Shiksha Ka Adhikar
About the book
"शिक्षा का अधिकार—ममता मल्होत्रा/महेश शर्मा भारत में अब ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ संसद् में पारित होकर कानून का रूप ले चुका है। इसके अंतर्गत छह से चौदह की आयु के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। इस अधिनियम में बच्चों की शिक्षा के प्रति अध्यापकों, स्कूलों और सरकार—सभी के कर्तव्य निश्चित कर दिए गए हैं। अब नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करना सभी बच्चों का अधिकार है। सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सरकार छह से चौदह वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई के लिए जिम्मेदार होगी। इस प्रकार इस कानून ने देश के बच्चों को मजबूत, साक्षर और अधिकार-संपन्न बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। लेखकद्वय ने पुस्तक में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ के बारे में विस्तार से पूरी जानकारी प्रस्तुत की है। साथ ही इस अधिनियम से जुड़े अनेक सवालों के जवाब समझाकर दिए गए हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल आमजन के लिए, बल्कि जिज्ञासु पाठकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी। "
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About the Book
"शिक्षा का अधिकार—ममता मल्होत्रा/महेश शर्मा
भारत में अब ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ संसद् में पारित होकर कानून का रूप ले चुका है। इसके अंतर्गत छह से चौदह की आयु के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। इस अधिनियम में बच्चों की शिक्षा के प्रति अध्यापकों, स्कूलों और सरकार—सभी के कर्तव्य निश्चित कर दिए गए हैं। अब नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करना सभी बच्चों का अधिकार है।
सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सरकार छह से चौदह वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई के लिए जिम्मेदार होगी। इस प्रकार इस कानून ने देश के बच्चों को मजबूत, साक्षर और अधिकार-संपन्न बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।
लेखकद्वय ने पुस्तक में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ के बारे में विस्तार से पूरी जानकारी प्रस्तुत की है। साथ ही इस अधिनियम से जुड़े अनेक सवालों के जवाब समझाकर दिए गए हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल आमजन के लिए, बल्कि जिज्ञासु पाठकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी।
"
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 400 grams
- ISBN-13
- 9788173159312
- Pages
- 132
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Shiksha Ka Adhikar unpacks India's transformative Right to Education Act, passed by Parliament to make free schooling a constitutional guarantee for every child aged 6 to 14. Authors Mamta Malhotra and Mahesh Sharma render this landmark legislation accessible to Hindi readers by clarifying the specific duties it assigns to teachers, schools, and government agencies. Unlike policy briefs written for administrators, this book addresses parents, educators, and citizens who need to understand not just what the law promises, but how it redistributes accountability across India's education ecosystem. The authors write in straightforward Hindi, making legal language approachable without diluting its precision, so readers can grasp how a right on paper becomes an enforceable claim in the classroom. For anyone navigating India's public education system or advocating for children's access to schooling, this book serves as both a practical guide and a civic education tool grounded in the realities of 2009 legislation.
Shiksha Ka Adhikar किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव मिलेगा?
यह किताब आपको कानूनी जटिलताओं को सरल भाषा में समझने का अनुभव देती है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम को लेखकों ने इस तरह प्रस्तुत किया है कि आम नागरिक, अभिभावक और शिक्षक भी इसे आसानी से समझ सकें। आप अपने बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा के अधिकार को लेकर सशक्त और जागरूक महसूस करेंगे।
यह पुस्तक किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे समझने के लिए क्या पूर्वज्ञान चाहिए?
- अभिभावक जो अपने बच्चों के शैक्षिक अधिकारों को समझना चाहते हैं
- शिक्षक और स्कूल प्रशासक जो अपनी जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं
- सामाजिक कार्यकर्ता और नीति विश्लेषक जो शिक्षा क्षेत्र में काम करते हैं
- किसी विशेष कानूनी पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं—सरल हिंदी में लिखी गई है
भारतीय पाठकों के लिए आज इस विषय का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व क्या है?
2009 में पारित शिक्षा का अधिकार अधिनियम भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक मोड़ था—यह शिक्षा को विशेषाधिकार से बदलकर मौलिक अधिकार बना देता है। आज भी ग्रामीण और वंचित समुदायों में इस कानून की जानकारी की कमी है। यह पुस्तक नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से परिचित कराकर सामाजिक समानता की दिशा में एक कदम है।
इस विषय पर लेखकों का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?
ममता मल्होत्रा और महेश शर्मा ने कानूनी भाषा को नौकरशाही दस्तावेज़ की तरह नहीं, बल्कि जनता के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया है। वे केवल कानून की व्याख्या नहीं करते, बल्कि शिक्षकों, स्कूलों और सरकार की विशिष्ट जिम्मेदारियों को स्पष्ट करते हैं, जिससे पाठक अपने अधिकारों को व्यवहार में लागू कर सकें।
यह पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक के मन में भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या रह जाता है?
पाठक के मन में नागरिक सशक्तिकरण की भावना रह जाती है—यह समझ कि शिक्षा केवल सरकारी उपकार नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। बौद्धिक रूप से, आप कानून की बारीकियों को समझकर अपने समुदाय में इसे लागू करने में सक्षम महसूस करेंगे। सांस्कृतिक रूप से, यह भारत में शिक्षा की पहुंच और समानता के संघर्ष से गहरा जुड़ाव पैदा करती है।
