Hansa Karo Puratan Baat
Author:
Kashinath SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 716
₹
895
Unavailable
‘हंसा करो पुरातन बात’ कथाकार-उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में उनके 1989 से 2022 तक के साक्षात्कार हैं। साक्षात्कारों को प्रकाशन-क्रम से रखा गया है ताकि पाठक उनकी रचनात्मक और वैचारिक यात्रा को प्रामाणिकता के साथ समझ सकें।<br>काशीनाथ जी से जुड़ा वह हर सवाल यहाँ मौजूद है जिसमें एक पाठक की जिज्ञासा हो सकती है। ये सभी साक्षात्कार वे हैं जो उनकी पूर्व-प्रकाशित दोनों पुस्तकों, ‘गपोड़ी से गपशप’ और ‘बातें हैं बातों का क्या’ में नहीं हैं। ‘परिशिष्ट’ में ऐसे साक्षात्कार हैं जिनमें सीधे-सीधे सवाल-जवाब की पद्धति नहीं है, लेकिन साक्षात्कारकर्ता या पत्र-पत्रिका ने उन्हें ‘बातचीत’ या ‘बातचीत पर आधारित’ कहा है।
इन साक्षात्कारों में ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’ कहानी के प्रति उनका मोह दृष्टिगोचर होता है। ‘काशी का अस्सी’ को वे अपना सर्वश्रेष्ठ उपन्यास तथा ‘अपना मोर्चा’ को भूमिका मात्र मानते हैं। सामासिक संस्कृति की पक्षधरता और मनुष्यता में उनका विश्वास भी प्रकट होता है। कहानी लेखन में बदलाव, कहानी से संस्मरण की ओर शिफ्ट होने के कारण, देश-विदेश-छात्र राजनीति एवं वर्तमान लेखन पर उनके विचार इन साक्षात्कारों में अभिव्यक्त हैं।
ISBN: 9788119028658
Pages: 296
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
Alochak Aur Alochana
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

- Description: पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Wo Mujhe Hamesha Yaad Rahenge
- Author Name:
Anandi Ben Patel
- Book Type:

- Description: ‘‘गैर-मार्ग पर गए लोगों को वापस लाना तो सरल है, परंतु गैर-समझ के शिकार हुए लोगों को लौटाने में तो नाक में दम आ जाता है।’’ ‘‘अच्छी वर्षा किसान की मेहनत को सार्थक बना देती है। अच्छा वातावरण साधक के पुरुषार्थ को सफल कर देता है।’’ ‘‘सही हो तो भी किसी बात में या अच्छा समाचार हो, तो भी बिना शंका किए बुद्धि का काम नहीं चलता, जबकि कमजोर बात या कमजोर समाचार को सच मान लेने को मन फौरन तैयार नहीं होता।’’ ‘‘पानी भले ही गरम हो, आग को वह बुझा देता है। पेट्रोल भले ही ठंडा हो, आग को वह भड़का देता है।’’ ‘‘घटना भले हमारे हाथ में नहीं, परंतु घटना का अर्थ- घटन कैसे किया जाए, यह तो हमारे हाथ में है।’’ ‘‘इच्छाओं को शांत करने की बात बाद में करना, पहले इच्छाओं को निर्मल तो करें। इच्छाओं की निर्मलता मन को स्वस्थ करके ही रहेगी।’’ ‘‘दुर्व्यसन मात्र चरित्र का पतन ही नहीं करते, प्रसन्नता का भी हनन करते हैं।’’ ‘‘प्रभु, मुझसे यदि भूलें होती ही रहने वाली हों, तो भी पुरानी भूलें मैं एक बार भी न दोहराऊँ, ऐसी ताकत तो मुझे दे ही देना।’’ ‘‘हमेशा रोते इनसान किसी को पसंद नहीं, तो हमेशा हँसते इनसान किसी के आड़े नहीं।’’ ‘‘ज्यादा रस हमें किस में है? खुलने में, स्वयं को खुला करने में या सामनेवाले को खोलने में?’’ ‘‘उत्थान के शिखर की ऊँचाई का निर्णय न हो तो कोई बात नहीं, पतन के तल की गहराई तो निश्चित कर लो।’’ ‘‘अच्छी वर्षा कृषक की मेहनत को सार्थक करती है। अच्छा वातावरण साधक के पुरुषार्थ को सफल बना देता है।’’ ‘‘जो बोए, वही देने की जवाबदारी धरती की है; परंतु क्या बोना है, उसका चयन करने का अधिकार हमारे हाथ में है।’’ ‘‘मंदिर भव्य बने, यह तो अच्छा ही है; परंतु मंदिर में जानेवालों का जीवन भी भव्य बने, यह भी उतना ही जरूरी है।’’ ‘‘गैर-मार्ग पर गए लोगों को वापस लाना तो सरल है, परंतु गैर-समझ के शिकार हुए लोगों को लौटाने में तो नाक में दम आ जाता है।’’ ‘‘अच्छी वर्षा किसान की मेहनत को सार्थक बना देती है। अच्छा वातावरण साधक के पुरुषार्थ को सफल कर देता है।’’ ‘‘सही हो तो भी किसी बात में या अच्छा समाचार हो, तो भी बिना शंका किए बुद्धि का काम नहीं चलता, जबकि कमजोर बात या कमजोर समाचार को सच मान लेने को मन फौरन तैयार नहीं होता।’’ ‘‘पानी भले ही गरम हो, आग को वह बुझा देता है। पेट्रोल भले ही ठंडा हो, आग को वह भड़का देता है।’’ ‘‘घटना भले हमारे हाथ में नहीं, परंतु घटना का अर्थ- घटन कैसे किया जाए, यह तो हमारे हाथ में है।’’ ‘‘इच्छाओं को शांत करने की बात बाद में करना, पहले इच्छाओं को निर्मल तो करें। इच्छाओं की निर्मलता मन को स्वस्थ करके ही रहेगी।’’ ‘‘दुर्व्यसन मात्र चरित्र का पतन ही नहीं करते, प्रसन्नता का भी हनन करते हैं।’’ ‘‘प्रभु, मुझसे यदि भूलें होती ही रहने वाली हों, तो भी पुरानी भूलें मैं एक बार भी न दोहराऊँ, ऐसी ताकत तो मुझे दे ही देना।’’ ‘‘हमेशा रोते इनसान किसी को पसंद नहीं, तो हमेशा हँसते इनसान किसी के आड़े नहीं।’’ ‘‘ज्यादा रस हमें किस में है? खुलने में, स्वयं को खुला करने में या सामनेवाले को खोलने में?’’ ‘‘उत्थान के शिखर की ऊँचाई का निर्णय न हो तो कोई बात नहीं, पतन के तल की गहराई तो निश्चित कर लो।’’ ‘‘अच्छी वर्षा कृषक की मेहनत को सार्थक करती है। अच्छा वातावरण साधक के पुरुषार्थ को सफल बना देता है।’’ ‘‘जो बोए, वही देने की जवाबदारी धरती की है; परंतु क्या बोना है, उसका चयन करने का अधिकार हमारे हाथ में है।’’ ‘‘मंदिर भव्य बने, यह तो अच्छा ही है; परंतु मंदिर में जानेवालों का जीवन भी भव्य बने, यह भी उतना ही जरूरी है।’’
Jungle Ke Upyogi Vriksha
- Author Name:
Ramesh Bedi
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में मानव उपयोगी सात वृक्षों का वर्णन किया गया है। उनके विविध भाषाओं में नाम, उनकी पहचान, उनका प्राप्ति-स्थान, उनकी कृषि, रासायनिक संघटन, घरेलू तथा दवा-दारू में उपयोग, उनके औद्योगिक उपयोग आदि की विस्तृत जानकारी दी गई है। इन वृक्षों का स्वरूप बताने के लिए 24 रेखाचित्र, 5 फ़ोटो और 12 रंगीन फ़ोटो दिए गए हैं। वृक्षों में रुचि रखनेवालों, आयुर्वेद व यूनानी के अध्येताओं, अनुसन्धानकर्ताओं, वन-अधिकारियों व वन-कर्मियों, फ़ार्मेसियों, कच्ची जड़ी-बूटियों के व्यापारियों के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से उपयोगी है। जिन वृक्षों का ‘जंगल के उपयोगी वृक्ष’ में वर्णन है, वे ये हैं—गूलर, बकायन, त्रिफला, बरगद, नीम, बहेड़ा और पीपल।
Premchand (Radha)
- Author Name:
Satyendra
- Book Type:

- Description: उपन्यास सम्राट कहे जानेवाले प्रेमचन्द हमारी भाषा के कालजयी रचनाकार हैं और इनकी रचनाओं को क्लासिक का दर्जा प्राप्त है। जीवन में जनवादी, साहित्य में यथार्थवादी प्रेमचन्द ने जीवन को जैसा देखा वैसा ही उसे चित्रित किया। उन्होंने उपन्यासों के अतिरिक्त कहानियाँ, नाटक और लेख भी लिखे। उनकी रचनाओं में एक व्यावहारिक ढंग का समाजवाद हमें दिखाई पड़ता है। भारतीय पुनर्जागरण के महान लेखकों में वे ही ऐसे हैं, जो अपने सामाजिक निष्कर्षों में क्रान्तिकारी या वैज्ञानिक समाजवाद के सबसे समीप हैं। यह पुस्तक एक विशेष दृष्टि से तैयार की गई है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचन्द की रचनाओं से सम्बन्धित गम्भीर, विचारोत्तेजक व अमूल्य सामग्रियों को इस उम्मीद के साथ एक जगह सुलभ कराया गया है कि पाठकों, अध्यापकों व शोधार्थियों को प्रेमचन्द के अध्ययन में विशेष सहायता मिलेगी। इसमें प्रेमचन्द के नारी-विषयक विचार, उनके पात्रों के चारित्रिक विकास, औपन्यासिक-कला के शिल्प-विधान, भाषा-शैली सम्बन्धी प्रयोगों के अध्ययन के अतिरिक्त प्रेमचन्द और तारा शंकर, प्रेमचन्द का नाट्य व कथा साहित्य तथा समस्यामूलक उपन्यास और प्रेमचन्द जैसे विषयों पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया है। आशा है कि प्रेमचन्द अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी व विचारोत्तेजक सिद्ध होगी।
Janane ki Batein (Vol. 2)
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay
- Book Type:

- Description: Janane ki Batein (Vol. 2)
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