Shiksha Ke Madhyam Se Rashtra-Nirman
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Author:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जिस 'न्यू इंडिया' की कल्पना की है, उसकी आधारशिला के रूप में भारत को एक ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, जो तेजी से बदलते समाज और गतिशील दुनिया की चुनौतियों को अवसरों में बदल सके और खुशहाल भारत का निर्माण कर सके। गहन अध्ययन-मनन और चिंतन के उपरांत तैयार की गई नई शिक्षा नीति-2020 पूर्णतया भारत-केंद्रित होने के साथ गुणवत्तापरक, नवाचारयुक्त, व्यावहारिक, प्रौद्योगिकीयुक्त, अंतरराष्ट्रीय, वैज्ञानिक और कौशलयुक्त है । कुल मिलाकर नई शिक्षा नीति NEP-2020 130 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। नई शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय परंपरागत ज्ञान, संस्कृति, भाषाओं, परंपराओं और मानवीय मूल्यों के विकास पर विशेष जोर दिया है और इस नीति में स्पष्ट है कि शिक्षा केवल शिक्षकों और पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान एवं जानकारी के बारे में नहीं है। यह उन मूल्यों, क्षमताओं और व्यवहार को विकसित करने के बारे में है, जो एक स्थिर समाज बनाने के लिए शांति, न्याय और समावेशिता के गुण विकसित करते हैं। निश्चित रूप से भारत को शिक्षा के आकर्षक केंद्र के रूप में स्थापित कर नई शिक्षा नीति भारत के विश्वगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
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हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जिस 'न्यू इंडिया' की कल्पना की है, उसकी आधारशिला के रूप में भारत को एक ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, जो तेजी से बदलते समाज और गतिशील दुनिया की चुनौतियों को अवसरों में बदल सके और खुशहाल भारत का निर्माण कर सके। गहन अध्ययन-मनन और चिंतन के उपरांत तैयार की गई नई शिक्षा नीति-2020 पूर्णतया भारत-केंद्रित होने के साथ गुणवत्तापरक, नवाचारयुक्त, व्यावहारिक, प्रौद्योगिकीयुक्त, अंतरराष्ट्रीय, वैज्ञानिक और कौशलयुक्त है ।
कुल मिलाकर नई शिक्षा नीति NEP-2020 130 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। नई शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय परंपरागत ज्ञान, संस्कृति, भाषाओं, परंपराओं और मानवीय मूल्यों के विकास पर विशेष जोर दिया है और इस नीति में स्पष्ट है कि शिक्षा केवल शिक्षकों और पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान एवं जानकारी के बारे में नहीं है। यह उन मूल्यों, क्षमताओं और व्यवहार को विकसित करने के बारे में है, जो एक स्थिर समाज बनाने के लिए शांति, न्याय और समावेशिता के गुण विकसित करते हैं।
निश्चित रूप से भारत को शिक्षा के आकर्षक केंद्र के रूप में स्थापित कर नई शिक्षा नीति भारत के विश्वगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
Book Details
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ISBN9789394534803
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description: सप्तसिंधु क्षेत्र की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे पहली घटना तो मोहनजोदड़ो, हड़प्पा सभ्यता का उदय था, जिससे कालांतर में सिंधु सरस्वती सभ्यता का विकास हुआ। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं पूजा-पद्धति का आधार सिंधु-सरस्वती घाटी में ही मिलता है। कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध इस क्षेत्र की ऐसा घटना है, जिसने पूरे हिंदुस्थान की सेनाओं को सप्तसिंधु के मैदानों में लाकर खड़ा कर दिया था। इन्हीं वैदिक परंपराओं का विकास श्रवण परंपराओं में हुआ, जिनके संश्लेषण की आधार भूमि भी सप्तसिंधु क्षेत्र ही बना। उसके सैकड़ों साल बाद यही सप्तसिंधु का क्षेत्र अरब से उठी सामी चिंतन की आँधी का शिकार हुआ। हमले क्योंकि सप्तसिंधु क्षेत्र से ही होते थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसे ही झेलना पड़ा । लेकिन इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए? यह उस युग की सबसे बड़ी चुनौती थी। इस मरहले पर दशगुरु परंपरा का उदय होना दैवी योजना ही कही जा सकती है। गुरु नानक देवजी इस परंपरा के संस्थापक थे। दशगुरु परंपरा का मूल्यांकन आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हुआ है, लेकिन उसके ऐतिहासिक व सामाजिक क्षेत्र में योगदान को वरीयता नहीं दी गई। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कुदाल चलाने की आवश्यकता है। यह पुस्तक दशगुरु परंपरा के इसी क्षेत्र में किए गए योगदान को प्रकाश में लाने का स्तुत्य प्रयास है।
Europe Mein Darshanshastra : Marx Ke Baad
- Author Name:
Shankari Prasad Bandyopadhyay
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Aranyapantha
- Author Name:
Pt. Sanjay Tignath
- Book Type:

-
Description:
‘अरण्यपंथा’ में वे समस्त मौलिक दुविधाएँ अन्तर्निहित हैं जो ज्ञान के गहन प्रान्तरों में विद्यमान हैं, क्योंकि ‘अरण्यपंथा’ उन्हीं के अपार और संकीर्ण पथ से निकलती है। इसमें मात्र आशय है किन्तु प्रयोजन स्पष्ट नहीं है। यदि प्रयोजन के आग्रह को त्यागा जा सकता हो तो सम्भवतः ‘अरण्यपंथा’ रुचिकर लगे।
मैंने उपनिषद ग्रन्थों का पुनर्अध्ययन किया और यहाँ पाया कि मैं उनकी अनुभूतियों को पहले की अपेक्षा अधिक निकटता से अनुभव कर रहा था, तथापि ‘अरण्यपंथा’ न तो वैज्ञानिक व्याख्याओं में घुसती है और न ही उपनिषद को अपने तर्क का हिस्सा बनाने की चेष्टा करती है। सचमुच उपनिषद को तो इस पुस्तक के कथ्य में बिना स्पर्श करते हुए ही मात्र आनन्द के स्रोत की तरह उद्धृत किया गया है।
—लेखक की क़लम से
Hindu, Hindutva, Hindustan
- Author Name:
Sudhir Chandra
- Book Type:

-
Description:
सारे बौद्धिक प्रयत्न के बावजूद, ‘हिन्दू अवचेतन’ अपने को ही भारतीय मानता है। भारत जैसे बहुधर्मी और सांस्कृतिक वैविध्य से भरपूर देश के लिए ऐसी मान्यता अनिवार्यतः अनिष्टकारी है। पिछले कुछ समय से यह मान्यता अवचेतन से निकलकर उत्तरोत्तर आक्रामक होती जा रही है। बौद्धिक प्रयत्न के बावजूद नहीं, बल्कि खुलकर एक विचारधारा के रूप में यह हिन्दू को ही राष्ट्र मान बैठी है। ख़तरा यदि प्रधानतः विचारधारा और उससे जुड़ी किसी राजनीतिक पार्टी का होता तो उससे जूझना मुश्किल न होता। पर आज परेशानी यह है कि ‘हिन्दू अवचेतन’ कहीं न कहीं उन बातों को अपनी अँधेरी गहराइयों में मानता है, जिनको चेतना के स्तर पर वह राष्ट्र के लिए घातक और नैतिक रूप से अवांछनीय समझता है। ज़रूरी है कि उसका सामना इस दुविधा से कराया जाए।
—इसी पुस्तक से
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