Aahat Desh
(0)
Author:
Neelabh, Arundhati RoyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
295
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‘‘वह जंगल जो दण्डकारण्य के नाम से जाना जाता था और जो पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों को समेटता हुआ महाराष्ट्र तक फैला है, लाखों आदिवासियों का घर है। मीडिया ने इसे ‘लाल गलियारा’ या ‘माओवादी गलियारा’ कहना शुरू कर दिया है। लेकिन इसे उतने ही सटीक ढंग से ‘अनुबन्ध गलियारा’ कहा जा सकता है। इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि संविधान की पाँचवीं सूची में आदिवासी लोगों के संरक्षण का प्रावधान है और उनकी भूमि के अधिग्रहण पर पाबन्दी लगाई गई है। लगता यही है कि वह धारा वहाँ महज़ संविधान की शोभा बढ़ाने के लिए रखी गई है—थोड़ा-सा मिस्सी-ग़ाज़ा, लिपस्टिक-काजल। अनगिनत निगम, छोटे अनजाने व्यापारी ही नहीं, दुनिया के दैत्याकार-से-दैत्याकार इस्पात और खनन निगम—मित्तल, जिन्दल, टाटा, एस्सार, पॉस्को, रिओ टिंटो, बीएचपी बिलिटन और हाँ, वेदान्त भी—आदिवासियों के घर-बार को हड़पने की फ़िराक़ में हैं।</p> <p>हर पहाड़ी, हर नदी और हर जंगल के लिए समझौता हो गया है। हम अकल्पनीय स्तर पर व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय कायाकल्प की बात कर रहे हैं। और इसमें से ज़्यादातर गुप्त है। मुझे क़तई नहीं लगता कि दुनिया के सबसे पुराने और दिव्य जंगल, परिवेश और आदिम समुदाय को नष्ट करने के लिए जो परियोजनाएँ शुरू हुई हैं, उनकी चर्चा भी कोपेनहेगेन में होनेवाले ‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ में होगी। माओवादी हिंसा की भयावह कहानियाँ खोजनेवाले (और न मिलने पर उन्हें गढ़ लेनेवाले) ख़बरिया चैनल लगता है, क़िस्से के इस पक्ष में बिलकुल दिलचस्पी नहीं रखते। मुझे अचरज है, ऐसा क्यों?’’</p> <p>युद्ध, भारत की सीमाओं से चलकर देश के हृदय-स्थल में मौजूद जंगलों तक फैल चुका है। भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठासम्पन्न लेखिका द्वारा लिखित यह पुस्तक ‘आहत देश’ कुशाग्र विश्लेषण और रिपोर्टों के संयोजन द्वारा उभरती हुई वैश्विक महाशक्तियों के समय में प्रगति और विकास का परीक्षण करती है और आधुनिक सभ्यता को लेकर कुछ मूलभूत सवाल उठाती है।
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About the Book
‘‘वह जंगल जो दण्डकारण्य के नाम से जाना जाता था और जो पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों को समेटता हुआ महाराष्ट्र तक फैला है, लाखों आदिवासियों का घर है। मीडिया ने इसे ‘लाल गलियारा’ या ‘माओवादी गलियारा’ कहना शुरू कर दिया है। लेकिन इसे उतने ही सटीक ढंग से ‘अनुबन्ध गलियारा’ कहा जा सकता है। इससे रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि संविधान की पाँचवीं सूची में आदिवासी लोगों के संरक्षण का प्रावधान है और उनकी भूमि के अधिग्रहण पर पाबन्दी लगाई गई है। लगता यही है कि वह धारा वहाँ महज़ संविधान की शोभा बढ़ाने के लिए रखी गई है—थोड़ा-सा मिस्सी-ग़ाज़ा, लिपस्टिक-काजल। अनगिनत निगम, छोटे अनजाने व्यापारी ही नहीं, दुनिया के दैत्याकार-से-दैत्याकार इस्पात और खनन निगम—मित्तल, जिन्दल, टाटा, एस्सार, पॉस्को, रिओ टिंटो, बीएचपी बिलिटन और हाँ, वेदान्त भी—आदिवासियों के घर-बार को हड़पने की फ़िराक़ में हैं।</p>
<p>हर पहाड़ी, हर नदी और हर जंगल के लिए समझौता हो गया है। हम अकल्पनीय स्तर पर व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय कायाकल्प की बात कर रहे हैं। और इसमें से ज़्यादातर गुप्त है। मुझे क़तई नहीं लगता कि दुनिया के सबसे पुराने और दिव्य जंगल, परिवेश और आदिम समुदाय को नष्ट करने के लिए जो परियोजनाएँ शुरू हुई हैं, उनकी चर्चा भी कोपेनहेगेन में होनेवाले ‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ में होगी। माओवादी हिंसा की भयावह कहानियाँ खोजनेवाले (और न मिलने पर उन्हें गढ़ लेनेवाले) ख़बरिया चैनल लगता है, क़िस्से के इस पक्ष में बिलकुल दिलचस्पी नहीं रखते। मुझे अचरज है, ऐसा क्यों?’’</p>
