakahi Kahani
- Author Name:
R.D. Pradhan
- Book Type:

- Description: 1965 भारत-पाक युद्ध की अनकही कहानी 1965 का युद्ध वर्ष 1947 में हुए विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पहला पूर्ण युद्ध था। भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री वाई.बी. चह्वाण ने 22 दिन तक चले इस युद्ध का विवरण स्वयं अपनी डायरी में दर्ज किया था। इस पुस्तक में बताई गई अंदरूनी बातों से पता चलता है— • पाकिस्तानी हमले के समय का पता करने में भारत का खुफिया विभाग बिलकुल विफल रहा। • कैसे और क्यों चह्वाण ने प्रधानमंत्री को सूचित किए बिना ही वायुसेना को हमला करने का आदेश दे दिया। • कैसे एक डिवीजन कमांडर को अभियान से अलग कर दिया गया। • कैसे एक सेना कमांडर ने अपनी ‘रेजीमेंट के महान् गौरव’ के लिए 300 से अधिक लोगों को कुरबान कर दिया। • भारतीय सेना ने लाहौर के अंदर कूच क्यों नहीं किया? • कैसे प्रधानमंत्री ने अपना धैर्य बनाए रखा और युद्ध के समय एक महान् नेता बनकर उभरे। • क्या यह युद्ध निरर्थक था, भारत ने युद्ध के मोर्चे पर जो कुछ जीता था, क्या वह सब ताशकंद में गँवा दिया था? और अंत में, राजनीतिक नेतृत्व ने कैसे रक्षा बलों के नेतृत्व के साथ फिर से अपने समुचित संबंध बहाल कर लिये और 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय पैदा हुई कड़वाहट को मिटा दिया। यह पुस्तक वायुसेना के सम्मान में लिखी गई है, जिसे स्वतंत्रता के बाद पहली बार युद्ध में लगाया गया था। यह उन बख्तरबंद रेजीमेंटों को भी श्रद्धांजलि है, जो इस युद्ध में बड़ी वीरता से लड़ीं और पैटन टैंकों के सर्वश्रेष्ठ होने के मिथक को तोड़ दिया।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book