Romain Rolland Ka Bharat Vol. 1-2
(0)
Author:
Romain Rolland, Tayab HussainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
600
480 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
Aromain Rolland Ka Bharat Vol. 1-2
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
Aromain Rolland Ka Bharat Vol. 1-2
Book Details
-
ISBNRomainRollandKaBharatVol12HardCover
-
Pages484
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bhikhari Thakur : Angarh Hira
- Author Name:
Tayab Hussain
- Book Type:

- Description:
अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन के दूसरे अधिवेशन 1974 में, अपने अध्यक्षीय भाषा में भिखारी ठाकुर का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन ने कहा था—हम लोगों की बोली में कितनी ताकत है, कितना तेज है, यह आप लोग भिखारी ठाकुर के नाटकों में देखते हैं। लोगों को क्यों अच्छे लगते हैं भिखारी ठाकुर के नाटक? क्यों दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह हजार की भीड़ होती है इन नाटकों को देखने के लिए? लगता है कि इन्हीं नाटकों में जनता को रस मिलता है! जिस चीज में रस मिले, वही कविता है। किसी की बड़ी नाक हो और वह केवल दोष ही सूँघता फिरे तो उसके लिए... क्या कहा जाए। मैं यह नहीं कहता कि भिखारी ठाकुर के नाटकों में दोष नहीं हैं, दोष हैं तो उसका कारण भिखारी ठाकुर नहीं हैं, उसका कारण पढ़े-लिखे लोग हैं। वे लोग यदि अपनी बोली से नेह दिखलाते, भिखारी ठाकुर का नाटक देखते और उसमें कोई बात सुझाते तो ये सब दोष मिट जाते। भिखारी ठाकुर हम लोगों के एक अनगढ़ हीरा हैं। उनमें कुल गुण हैं, सिर्फ इधर-उधर थोड़ा तराशने की जरूरत है ।
यह पुस्तक उसी अनगढ़ हीरे के कृतित्व की समग्रता में पड़ताल करती है। यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि इस पुस्तक के लेखक ने ही भिखारी ठाकुर को अपने पी-एच.डी. का विषय बनाकर भोजपुरी के इस अप्रतिम नाटककार-कवि की तरफ अकादमिक जगत का ध्यान आकर्षित किया था। आज साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भिखारी ठाकुर का नाम अपरिचित नहीं है तो इसमें तैयब हुसैन की भूमिका को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इस पुस्तक में उन्होंने न केवल भिखारी के व्यक्तित्व-कृतित्व की बल्कि भोजपुरी समाज की और उसके सन्दर्भ से वस्तुत: उत्तर भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक गुत्थियों को खोलने का प्रयास किया है जो निश्चय ही विचारणीय और बहसतलब है।
Mahatma Gandhi : Jeewan Aur Darshan
- Author Name:
Romain Rolland
- Book Type:

- Description:
‘सत्याग्रह’ शब्द का आविष्कार गांधी जी ने तब किया था, जब वे अफ़्रीका में थे—उद्देश्य था अपनी कर्म-साधना के साथ निष्क्रिय-प्रतिरोध का भेद स्पष्ट करना। यूरोपवाले गांधी के आन्दोलन को ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (अथवा अप्रतिरोध) के रूप में समझना चाहते हैं, जबकि इससे बड़ी ग़लती दूसरी नहीं हो सकती। निष्क्रियता के लिए इस अदम्य योद्धा के मन में जितनी घृणा है, उतनी संसार के किसी दूसरे व्यक्ति में नहीं होगी—ऐसे वीर ‘अप्रतिरोधी का दृष्टान्त संसार में सचमुच विरल है। उनके दोलन का सारतत्त्व है—‘सक्रिय प्रतिरोध’, जिसने अपने प्रेम, विश्वास और आत्मत्याग की तीन सम्मिलित शक्तियों के साथ ‘सत्याग्रह’ की संज्ञा धारण की है।
कायर मानो उनकी छाया भी नहीं छूना चाहता, उसे वे देश से बाहर निकालकर रहेंगे। आलसी और अकर्मण्य की अपेक्षा वह अच्छा है, जो हिंसा से प्रेरित है। गांधी जी कहते हैं—“यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को ही पसन्द करूँगा। दूसरे को न मारकर स्वयं ही मरने का जो धीरतापूर्ण साहस है, मैं उसी की साधना करता हूँ। लेकिन जिसमें ऐसा साहस नहीं है, वह भी भागते हुए लज्जाजनक मृत्यु का वरण न करे—मैं तो कहूँगा, बल्कि वह मरने के साथ मारने की भी कोशिश करे; क्योंकि जो इस तरह भागता है, वह अपने मन पर अन्याय करता है। वह इसलिए भागता है कि मारते-मारते मरने का साहस उसमें नहीं है। एक समूची जाति के निस्तेज होने की अपेक्षा मैं हिंसा को हज़ार बार अच्छा समझूँगा। भारत स्वयं ही अपने अपमान का पंगु साक्षी बनकर बैठा रहे, इसके बदले अगर हाथों में हथियार उठा लेने को तैयार हो तो इसे मैं बहुत अधिक पसन्द करूँगा।”
बाद में गांधी जी ने इतना और जोड़ दिया— “मैं जानता हूँ कि हिंसा की अपेक्षा अहिंसा कई गुनी अच्छी है। यह भी जानता हूँ कि दंड की अपेक्षा क्षमा अधिक शक्तिशाली है। क्षमा सैनिक की शोभा है लेकिन क्षमा तभी सार्थक है, जब शक्ति होते हुए भी दंड नहीं दिया जाता। जो कमज़ोर है, उसकी क्षमा बेमानी है। मैं भारत को कमज़ोर नहीं मानता। तीस करोड़ भारतीय एक लाख अंग्रेज़ों के डर से हिम्मत न हारेंगे। इसके अलावा वास्तविक शक्ति शरीर-बल में नहीं होती, होती है अदम्य मन में। अन्याय के प्रति ‘भले आदमी’ की तरह आत्मसमर्पण का नाम अहिंसा नहीं है—अत्याचारी की प्रबल इच्छा के विरुद्ध अहिंसा केवल आत्मिक शक्ति से टिकती है। इसी तरह केवल एक मनुष्य के लिए भी समूचे साम्राज्य का विरोध करना और उसको गिराना सम्भव हो सकता है।”
Vivekanand
- Author Name:
Romain Rolland +2
- Book Type:

- Description:
महान् भारतीय सन्त एवं चिन्तक रामकृष्ण का आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करके उनके चिन्तन के बीज-कणों को सारे संसार में वितरित करने और अपना कार्य सफलतापूर्वक सम्पादित करनेवाले विवेकानन्द का जीवन निश्चय ही अत्यन्त गौरवपूर्ण एवं प्रेरणादायक है। विवेकानन्द ने अपनी यात्राओं एवं रामकृष्ण मिशन की स्थापना द्वारा पूर्व और पश्चिम के बीच निश्चय ही एक आध्यात्मिक पुल का निर्माण किया है। विश्व-विख्यात फ्रांसीसी उपन्यासकार रोमां रोलां कृत विवेकानन्द की जीवनी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कराकर साहित्य अकादेमी ने एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। विवेकानन्द के जीवन, कार्यों एवं विचारों का सम्यक् परिचय तो इसमें है ही, रामकृष्ण के जीवन एवं सिद्धान्तों को भी संक्षिप्त रूप में दे दिया गया है, जिससे इस कृति की उपयोगिता और भी बढ़ गई है।
दो वर्ष भारत-भर में और अनन्तर तीन वर्ष विश्व-भर में उनका परिभ्रमण उनकी स्वतंत्र स्वाभाविक चेतना और सेवा-भावना का सहज ही यथेष्ट पूरक सिद्ध हुआ। वह घर-समाज के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद, ईश्वर के साथ निरंतर अकेले घूमते रहे। उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा न था जिसमें उन्होंने ग्राम में, नगर में, धनी के, निर्धन के जीवन-स्पन्दन की वेदना, लालसा, कुत्सा और पीड़ा से साक्षात् न किया हो। वह जन के जीवन से एकाकार हो गए। जीवन के महाग्रन्थ में उन्हें वह मिला जो पुस्तकालय की समस्त पोथियों में नहीं मिला था।
पथचारी शिक्षार्थी के रूप में कैसी अद्वितीय शिक्षा उनको मिली!... अस्तबल में या भिखारी-टोले में सो रहनेवाले जगत्-बन्धु ही नहीं थे, वह समदर्शी थे...आज अछूतों के आश्रय में पड़े तिरस्कृत मँगते हैं तो कल राजकुमारों के मेहमान हैं, प्रधानमन्त्रियों और महाराजाओं से बराबरी पर बात कर रहे हैं, कभी दीनबन्धु रूप में पीड़ितों की पीड़ा को समर्पित हो रहे हैं, तो कभी श्रेष्ठियों के ऐश्वर्य को चुनौती दे रहे हैं और उनके निर्मम मानस में दुखी जन के लिए ममता जगा रहे हैं। पंडितों की विद्या से भी उनका परिचय था और औद्योगिक एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उन समस्याओं से भी, जो जनजीवन की नियामक हैं। वह निरन्तर सीख रहे थे, सिखा रहे थे और अपने को धीरे-धीरे भारत की आत्मा, उसकी एकता और उसकी नियति का प्रतीक बनाते जा रहे थे। ये तत्त्व उनमें समाहित थे और सारे संसार ने इनके दर्शन विवेकानन्द में किये।
Ramkrishna Pramhans
- Author Name:
Romain Rolland
- Book Type:

