Udarikaran Ki Tanashahi
(0)
Author:
Prem SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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यह पुस्तक उदारीकरण-भूमंडलीकरण की परिघटना पर केन्द्रित है। इसमें उदारीकरण के नाम से प्रचारित नई आर्थिक नीतियों के देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़नेवाले प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। पुस्तक की मुख्य स्थापना है : वैश्विक आर्थिक संस्थाओं—विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन—और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ‘डिक्टेट’ पर लादी जा रही आर्थिक ग़ुलामी का नतीजा राजनैतिक ग़ुलामी में निकलने लगा है।</p> <p>इसके साथ यह भी दर्शाया गया है कि आर्थिक और राजनैतिक के साथ सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों पर भी उदारीकरण की तानाशाही चल रही है। इसके लिए अकेले राजनैतिक नेतृत्व को ज़िम्मेदार न मानकर, भूमंडलीकरण के समर्थक बुद्धिजीवियों और विदेशी धन लेकर एनजीओ चलानेवाले लोगों को भी ज़िम्मेदार माना गया है।</p> <p>पुस्तक में भूमंडलीकरण को नवसाम्राज्यवाद का अग्रदूत मानते हुए साम्राज्यवादी सभ्यता के बरक्स वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया गया है।</p> <p>पुस्तक में सारी बहस देश और दुनिया की वंचित आबादी की ज़मीन से की गई है। इस रूप में यह सरोकारधर्मी और हस्तक्षेपकारी लेखन का सशक्त उदाहरण है।</p> <p>भाषा की स्पष्टता और शैली की रोचकता पुस्तक को सामान्य पाठकों के लिए पठनीय बनाती है।
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यह पुस्तक उदारीकरण-भूमंडलीकरण की परिघटना पर केन्द्रित है। इसमें उदारीकरण के नाम से प्रचारित नई आर्थिक नीतियों के देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़नेवाले प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। पुस्तक की मुख्य स्थापना है : वैश्विक आर्थिक संस्थाओं—विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन—और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ‘डिक्टेट’ पर लादी जा रही आर्थिक ग़ुलामी का नतीजा राजनैतिक ग़ुलामी में निकलने लगा है।</p>
<p>इसके साथ यह भी दर्शाया गया है कि आर्थिक और राजनैतिक के साथ सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों पर भी उदारीकरण की तानाशाही चल रही है। इसके लिए अकेले राजनैतिक नेतृत्व को ज़िम्मेदार न मानकर, भूमंडलीकरण के समर्थक बुद्धिजीवियों और विदेशी धन लेकर एनजीओ चलानेवाले लोगों को भी ज़िम्मेदार माना गया है।</p>
<p>पुस्तक में भूमंडलीकरण को नवसाम्राज्यवाद का अग्रदूत मानते हुए साम्राज्यवादी सभ्यता के बरक्स वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया गया है।</p>
<p>पुस्तक में सारी बहस देश और दुनिया की वंचित आबादी की ज़मीन से की गई है। इस रूप में यह सरोकारधर्मी और हस्तक्षेपकारी लेखन का सशक्त उदाहरण है।</p>
<p>भाषा की स्पष्टता और शैली की रोचकता पुस्तक को सामान्य पाठकों के लिए पठनीय बनाती है।
Book Details
-
ISBN9788126714902
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "मानव मन एक समुद्र की भाति है, इसमें लहरें उठती रहती हैं; कभी तट पर आकर सिर धुन-धुनकर वापस चली जाती हैं, कभी अपने अंदर ही समा जाती हैं। कभी इनमें कलयुग आता है, कभी सतयुग आता है। मनुष्य का हृदय कभी इन भावनाओं को स्पर्श नहीं कर पाता और कभी इनमें ओत-प्रोत हो जाता है, कभी प्राकृतिक सौंदर्य मन को लुभा लेता है और कभी सांसारिक वासनाओं में फँस दु:ख-सुख आते हैं | यही वे लहें है जो पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत हैं।"
Andamanatil Krantikarak
- Author Name:
Dr. Rupesh Patkar
- Book Type:

- Description: अंदमान म्हटले की तिथला सेल्युलर जेल आणि तिथे काळ्या पाण्याची शिक्षा भोगायला पाठवलेले क्रांतिकारक आठवतात. अंदमान हे भारतीय स्वातंत्र्यसैनिकांचे क्रांतितीर्थ ! भगतसिंहांचे सहकारी विजयकुमार सिन्हा अंदमानला 'भारताचे बॅस्टील' म्हणतात. बॅस्टील हा फ्रेंच राज्यक्रांतीचे प्रतीक बनलेला तुरुंग. बॅस्टीलच्या तुरुंगात डांबण्यात आलेल्या फ्रेंच क्रांतिकारकांनी सरंजामशाहीची कबर खणत स्वातंत्र्य, समता आणि बंधुभाव ही मूल्ये उद्घोषित केली. फ्रान्ससाठी जसा बॅस्टीलचा तुरुंग तसा भारतासाठी अंदमानचा तुरुंग ! अंदमानच्या या तुरुंगात शेकडो क्रांतिकारकांना डांबण्यात आले होते. पण या तुरुंगातदेखील हे क्रांतिकारक लढत होते, जसे फ्रेंच क्रांतिकारक बॅस्टीलमध्ये लढत होते. फ्रेंच क्रांतिकारकांनी बॅस्टीलचा तुरुंग फोडला तर अंदमानात डांबण्यात आलेल्या क्रांतिकारकांनी चिवट अन्नसत्याग्रह करून ब्रिटिश साम्राज्यशाहीला वाकायला भाग पाडले. त्यासाठी महावीर, मोहित आणि मोहन यांना बलिदान करावे लागले. अंदमानच्या तुरुंगातदेखील जराही न वाकता देदीप्यमान लढा देणाऱ्या क्रांतिकारकांची ही कथा म्हणजे विजयकुमार सिन्हा यांनी लिहिलेले, 'In Andamans, the Indian Bastille' हे पुस्तक. त्या पुस्तकातील गोष्ट मराठी वाचकांना सांगण्याचा हा प्रयत्न.
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