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‘वे आज़ाद थे’ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल रहे ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के सदस्यों द्वारा लिखित आलेखों और संस्मरणों का संकलन है। इन सभी आलेखों का प्रथम प्रकाशन यशपाल द्वारा सम्पादित तथा प्रकाशवती द्वारा प्रकाशित मासिक ‘विप्लव’ में हुआ था। स्वतंत्रता आन्दोलन और ख़ासतौर पर भगतसिंह की क्रान्तिकारी धारा के आन्दोलनकर्ताओं और उनके कार्यों के अनेक जाने-अनजाने तथ्यों को सामने लाने के अलावा यह प्रस्तुति हिन्दी के विशिष्ट कथाकार और स्वतंत्रता आन्दोलन में एक क्रान्तिकारी के रूप में सक्रिय यशपाल के विषय में फैलाई गईं भ्रान्तियों और दुष्प्रचार का भी निराकरण करती है, जो उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन के उपरान्त विशेष रूप में देखा गया था। इन आलेखों से गुज़रते हुए हम उस समय के क्रान्तिकारियों और उनके कार्यों से जुड़े ऐसे तथ्यों को भी जान पाएँगे, जो कालान्तर में किंवदन्तियों और कई बार इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत मिथ्या धारणाओं के घटाटोप में छिपे रह गए या अतिरंजनाओं के रूप में प्रचलित हुए। यहाँ प्रकाशित मूल सामग्री हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ और आज़ाद तथा भगतसिंह से सम्बन्धित ऐसी अनेक भ्रान्तियों को भी निरस्त करती है, जिनके चलते हम स्वाधीनता संघर्ष के उस दौर और उसके विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट रूप में नहीं समझ पाते। भारत के निर्णायक ऐतिहासिक क्षणों से साक्षात्कार करानेवाली यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी इतिहासकारों के लिए।
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‘वे आज़ाद थे’ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल रहे ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के सदस्यों द्वारा लिखित आलेखों और संस्मरणों का संकलन है। इन सभी आलेखों का प्रथम प्रकाशन यशपाल द्वारा सम्पादित तथा प्रकाशवती द्वारा प्रकाशित मासिक ‘विप्लव’ में हुआ था।
स्वतंत्रता आन्दोलन और ख़ासतौर पर भगतसिंह की क्रान्तिकारी धारा के आन्दोलनकर्ताओं और उनके कार्यों के अनेक जाने-अनजाने तथ्यों को सामने लाने के अलावा यह प्रस्तुति हिन्दी के विशिष्ट कथाकार और स्वतंत्रता आन्दोलन में एक क्रान्तिकारी के रूप में सक्रिय यशपाल के विषय में फैलाई गईं भ्रान्तियों और दुष्प्रचार का भी निराकरण करती है, जो उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन के उपरान्त विशेष रूप में देखा गया था।
इन आलेखों से गुज़रते हुए हम उस समय के क्रान्तिकारियों और उनके कार्यों से जुड़े ऐसे तथ्यों को भी जान पाएँगे, जो कालान्तर में किंवदन्तियों और कई बार इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत मिथ्या धारणाओं के घटाटोप में छिपे रह गए या अतिरंजनाओं के रूप में प्रचलित हुए। यहाँ प्रकाशित मूल सामग्री हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ और आज़ाद तथा भगतसिंह से सम्बन्धित ऐसी अनेक भ्रान्तियों को भी निरस्त करती है, जिनके चलते हम स्वाधीनता संघर्ष के उस दौर और उसके विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट रूप में नहीं समझ पाते।
भारत के निर्णायक ऐतिहासिक क्षणों से साक्षात्कार करानेवाली यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी इतिहासकारों के लिए।
Book Details
-
ISBN9788199170919
-
Pages472
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अतएव शब्द आर्य भारत की शाब्दिक सम्पत्ति है, इसे भारतीयों ने जन्म दिया, कभी प्रजाति के अर्थ में प्रयोग नहीं किया, इसे केवल श्रेष्ठता के अर्थ में प्रयोग किया जाता रहा है और इतिहास को इसी अर्थ में इसे संरक्षित करना चाहिए। इसलिए किसी अन्य देश का इसपर कोई दावा नहीं बनता है और न ही किसी इतिहासकार द्वारा किसी भी अन्य देश में आर्यों के मूल स्थान को ढूँढ़ने का आधार प्रदान करता है।
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