- Description:
“मुझे एक ऐसे महापुरुष के चरणों में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसका जीवन उसकी समस्त शिक्षाओं व उपदेशों की अपेक्षाकृत हज़ारों गुणा अधिक उपनिषदों की वाणी की एक उत्कृष्ट जीवित व्याख्या है, जो वास्तव में मानवरूप में उपनिषदों की एक जीवित आत्मा है...जो भारत के विभिन्न विचारों का समन्वय है...।” यह महापुरुष और कोई नहीं, रामकृष्ण परमहंस थे।
स्वामी विवेकानन्द आगे लिखते हैं : “भारत-भूमि हमेशा विचारकों और ऋषियों से समृद्ध रही है। शंकर के पास एक महान मस्तिष्क था और चैतन्य के पास एक विशाल हृदय था और अब वह समय आ गया था जब मस्तिष्क और हृदय—इन दोनों के एक समन्वित मूर्तरूप की आवश्यकता थी—एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जिसके अन्दर एक ही शरीर में शंकर के चमत्कारिक मस्तिष्क और चैतन्य के आश्चर्यजनक रूप से उदार व विशाल हृदय का समावेश हो; जो प्रत्येक सम्प्रदाय में एक ही आत्मा, एक ही परमात्मा को कार्य करते हुए देखता हो; जो प्रत्येक वस्तु के अन्दर भगवान को देखता हो, जिसका हृदय इस संसार में भारतवर्ष व उसके बाहर सब जगह समस्त दीन-दुखियों, दुर्बलों, पददलितों और पीड़ितों के लिए आर्तनाद करता हो और इसके साथ ही जिसकी विशाल तीव्र बुद्धि परस्पर विरोधी विभिन्न सम्प्रदायों के बीच संगति स्थापित करनेवाले उदार विचारों की कल्पना करती हो...और उनमें संगति स्थापित करके मस्तिष्क और हृदय के एक सार्वभौम धर्म को जन्म देनेवाली हो—ऐसे मनुष्य ने जन्म लिया था।...समय उसके अनुकूल था, यह आवश्यक था कि ऐसे मनुष्य का जन्म हो, और वह आया था, और सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि उसका कर्मक्षेत्र एक ऐसी नगरी के निकट था, जो पाश्चात्य विचारों से पूर्ण थी, जो पश्चिमी विचारों के पीछे पागल हो उठी थी और जिस नगरी ने भारत के अन्य सब नगरों की अपेक्षा कहीं अधिक आचार-विचारों को अपनाया था। ऐसे स्थान में, बिना किसी किताबी ज्ञान के वह रहता था। इस महान मनीषी को अपना नाम तक भी लिखना न आता था, परन्तु हमारे विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े प्रतिभाशाली स्नातक उसकी बुद्धि की विराट शक्ति को देखकर दंग रह जाते थे...वह अपने समय का महान ऋषि था, जिसकी शिक्षाएँ वर्तमान समय के लिए सबसे अधिक लाभदायक हैं।”
...यदि मैं आपको एक भी सत्य बात कहता हूँ तो वह उसकी और केवल उसकी है और यदि मैंने आपसे कोई भ्रान्तिपूर्ण या ग़लत बातें कही हैं, तो वे सब मेरी अपनी हैं, उनका उत्तरदायित्व मेरे ऊपर है।’’
“जिस मनुष्य की मूर्ति की मैं यहाँ स्थापना करना चाहता हूँ, वह तीस करोड़ नर-नारियों के दो सहस्र वर्षव्यापी आध्यात्मिक जीवन का परिपूर्ण रूप है। यद्यपि चालीस वर्ष हुए, उसका देहावसान (सन् 1886) हो चुका है, तथापि उसकी आत्मा आधुनिक भारत को प्राणदान कर रही है। वह गांधी के समान कर्मवीर नहीं था, कला या विचार में गेटे व टैगोर के समान प्रतिभाशाली नहीं था। वह बंगाल के एक छोटे से गाँव का रहनेवाला ब्राह्मण था, जिसका बाह्य जीवन संकीर्ण रूढ़ियों की सीमा में आबद्ध था। उसमें उल्लेख योग्य कोई विशेष घटना न थी, और तात्कालिक सामाजिक व राजनीतिक हलचल से वह सर्वथा पृथक् था; परन्तु उसके आन्तरिक जीवन में नाना देवताओं और मानवों का एक विचित्र समावेश था। उसका अभ्यन्तरीय जीवन उस सकल शक्ति की मूलाधार स्वरूपिणी दैवी ‘शक्ति’ का अंशमात्र था, जिस दैवी शक्ति की मिथिला के प्राचीन कवि विद्यापति और बंगाल के कवि रामप्रसाद ने वन्दना की है।
—रोमां रोलां
Jirah Ajudhia
- Author Name:
Rakesh Tewari
- Book Type:

- Description:
‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Main Koi Aur
- Author Name:
Padmaja
- Book Type:

- Description:
स्मृतिलोप से स्मृतियुक्त समय में वापसी का आख्यान या कुछ पुराने और बहुत कुछ नए बनते अनुभव-संसार में जीने की डायरी। वर्तनी और व्याकरण के फ़्रेम से बाहर, जीवन की चालढाल में बनती हुई भाषा में लिखी गई यह किताब–‘मैं कोई और’–जीवन संघर्ष का गद्य है। अविश्वसनीय, किन्तु विश्वसनीय। रचनात्मक और प्रेरक।
Dostoevsky Ka Ghoda
- Author Name:
Shachinder Arya
- Book Type:

- Description:
शचींद्र आर्य की किताब 'दोस्तोएवस्की का घोड़ा' से गुज़रते कुछ ऐसा एहसास हुआ कि कोई अपने मन के अंतरंग कोनों अतरों को परत दर परत उधेड़ रहा है बिना हिचक के, ज़रा निस्संग हुये और एक जगह जहाँ वो लिखते हैं, कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम खुद होते हैं अपने आप में बिलकुल नंगे, तो इन्हीं गलियों में शचींद्र हमें लिये चलते हैं, बहुत ईमानदारी से, बहुत हौसले से। बहुत सरलता से। इन पन्नों में हम उनके बचपन, उनके परिवार, उनकी दुनिया और दोस्त अहबाब, जि़ंदगी के तमाम ज़द्दोज़हद और रंगीनी, जीवन के दुलार और मीठेपन को उनकी नज़र से देखते चलते हैं, उनके पढऩे और उन पढ़े का उनपर असर को देखते हैं और धीरे-धीरे उनकी दुनिया हमारे भीतर सहजता से प्रवेश करती जाती है। एक किस्म के ठहराव और संजीदगी के साथ। तब उनकी दुनिया सिर्फ उनकी नहीं रह जाती, कुछ कुछ हमारी भी होती जाती है। कथेतर के इस कथ्य में उन्होंने जो पारदर्शिता दिखाई है, जो बुनावट और कहन का हुनर दिखाया है, जो परिपक्वता दिखाई है वो खुशी और उम्मीद जगाने वाली बात है। इसलिये भी कि वो पारंपरिक विधा से अपने को अलग करते दिखते हैं। डायरी की विधा ऐसी नहीं कि नई है पर शुरुआती दौर में इस तरह की दुनिया में प्रवेश कर लेने की साध सुखद है। ये सचमुच 'याद की किताब' है' और उनकी याद में हमारी याद भी घुलती मिलती चलती है, इसकी उन्हें बहुत बधाई और अशेष शुभकामनायें। —प्रत्यक्षा
Dastambu
- Author Name:
Mirza Ghalib
- Book Type:

