Aadhi Aabadi Ka Sangharsh

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Author:

Mamta Jeitali

Language:

Hindi

195

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राजस्थान में देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा रजवाड़ों और जागीरदारों का ज़बर्दस्त दबदबा रहा, लेकिन जैसे ही सामन्ती व्यवस्था हटी तो औरतों के लिए अवसर आए, शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ। अपनी स्थिति पर उनके बीच चर्चा व मंथन की शुरुआत हुई तथा राजस्थान की आम औरतों ने अपनी आवाज़ को बुलन्द करना शुरू किया। यह एक पुनर्जागरण की शुरुआत थी। राजस्थान में कार्यरत कई स्वयंसेवी संस्थाएँ जो औरतों के मुद्दों पर काम करती थीं, उन्होंने संस्थाओं में घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव तथा बलात्कार जैसे मुद्दों पर चर्चाओं के माध्यम से ज़ोरदार माहौल बनाया। सन् 1985 में एक महिला मेले के दौरान पूरे राजस्थान से आई औरतों ने किशनगढ़ क्षेत्र में बलात्कार जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध एक रैली निकाली। मज़दूर महिलाओं को सड़क पर उतरकर, मुट्ठी बाँधकर, आक्रोश के साथ बुलन्द नारे लगाते, मंचों पर अत्याचारों के विरुद्ध बेख़ौफ़ बोलते देखकर मध्यवर्गीय औरतों में भी हिम्मत आई। अक्सर घर-परिवार तक ही सीमित रहकर शोषण व जुल्म को सहनेवाली औरतों ने भी दहेज, घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों के ख़‍िलाफ़ उठ खड़ी होने का साहस जुटाया तथा महिलाओं पर हिंसा का प्रभावी विरोध शुरू किया। नगरीय समुदाय की मध्यवर्गीय औरतों तथा विश्वविद्यालय की महिलाएँ, जिन्होंने घरेलू हिंसा के मुद्दे से जुड़कर काम शुरू किया, अब वे महिला आन्दोलन की नेतृत्वकर्त्री बनकर औरतों के कई मुद्दों पर जमकर संघर्ष करती हुई नज़र आती हैं। एक उल्लेखनीय बात और भी रही कि राजस्थान के महिला आन्दोलन की बागडोर मुख्यतः मज़दूर महिलाओं के हाथों में रही, इसलिए उन्‍होंने कभी भी समाज के ध्रुवीकरण का रास्ता नहीं लिया। कहना चाहिए कि इस आन्दोलन का रुझान पुरुषों के ख़िलाफ़ न होकर बराबरी और अवसरों की समानता की तलाश की ओर ही अधिक रहा। ‘विविधा महिला आलेखन एवं सन्दर्भ केन्द्र’ व ‘विविधा फ़ीचर्स’, जयपुर ने राजस्थान की आधी आबादी के गुमनाम सफ़र का इस पुस्तक में दस्तावेज़ीकरण करने का काम किया है। यह केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय महिला आन्दोलन के स्वरूप को समझने का एक सार्थक उपक्रम है।

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ISBN
9788126720149
Pages
355
Avg Reading Time
12 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

राजस्थान में देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा रजवाड़ों और जागीरदारों का ज़बर्दस्त दबदबा रहा, लेकिन जैसे ही सामन्ती व्यवस्था हटी तो औरतों के लिए अवसर आए, शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ। अपनी स्थिति पर उनके बीच चर्चा व मंथन की शुरुआत हुई तथा राजस्थान की आम औरतों ने अपनी आवाज़ को बुलन्द करना शुरू किया। यह एक पुनर्जागरण की शुरुआत थी।

राजस्थान में कार्यरत कई स्वयंसेवी संस्थाएँ जो औरतों के मुद्दों पर काम करती थीं, उन्होंने संस्थाओं में घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव तथा बलात्कार जैसे मुद्दों पर चर्चाओं के माध्यम से ज़ोरदार माहौल बनाया। सन् 1985 में एक महिला मेले के दौरान पूरे राजस्थान से आई औरतों ने किशनगढ़ क्षेत्र में बलात्कार जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध एक रैली निकाली।

मज़दूर महिलाओं को सड़क पर उतरकर, मुट्ठी बाँधकर, आक्रोश के साथ बुलन्द नारे लगाते, मंचों पर अत्याचारों के विरुद्ध बेख़ौफ़ बोलते देखकर मध्यवर्गीय औरतों में भी हिम्मत आई। अक्सर घर-परिवार तक ही सीमित रहकर शोषण व जुल्म को सहनेवाली औरतों ने भी दहेज, घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों के ख़‍िलाफ़ उठ खड़ी होने का साहस जुटाया तथा महिलाओं पर हिंसा का प्रभावी विरोध शुरू किया। नगरीय समुदाय की मध्यवर्गीय औरतों तथा विश्वविद्यालय की महिलाएँ, जिन्होंने घरेलू हिंसा के मुद्दे से जुड़कर काम शुरू किया, अब वे महिला आन्दोलन की नेतृत्वकर्त्री बनकर औरतों के कई मुद्दों पर जमकर संघर्ष करती हुई नज़र आती हैं।

एक उल्लेखनीय बात और भी रही कि राजस्थान के महिला आन्दोलन की बागडोर मुख्यतः मज़दूर महिलाओं के हाथों में रही, इसलिए उन्‍होंने कभी भी समाज के ध्रुवीकरण का रास्ता नहीं लिया। कहना चाहिए कि इस आन्दोलन का रुझान पुरुषों के ख़िलाफ़ न होकर बराबरी और अवसरों की समानता की तलाश की ओर ही अधिक रहा। ‘विविधा महिला आलेखन एवं सन्दर्भ केन्द्र’ व ‘विविधा फ़ीचर्स’, जयपुर ने राजस्थान की आधी आबादी के गुमनाम सफ़र का इस पुस्तक में दस्तावेज़ीकरण करने का काम किया है। यह केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय महिला आन्दोलन के स्वरूप को समझने का एक सार्थक उपक्रम है।

Book Details

  • ISBN
    9788126720149
  • Pages
    355
  • Avg Reading Time
    12 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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