Bihar Ke Gandhi Nitish Kumar
Author:
Shambhavi Choudhary, Ashok ChoudharyPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Unavailable
"जो लोग बिहार से सारी उम्मीदें छोड़ चुके थे, उनकी नजर में नीतीश कुमार ने एक चमत्कारी पुरुष का दर्जा हासिल कर लिया है। आखिर उन्होंने राज्य के पुनरुत्थान का काम कैसे किया ? नीतीश कुमार कोई पेशेवर प्रबंधक नहीं, एक राजनीतिज्ञ हैं। नवंबर 2005 में जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया, वे अधिकारियों को अकसर याद दिलाते थे कि सरकार के प्रदर्शन में उनके मंत्रालय का सबकुछ दाँव पर लगा है, न कि नौकरशाही का। अगर सरकार को कामयाबी मिलती है तो उसका सारा श्रेय उनके मंत्रालय को मिलेगा; अगर वह असफल रही तो उनके मंत्रालय को सारा दोष अपने सिर लेना होगा। नौकरशाहों की नौकरियाँ नहीं जाएँगी, उन्हें (मुख्यमंत्री को) जाना होगा।
इस प्रकार नीतीश कुमार ने जनता की मूल जरूरतों से जुड़े मुद्दों को हल करने की दिशा में काम करके लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना ली और सामाजिक क्रांति के पुरोधा के रूप में उभरे। सुधार की यह प्रक्रिया अनवरत जारी है।
नीतीश कुमार की सामाजिक क्रांति की अनकही, प्रेरक, रोचक और साहसिक अभियानों से रू-ब-रू कराती एक पठनीय एवं संग्रहणीय औपन्यासिक गाथा।"
ISBN: 9789355622167
Pages: 184
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: यह अल्पज्ञात तथ्य है कि चीन का ‘चीन’ नाम भारत का दिया हुआ है। चीन तो स्वयं को झुआंगहुआ कहता है। इससे भी अल्पज्ञात तथ्य यह है कि महाभारत काल में चीन भारत के सैकड़ों जनपदों में से एक था। प्रशांत महासागर के तट पर पीत नदी के पास यह लघु राज्य भारत से हजारों किलोमीटर दूरस्थ था। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपने इतिहास के अधिकांश में चीन भरतवंशी शासकों के अधीन अर्थात् परतंत्र रहा है। आज के विशाल चीन का निर्माण तत्कालीन सोवियत संघ, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका आदि के अनुग्रह, हस्तक्षेप और प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग से ही संभव हुआ है। अन्यथा पुराने चीन को कभी भी बाहरी शक्तियों से ऐसी व्यापक एवं प्रभावकारी सहायता नहीं मिलती। इसलिए यह चीन न होकर, विस्तारवादी और उपनिवेशवादी कम्युनिस्ट चीन है और इस प्रकार यह नैसर्गिक राष्ट्र न होकर कृत्रिम देश है। कम्युनिस्ट चीन के आततायी और दमनकारी साम्राज्यवाद से तिब्बतियों, मंगोलों, मांचुओं, तुर्कों और हानों की मुक्ति आवश्यक है और इसमें भारत की महती भूमिका हो सकती है। यह वैसे भी भारत का कर्तव्य है कि सदा से हमारे अभिन्न तथा आत्मीय रहे तिब्बत पर चीन का बलात् कब्जा कराने में मुख्य भूमिका भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री की ही रही। उन्होंने ही इतिहास में पहली बार चीन को भारत का पड़ोसी बनाया। अत: इस भयंकर भूल को सुधारना भारत का नैतिक दायित्व है। इन सभी दृष्टियों से यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक तथा अवश्य पठनीय है।
Best of Kaka Hatharasi
- Author Name:
Kaka Hatharasi
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- Description: "हास्यऋषि काका हाथरसी ने न केवल हिंदी कवि सम्मेलन के मंच पर हास्य को स्थापित किया, बल्कि उसको बहुत ऊँचा स्थान भी दिलाया। लोकप्रियता के शिखर पुरुष काका ने अपनी तुकांत एवं अतुकांत कविताओं के साथ अपने हास्य में जीवन की व्यापक विसंगतियों को समेटा। काकी के माध्यम से उन्होंने नारी को गरिमा प्रदान की। ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ या ‘लिंग भेद’ जैसी कविताएँ उनकी गहरी निरीक्षण क्षमता और खोजपूर्ण दृष्टि की परिचायक हैं। प्रस्तुत संकलन में उनकी वे कविताएँ हैं, जो कविता प्रेमियों के हृदयपटल पर राज करती आई हैं। यों काका की श्रेष्ठ कविताएँ एक संकलन के लिए छाँटना कठिन कार्य था, लेकिन इन कविताओं ने हास्य का इतिहास बनाया है। निर्मल हास्य द्वारा समाज में कैसे सुधार किया जा सकता है, ये कविताएँ हमें हँसाती हैं और यही सब सिखाती हैं।
Vaishvik Yug Ka Bharat : Aarthik Sudhar Aur Samaveshi Vikas Ka Aadhar
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END OF INDENTURE An Agonising Journey To Freedom
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Dr. Ruchi Verma +2
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- Description: Growing public outrage finally forced the abolition of the curse of slavery starting with the year 1833. An immensely welcome step soon brought to the fore another major challenge of severe labour shortages in the plantation colonies. The colonial rulers devised another deceptive tool of engaging large scale cheap labour for their plantations under the so-called ‘Indenture system’. The British carried out the largest such operation and mobilised close to 2 million workers from India and carried them to far off lands in the Caribbean, Africa and the Pacific. On the face of it, these workers were taken under a mutually agreed contract, called the ‘agreement’ which also led to the popular folklore of ‘girmit’. However, in terms of protection of the workers’ basic rights, this system was really no different from the erstwhile slavery. Generations of these workers struggled in agony for achieving the eventual liberation from this de-facto bondage. The plight of the indentured workers also deeply moved the Indian leadership especially Mahatma Gandhi who personally witnessed their sufferings in South Africa and Mauritius. Rising and loud criticism started demanding the abolition of indentureship in the plantation colonies, India and elsewhere. There was another unexpected pressure for able-bodied men for the First World War operations in Europe. These factors together forced the colonial powers to finally abolish the indenture system in the year 1917. Hence, the year 2017 marked the centenary of this landmark development widely celebrated along the entire 'indentured route' namely Mauritius, Fiji, Trinidad & Tobago, Guyana and Suriname. As in most of these countries, the majority of the populations are of Indian origin, this was also a cause for celebration in India. The Antar Rashtriya Sahayog Parishad with its 40 years of outreach with the Indian diaspora, especially the Girmitiya countries organised a special commemorative International conference on 20-22 April 2017 in collaboration with Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA) and Indian Council for Cultural Relations (ICCR). In addition to being addressed by Indian leadership, the conference was attended by over 100 experts from India and abroad. This book is a compilation of the proceedings, presentations and the outcomes of this important event. We hope that this publication would be useful to academics and scholars dealing with diaspora and history of the indentured system.
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