<p>युद्ध, भारत की सीमाओं से चलकर देश के हृदय-स्थल में मौजूद जंगलों तक फैल चुका है। भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठासम्पन्न लेखिका द्वारा लिखित यह पुस्तक ‘आहत देश’ कुशाग्र विश्लेषण और रिपोर्टों के संयोजन द्वारा उभरती हुई वैश्विक महाशक्तियों के समय में प्रगति और विकास का परीक्षण करती है और आधुनिक सभ्यता को लेकर कुछ मूलभूत सवाल उठाती है।
Book Details
-
ISBN9788126722495
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘अपार ख़ुशी का घराना’ एक साथ दुखती हुई प्रेम-कथा और असंदिग्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है। उसे फुसफुसाहटों में, चीख़ों में, आँसुओं के ज़रिये और कभी-कभी हँसी-मज़ाक़ के साथ कहा गया है। उसके नायक वे लोग हैं जिन्हें उस दुनिया ने तोड़ डाला है जिसमें वे रहते हैं और फिर प्रेम और उम्मीद के बल पर बचे हुए रहते हैं। इसी वजह से वे जितने इस्पाती हैं उतने ही भंगुर भी, और वे कभी आत्म-समर्पण नहीं करते। यह सम्मोहक, शानदार किताब नए अन्दाज़ में फिर से बताती है कि एक उपन्यास क्या कर सकता है और क्या हो सकता है। अरुंधति रॉय की कहानी-कला का करिश्मा इसके हर पन्ने में दर्ज है।
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प्रसिद्ध दार्शनिक, आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार जे. कृष्णमूर्ति ने विभिन्न स्थानों पर विभिन्न वार्त्ताओं में अनगिनत विषयों पर बात की। उन्हीं विषयों में से कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर उनके विचारों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। हमारे रिश्ते, दुःख का जन्म कैसे होता है? हमारी व्यवस्थाएँ कैसी हैं? हमारा मन कैसे काम करता है? ध्यान, प्रेम, मृत्यु। अपने जीवन में हम कैसे संबंध स्थापित करें ? भले ही हम इस अत्यधिक समाज में रह रहे हैं, परंतु यही आधुनिकता हमें अपना दास बना रही है। यदि हम दास हैं तो हम स्वतंत्र कैसे हुए ? हम पूरी दुनिया को अपने नए-नए आविष्कारों से अचंभित कर रहे हैं, परंतु हमारा मन अब तक हमारी बात नहीं मानता। हमारे रिश्ते बस एक-दूसरों से अपेक्षा पर ही टिके हुए हैं; क्या हो अगर हमारी अपेक्षाएँ खत्म हो जाएँ? मृत्यु कैसे हमारे जीवन का ही एक पहलू है, वह हमसे भिन्न नहीं है। कैसे हम अपने जीवन में सुख की तलाश में अनगिनत दुःखों का कारण बनते हैं। क्या सुख कोई ऐसी वस्तु है, जिसे बाहरी रूप से प्रकट किया जा सकता है? या फिर वह हमारे मन की एक अवस्था है, जहाँ सुख से जन्म लेता है। क्या प्रेम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और एक-दूसरे के लेन-देन पर ही संबंधित है या प्रेम एक भिन्न अवस्था है? जो किसी पुष्प-खुशबू की भाँति है, सबके लिए और सभी जगह। प्रेम की असली परिभाषा क्या है ? और अंतिम विषय जिसकी इस पुस्तक में चर्चा की गई है, वह है ध्यान; ध्यान क्या है, ध्यान क्यों आवश्यक है ? आध्यात्मिक और दार्शनिक उन्नयन के लिए एक आवश्यक पुस्तक ।
Manusmriti
- Author Name:
Dr. Ramchandra Verma Shastri
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मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar +1
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क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vishamta : Ek Punarvivechan
- Author Name:
Amartya Sen +1
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नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की एक दार्शनिक रचना है—‘विषमता’। उनकी कई एक विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों के बीच इस रचना का शुमार उनकी सोच की कुंजी के बतौर होता है। निस्संदेह यह प्रोफेसर सेन की कुछ सर्वाधिक कठिन पुस्तकों में से भी एक है। कठिन यह इस अर्थ में नहीं है कि कोई लंबी-चौड़ी उलझी हुई लफ़्फ़ाज़ी इसमें की गई है, बल्कि इस अर्थ में कि स्वतंत्रता, समानता, विविधता आदि अवधारणाओं का प्रयोग यहाँ इतने व्यापक संदर्भों में हुआ है कि उनका आदी होने में किसी को भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए। इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के बीच मौजूद भारी विविधताओं को केंद्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहनेवाले आदिवासी या स्वेच्छया सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता–सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्य की किसी भी गढ़ी-गढ़ाई परिभाषा से वे ठोस रूपाकार वाले मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों के सामर्थ्य पर है। स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन के विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा पहले से बढ़ चुका होगा।