- Description:
मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ाँ ग़ालिब का नाम भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महान कवियों में शामिल है! मिर्ज़ा ग़ालिब ने 1857 के आन्दोलन के सम्बन्ध में अपनी जो रूदाद लिखी है, उससे उनकी राजनीतिक विचारधारा और भारत में अंग्रेज़ी राज के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण को समझने में काफ़ी मदद मिल सकती है! अपनी यह रूदाद उन्होंने लगभग डायरी की शक्ल में प्रस्तुत की है। और फ़ारसी भाषा में लिखी गई इस छोटी-सी पुस्तिका का नाम है—‘दस्तंबू’। फ़ारसी भाषा में 'दस्तंबू' शब्द का अर्थ है पुष्पगुच्छ, अर्थात् बुके (Bouquet)। अपनी इस छोटी-सी किताब 'दस्तंबू' में ग़ालिब ने 11 मई, 1857 से 31 जुलाई, 1857 तक की हलचलों का कवित्वमय वर्णन किया है। 'दस्तंबू' में ऐसे अनेक चित्र हैं जो अनायास ही पाठक के मर्म को छू लेते हैं। किताब के बीच-बीच में उन्होंने जो कविताई की है, उसके अतिरिक्त गद्य में भी कविता का पूरा स्वाद महसूस होता है। जगह-जगह बेबसी और अन्तर्द्वन्द्व की अनोखी अभिव्यक्तियाँ भरी हुई हैं। इस तरह 'दस्तंबू' में न केवल 1857 की हलचलों का वर्णन है, बल्कि ग़ालिब के निजी जीवन की वेदना भी भरी हुई है। ‘दस्तंबू’ के प्रकाशन को लेकर ग़ालिब ने अनेक लम्बे-लम्बे पत्र मुंशी हरगोपाल ‘तफ़्त:’ को लिखे हैं। अध्येताओं की सुविधा के लिए सारे पत्र पुस्तक के अन्त में दिए गए हैं। भारत की पहली जनक्रान्ति, उससे उत्पन्न परिस्थितियाँ और ग़ालिब की मनोवेदना को समझने के लिए ‘दस्तंबू’ एक ज़रूरी किताब है। इसे पढ़ने का मतलब है सन् 1857 को अपनी आँखों से देखना और अपने लोकप्रिय शाइर की संवेदनाओं से साक्षात्कार करना। —भूमिका से
Ras Bhang
- Author Name:
Akshaya Bahibala +1
- Book Type:

- Description:
1998 से 2008 तक, अक्षय बहिबाला भाँग की गिरफ़्त में थे–गाँजा पीते, भाँगे खाते और पीते, पुरी के समुद्री तट पर विदेशियों, हिप्पियों, बैकपैकर्स और दूसरे भगोड़ों के साथ व्यसन में कभी भंड तो कभी बेहद अवसाद में! फिर वह उस किनारे से लौटते हैं, जिसके आगे जीवन में कोई राह नहीं थी। वह जीने की कोशिश करते हैं, कभी वेटर बनकर, कभी सेल्समैन तो कभी पुस्तक-विक्रेता के रूप में वापसी की कोशिशें करते हैं। इस असाधारण किताब की शुरुआत वह अपने व्यसन के दौर के टूटे-बिखरे किरचों को जोड़ते हुए करते हैं। वहाँ से ओडिशा के सुदूर कोनों में बैठे लोगों की कहानियों तक पहुँचते हैं, जिनकी ज़िन्दगी भाँग, गाँजा और अफ़ीम के गिर्द घूमती है। इनमें एक सरकारी लाइसेंसशुदा भाँग की दुकान वाला है जो सबसे शुद्ध भाँग देने की गर्वीली घोषणा करता है और ज़ोर देकर कहता है कि भाँग तो लोगों को यीशु बना सकता है। एक अफ़ीम कटर है जिसने अपने बचपने में अफ़ीम के ढेर को सरसों तेल से ढीला कर छोटे टैबलेट बनाना सीखा। एक लड़की भी है, जिसने अफ़ीम चाटकर हैजा को मात दी और फिर आजीवन एडिक्ट रही। गाँजे की खेती करनेवाला भी है, तो आबकारी विभाग के लोगों की कहानी भी जो गाँजे की खेती को नष्ट करने जाते हैं और गुस्साए गाँववाले उनको पीट देते हैं। इन कहानियों के साथ गुँथे हैं—गाँजे और अफ़ीम की ज़ब्ती और नष्ट करने के सरकारी आँकड़े, भाँग के औषधीय उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट और भाँग लड्डू और शर्बत बनाने की रेसिपी भी। भारत के शायद सबसे लोकप्रिय नशों में एक की यादों, क़िस्सों, तथ्यों और आँकड़ों का नशीला, अलहदा और बेहद मनोरंजक सफ़र!
Deh Hi Desh : Croatia Prawas Diary
- Author Name:
Garima Shrivastava
- Book Type:

- Description:
इस डायरी में पाठक ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता है, लगता है कोई तेज़ नश्तर उसके सीने पर रख दिया गया है और पृष्ठ-दर-पृष्ठ उसे भीतर उतारा जा रहा है। हिन्दी में ऐसे लेखन और ऐसी यात्राओं का जितना स्वागत किया जाए, कम है। — नित्यानंद तिवारी (आलोचक) यह सिर्फ़ डायरी नहीं यात्रा भी है, बाहर से भीतर और देह से देश की, जो बताती है कि देह पर ही सारी लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं और सरहदें तय होती हैं। — अभय कुमार दुबे(राजनीतिक विश्लेषक) ऐसे लोग जो भीड़ की हिंसा के समर्थन में होते हैं, उन्हें यह डायरीनुमा किताब दी जाए तो वे क्या करेंगे, अपनी चुप्पी पर झुंझलाते हुए इसे जला देंगे? मेरे ख़याल से उन्हें जलाने के लिए ही सही यह डायरी पढ़ — रवीश कुमार (पत्रकार)
Memories Are Forever
- Author Name:
Sarika Giria
- Book Type:

- Description:
This diary is a compilation of my feelings, emotions and experiences. It is a saga of the highs and lows which I have undergone in the roller coaster called life. A bouquet of the joyous moments, when I have laughed so hard that tears have rolled down my cheeks. A bucket of tears that I have shed till there were no more to spare
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
- Author Name:
Balwant Kaur
- Book Type:

- Description:
जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ती गई, मैंने कट्टरपन्थियों के पागलपन का विरोध करने की हमेशा कोशिश की, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।...मुझे पता था कि मेरे बचपन के सपनों का भारत बिखर गया था। शायद बलवन्त का भारत भी बिखर गया इसीलिए मैं और वह इस असामान्य प्रस्तावना के ज़रिये एक सह-अनुभूति रखते हैं, जिसे मैं पेश कर रही हूँ क्योंकि जब मैं इस अशान्त राष्ट्र के इतिहास को याद करती हूँ तो मेरा मन इसी तरह भटकता है। -उमा चक्रवर्ती इतिहासकार क्या बलवन्त कौर की यह कृति आत्मकथा, साहित्य-अध्ययन, इतिहास और समाजशास्त्र के बीच आवाजाही करती है? नहीं; यह इन सबको एक साथ लाकर बल्कि मिलाकर अन्दरूनी सरहदों से मुक्त एक अवकाश बनाती है जिसमें आप किसी अनुशासन के प्रति आत्मसजग हुए बगैर घूम-फिर सकते हैं। आपको पता नहीं चलता कि कब व्यक्तिगत संस्मरण सुनते-सुनते साहित्यिक कृतियों के साथ आपका संवाद शुरू हो गया और कब इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के हवाले से आप हिंसा, पहचान, अन्यीकरण, विभाजन-विस्थापन के सवालों से दो-चार होने लगे। विभाजन और उसकी निरन्तरता पर यह निस्सन्देह एक अनोखी किताब है। —संजीव कुमार आलोचक
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
Balwant Kaur
20% off₹ 399
₹ 319.2
Available
J. Krishnamurti Ke Darshnik Vichar
- Author Name:
Swati Gautam
- Book Type:

- Description:
प्रसिद्ध दार्शनिक, आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार जे. कृष्णमूर्ति ने विभिन्न स्थानों पर विभिन्न वार्त्ताओं में अनगिनत विषयों पर बात की। उन्हीं विषयों में से कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर उनके विचारों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। हमारे रिश्ते, दुःख का जन्म कैसे होता है? हमारी व्यवस्थाएँ कैसी हैं? हमारा मन कैसे काम करता है? ध्यान, प्रेम, मृत्यु। अपने जीवन में हम कैसे संबंध स्थापित करें ? भले ही हम इस अत्यधिक समाज में रह रहे हैं, परंतु यही आधुनिकता हमें अपना दास बना रही है। यदि हम दास हैं तो हम स्वतंत्र कैसे हुए ? हम पूरी दुनिया को अपने नए-नए आविष्कारों से अचंभित कर रहे हैं, परंतु हमारा मन अब तक हमारी बात नहीं मानता। हमारे रिश्ते बस एक-दूसरों से अपेक्षा पर ही टिके हुए हैं; क्या हो अगर हमारी अपेक्षाएँ खत्म हो जाएँ? मृत्यु कैसे हमारे जीवन का ही एक पहलू है, वह हमसे भिन्न नहीं है। कैसे हम अपने जीवन में सुख की तलाश में अनगिनत दुःखों का कारण बनते हैं। क्या सुख कोई ऐसी वस्तु है, जिसे बाहरी रूप से प्रकट किया जा सकता है? या फिर वह हमारे मन की एक अवस्था है, जहाँ सुख से जन्म लेता है। क्या प्रेम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और एक-दूसरे के लेन-देन पर ही संबंधित है या प्रेम एक भिन्न अवस्था है? जो किसी पुष्प-खुशबू की भाँति है, सबके लिए और सभी जगह। प्रेम की असली परिभाषा क्या है ? और अंतिम विषय जिसकी इस पुस्तक में चर्चा की गई है, वह है ध्यान; ध्यान क्या है, ध्यान क्यों आवश्यक है ? आध्यात्मिक और दार्शनिक उन्नयन के लिए एक आवश्यक पुस्तक ।
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Manusmriti
- Author Name:
Dr. Ramchandra Verma Shastri
- Book Type:

- Description:
मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Sanlap
- Author Name:
Bhagwandas Morwal +2
- Book Type:

- Description:
अपनी साफ़गोई, कथा-विषयों की विविधता और अपनी रचनाओं के लिए श्रम-साध्य शोध और उद्यमिता के लिए सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल इस पुस्तक में उन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जिनका ताल्लुक उनके लेखन, उनकी पुस्तकों, और पात्रों के अलावा हमारे समय, समाज और हिन्दी साहित्य के परिदृश्य से भी है। इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार संकलित हैं। ये साक्षात्कार न सिर्फ़ उनके बारे में बताते हैं, बल्कि इन प्रश्नोत्तरों के माध्यम से भारतीय समाज के विरोधाभासों, उसकी बेचैनियों और बतौर एक नागरिक लेखक की ज़िम्मेदारियों पर भी रौशनी डालते हैं। ‘काला पहाड़’ जैसे चर्चित उपन्यास से हिन्दी क्षितिज पर उभरे मोरवाल यहाँ इसके अलावा अन्य उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया और उनके साथ जुड़े अपने सरोकारों को भी रेखांकित करते हैं। अपने समाज और ख़ासतौर पर, मेवात क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक बनावट से उनका गहरा परिचय रहा है, जो उनके कई उपन्यासों में भी प्रकट हुआ है, यहाँ इस बारे में वे और विस्तार से बात करते हैं; समाज और साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर उनकी बेलाग अभिव्यक्ति तो इन साक्षात्कारों का आकर्षण है ही।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar +1
- Book Type:

- Description:
क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vishamta : Ek Punarvivechan
- Author Name:
Amartya Sen +1
- Book Type:

- Description:
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की एक दार्शनिक रचना है—‘विषमता’। उनकी कई एक विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों के बीच इस रचना का शुमार उनकी सोच की कुंजी के बतौर होता है। निस्संदेह यह प्रोफेसर सेन की कुछ सर्वाधिक कठिन पुस्तकों में से भी एक है। कठिन यह इस अर्थ में नहीं है कि कोई लंबी-चौड़ी उलझी हुई लफ़्फ़ाज़ी इसमें की गई है, बल्कि इस अर्थ में कि स्वतंत्रता, समानता, विविधता आदि अवधारणाओं का प्रयोग यहाँ इतने व्यापक संदर्भों में हुआ है कि उनका आदी होने में किसी को भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए। इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के बीच मौजूद भारी विविधताओं को केंद्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहनेवाले आदिवासी या स्वेच्छया सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता–सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्य की किसी भी गढ़ी-गढ़ाई परिभाषा से वे ठोस रूपाकार वाले मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों के सामर्थ्य पर है। स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन के विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा पहले से बढ़ चुका होगा।
Aapka Manto
- Author Name:
Mohammed Aslam Parvez
- Book Type:

- Description:
इस किताब में मंटो के अब तक मौजूद सभी खत संकलित किए गए हैं। हिंदी पढ़ने वालों के लिए मंटो साहब का नाम कोई नया नहीं। हिंदी वालों का भी मंटो पर उतना ही हक है, जितना उर्दू वालों का। इस वजह से हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग इन खतों के जरिए मंटो की जिंदगी के उस हिस्से से भी रूबरू होगा, जिस पर अभी बहुत ज्यादा रौशनी नहीं पड़ी है। अब तक मंटो के मौजूद खत की संख्या 142 है, जो उसकी लिखी गई कहानियों की संख्या से भी बहुत कम है। मौजूद खत में सबसे ज्यादा खत मंटो ने अहमद नदीम कासमी को ही लिखे हैं। इन खतों के जरिए मंटो की जो तस्वीर कावि के मन में उभरती है, उसे अगर एक वाक्य में कहें तो हम ‘a man without a mask’ कह सकते हैं। उर्दू साहित्य की दुनिया में मोहम्मद असलम परवेज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक लंबे समय से वे रंगकर्मी के तौर पर हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी रंगमंच से जुड़े हैं। उनके लिखे कई नाटक मुंबई के पृथ्वी और टाटा थिएटर के अलावा दूसरे शहरों में खेले जाते रहे हैं। इसके अलावा, मराठी और गुजराती में उनके नाटक पेशेवर मंच पर भी खेले जाते रहे हैं। मोहम्मद असलम परवेज की एक पहचान मंटो के आलोचक के रूप में भी है। उन्होंने मंटो को नित नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की। मंटो के हवाले से उनकी किताबें ‘आप का मंटो’, ‘मंटो और चचा सैम’, ‘मंटो: अफसानों के दरमियान’, और ‘मंटो: स्याह हाशिए और हाशिया रेखाएँ’ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
Meri Maa Meri Gangster
- Author Name:
Arundhati Roy +1
- Book Type:

- Description:
अठारह बरस की उम्र में अरुंधति रॉय जिस माँ को छोड़कर भागीं, उनकी मौत से जज़्बाती तौर पर वह इस क़दर बिखर गईं कि उनकी यादों को सहेजते हुए उन्होंने यह असाधारण आख्यान लिखना शुरू किया। यह शानदार संस्मरण अन्तरंग है और प्रेरक भी, बहुत बार परेशान करने वाला और हैरानी की हद तक दिलचस्प भी। बचपन से लेकर वर्तमान तक, आयमनम से लेकर दिल्ली तक के सफ़र की यह गाथा हमें उन हालात से भी रूबरू कराती है, जिसने उन्हें वह इनसान और लेखक बना दिया, जो वह आज हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book