1857 : Awadh Ka Muktisangram
About the book
यशस्वी पत्रकार और विद्वान लेखक अखिलेश मिश्र की यह पुस्तक एक लुटेरे साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ अवध की जनता के मुक्ति-युद्ध की दस्तावेज़ है। अवध ने विश्व की सबसे बड़ी ताक़त ब्रिटेन का जैसा दृढ़ संकल्पित प्रतिरोध किया और इस प्रतिरोध को जितने लम्बे समय तक चलाया, उसकी मिसाल भारत के किसी और हिस्से में नहीं मिलती। पुस्तक 1857 की क्रान्ति में अवध की साँझी विरासत हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी रेखांकित करती है। इस लड़ाई ने एक बार फिर इस बात को उजागर किया था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियादें बहुत गहरी हैं और उन्हें किसी भेदनीति से कमज़ोर नहीं किया जा सकता। आन्दोलन की अगुवाई कर रहे मौलवी अहमदुल्लाह शाह, बेगम हजरत महल, राजा जयलाल, राणा वेणीमाधव, राजा देवी बख्श सिंह में कौन हिन्दू था, कौन मुसलमान? वे सब एक आततायी साम्राज्यवादी ताक़त से आज़ादी पाने के लिए लड़नेवाले सेनानी ही तो थे। इस मुक्ति-संग्राम का चरित प्रगतिशील था। न केवल इस संग्राम में अवध ने एक स्त्री बेगम हजरत महल का नेतृत्व खुले मन से स्वीकार किया, बल्कि हर वर्ग, वर्ण और धर्म की स्त्रियों ने इस क्रान्ति में अपनी-अपनी भूमिका पूरे उत्साह से निभाई, चाहे वह तुलसीपुर की रानी राजेश्वरी देवी हों अथवा कुछ वर्ष पूर्व तक अज्ञात वीरांगना के रूप में जानी जानेवाली योद्धा ऊदा देवी पासी। अवध के मुक्ति-संग्राम की अग्रिम पंक्ति में भले ही राजा, ज़मींदार और मौलवी रहे हों, लेकिन यह उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे किसानों और आम जनता का जुझारूपन था जिसने सात दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक 1857 के जनसंग्राम के कुछ ऐसे ही उपेक्षित पक्षों को केन्द्र में लाती है। आज 1857 के जनसंग्राम को याद करना इसलिए ज़रूरी है कि इतिहास सिर्फ़ अतीत का लेखा-जोखा नहीं, वह सबक भी सिखाता है। आज भूमंडलीकरण के इस दौर में जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट का जाल आम भारतीय को अपने फन्दे में लगातार कसता जा रहा है, ईस्ट इंडिया कम्पनी से लोहा लेनेवाले, उसे एक संक्षिप्त अवधि के लिए ही सही, पराजित करनेवाले वर्ष 1857 से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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About the Book
यशस्वी पत्रकार और विद्वान लेखक अखिलेश मिश्र की यह पुस्तक एक लुटेरे साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ अवध की जनता के मुक्ति-युद्ध की दस्तावेज़ है। अवध ने विश्व की सबसे बड़ी ताक़त ब्रिटेन का जैसा दृढ़ संकल्पित प्रतिरोध किया और इस प्रतिरोध को जितने लम्बे समय तक चलाया, उसकी मिसाल भारत के किसी और हिस्से में नहीं मिलती। पुस्तक 1857 की क्रान्ति में अवध की साँझी विरासत हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी रेखांकित करती है। इस लड़ाई ने एक बार फिर इस बात को उजागर किया था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियादें बहुत गहरी हैं और उन्हें किसी भेदनीति से कमज़ोर नहीं किया जा सकता। आन्दोलन की अगुवाई कर रहे मौलवी अहमदुल्लाह शाह, बेगम हजरत महल, राजा जयलाल, राणा वेणीमाधव, राजा देवी बख्श सिंह में कौन हिन्दू था, कौन मुसलमान? वे सब एक आततायी साम्राज्यवादी ताक़त से आज़ादी पाने के लिए लड़नेवाले सेनानी ही तो थे। इस मुक्ति-संग्राम का चरित प्रगतिशील था। न केवल इस संग्राम में अवध ने एक स्त्री बेगम हजरत महल का नेतृत्व खुले मन से स्वीकार किया, बल्कि हर वर्ग, वर्ण और धर्म की स्त्रियों ने इस क्रान्ति में अपनी-अपनी भूमिका पूरे उत्साह से निभाई, चाहे वह तुलसीपुर की रानी राजेश्वरी देवी हों अथवा कुछ वर्ष पूर्व तक अज्ञात वीरांगना के रूप में जानी जानेवाली योद्धा ऊदा देवी पासी। अवध के मुक्ति-संग्राम की अग्रिम पंक्ति में भले ही राजा, ज़मींदार और मौलवी रहे हों, लेकिन यह उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे किसानों और आम जनता का जुझारूपन था जिसने सात दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक 1857 के जनसंग्राम के कुछ ऐसे ही उपेक्षित पक्षों को केन्द्र में लाती है। आज 1857 के जनसंग्राम को याद करना इसलिए ज़रूरी है कि इतिहास सिर्फ़ अतीत का लेखा-जोखा नहीं, वह सबक भी सिखाता है। आज भूमंडलीकरण के इस दौर में जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट का जाल आम भारतीय को अपने फन्दे में लगातार कसता जा रहा है, ईस्ट इंडिया कम्पनी से लोहा लेनेवाले, उसे एक संक्षिप्त अवधि के लिए ही सही, पराजित करनेवाले वर्ष 1857 से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2020
- Weight
- 120 grams
- ISBN-13
- 9789389598308
- Pages
- 164
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 12.9 × 20 cm
- Language
- Hindi
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