Aapka Manto
- Author Name:
Mohammed Aslam Parvez
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इस किताब में मंटो के अब तक मौजूद सभी खत संकलित किए गए हैं। हिंदी पढ़ने वालों के लिए मंटो साहब का नाम कोई नया नहीं। हिंदी वालों का भी मंटो पर उतना ही हक है, जितना उर्दू वालों का। इस वजह से हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग इन खतों के जरिए मंटो की जिंदगी के उस हिस्से से भी रूबरू होगा, जिस पर अभी बहुत ज्यादा रौशनी नहीं पड़ी है। अब तक मंटो के मौजूद खत की संख्या 142 है, जो उसकी लिखी गई कहानियों की संख्या से भी बहुत कम है। मौजूद खत में सबसे ज्यादा खत मंटो ने अहमद नदीम कासमी को ही लिखे हैं। इन खतों के जरिए मंटो की जो तस्वीर कावि के मन में उभरती है, उसे अगर एक वाक्य में कहें तो हम ‘a man without a mask’ कह सकते हैं। उर्दू साहित्य की दुनिया में मोहम्मद असलम परवेज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक लंबे समय से वे रंगकर्मी के तौर पर हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी रंगमंच से जुड़े हैं। उनके लिखे कई नाटक मुंबई के पृथ्वी और टाटा थिएटर के अलावा दूसरे शहरों में खेले जाते रहे हैं। इसके अलावा, मराठी और गुजराती में उनके नाटक पेशेवर मंच पर भी खेले जाते रहे हैं। मोहम्मद असलम परवेज की एक पहचान मंटो के आलोचक के रूप में भी है। उन्होंने मंटो को नित नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की। मंटो के हवाले से उनकी किताबें ‘आप का मंटो’, ‘मंटो और चचा सैम’, ‘मंटो: अफसानों के दरमियान’, और ‘मंटो: स्याह हाशिए और हाशिया रेखाएँ’ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
HASHIYE PAR HASRAT
- Author Name:
Bhim Singh Bhavesh
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"‘हाशिए पर हसरत’ एक ऐसे कटु यथार्थ का दस्तावेज है, जो हमारे समाज के लिए आज भी शर्म का बायस है। भारतीय समाज की संरचना में जाति-वर्ण की विभाजक रेखा इतनी प्रतिगामी और अमानवीय साबित हुई है कि एक सभ्य समाज उससे जितनी जल्द मुक्त होगा, उसका उतना ही भला होगा। यह पुस्तक उसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में अस्पृश्य जातियों की अंतिम पंक्ति में खड़े मुसहर जाति की स्थिति से रू-ब-रू कराने की कोशिश है। भीम सिंह भवेश की यह पुस्तक वस्तुतः समाज विज्ञान में एक शोध है। यह पुस्तक मुसहरों के जीवन, उनकी जीवन-दृष्टि, आपसी संबंधों, दशा-दिशा, भविष्य और समाज की मुख्यधारा के प्रति उनकी धारणाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। मुसहर-टोलों के जीवन को जिस संवेदना के साथ भवेश ने उकेरा है, उसका एहसास इसे पढ़ने पर होता है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मान्यताओं और जटिलताओं को लेखक ने बहुत करीब से देखा है। ग्रामीण जीवन के अमर चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष में ‘हाशिए पर हसरत’ का प्रकाशन ‘मैला आँचल’ के लेखक को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि भी है। भवेश ने जानकारियाँ जुटाने में मेहनत तो की ही है, उन्हें प्रस्तुत भी रोचक शैली में किया है। इसीलिए यह शुष्क शोध नहीं, बल्कि पठनीय कथ्य के माध्यम से संवेदनशील विषय के प्रति हमारे अंदर संवेदना जगाती है। यही इस पुस्तक की विशेषता है। यह पुस्तक मुसहर जाति को समझने, उनके दारुण दुःखों को महसूस करने और उन्हें उच्च मानवीय गरिमा प्रदान करने के प्रयासों को बल देगी। —अवधेश प्रीत "
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