Coronakaal Ki Sachchi Kahaniyan
Author:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
"चारों तरफ खौफ छा गया। कुछ लोग तो दुबककर कमरों में लिहाफ के अंदर घुस गए, कुछ निडर प्रकार के लोग मोबाइल कैमरे से छिपकर वीडियो बनाने का प्रयास करने लगे।
एंबुलेंस से बाहर उतरे लोग इधर-उधर के घरों का जायजा ले ही रहे थे कि पीछे से सायरन बजाती हुई पुलिस की एक जिप्सी भी आ धमकी। जिप्सी से भी उसी प्रकार के पारदर्शी आवरण में खाकी वर्दीधारी लोग उतरे और सामने के गेट की कॉल बैल दबाई।
‘अरे मिसेज दत्ता के घर?’, हर परिवार के लोग आपस में कानाफूसी करने लगे।
‘कौन बीमार हुआ होगा?’
‘कौन होना है? वही होगी, अकेले वही तो है इस घर में!’ लोग खौफ में थे। एक-दूसरे को फोन कॉल करके पूछ रहे थे किंतु बाहर निकलकर पुलिस से या एंबुलेंस वालों से पूछने की किसी को हिम्मत न हो पा रही थी। कोरोना का खौफ इस कदर था कि मानो अगर उन्होंने थोड़ा सा भी दरवाजा खोला तो झिर्री के रास्ते ही कोरोना उनके घर के अंदर भी घुस जाएगा।
—इसी कहानी संग्रह से
देश, समाज और अपने इर्द-गिर्द घटनेवाली घटनाओं पर पैनी नजर रखनेवाले कथाकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कोरोनाकाल में घटित अनेक मार्मिक घटनाओं को अपनी कहानियों में पिरोकर कोरोना जैसी महामारी से उपजे हालातों के मध्य मानव, मानवता, मानव मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण किया है। विपरीत परिस्थितियों, कठिनाइयों और संघर्षों के बीच ये कहानियाँ मन-मस्तिष्क को धैर्य, साहस और सुकून का बोध कराती हैं।
"
ISBN: 9789390366590
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आदिवासियों का पलायन और विस्थापन सदियों से होता रहा है और ये आज भी जारी है। आदिवासियों के जंगलों, ज़मीनों, गाँवों, संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने के पीछे मुख्य कारण हमारी सरकारी व्यवस्था रही है। वे केवल अपने जंगलों, संसाधनों या गाँवों से ही बेदख़ल नहीं हुए बल्कि मूल्यों, नैतिक अवधारणाओं, जीवन-शैलियों, भाषाओं एवं संस्कृति से भी वे बेदख़ल कर दिए गए हैं।
हमारे मौलिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत सभी को विकास का समान अधिकार है। लेकिन आज़ादी के बाद के पहले पाँच वर्षों में लगभग ढाई लाख लोगों में से 25 प्रतिशत आदिवासियों को मजबूरन विस्थापित होना पड़ा। विकास के नाम पर लाखों लोगों को अपनी रोज़ी-रोटी, काम-धंधों तथा ज़मीनों से हाथ धोना पड़ा। उनको मिलनेवाले मूलभूत अधिकार जो उनकी ज़मीनों से जुड़े थे, वे भी उन्हें प्राप्त नहीं हुए।
आदिवासियों के प्रति सरकार तथा तथाकथित मुख्यधारा के समाज के लोगों का नज़रिया कभी संतोषजनक नहीं रहा। आदिवासियों को सरकार द्वारा पुनर्वसित करने का प्रयास भी पूर्ण रूप से सार्थक नहीं हो सका। अन्ततः अपनी ही ज़मीनों व संसाधनों से विलग हुए आदिवासियों का जीवन मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया।
21वीं सदी में पहुँचकर भी हमारे देश का आदिवासी समाज जहाँ विकास की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उनकी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।
विकास के नाम पर छले जा रहे आदिवासियों के पलायन और विस्थापन आदि समस्याओं पर केन्द्रित यह पुस्तक समाज और सरकार के सम्मुख कई सवाल खड़े करती है।
Pais Paryavaransanvadacha
- Author Name:
Santosh Shintre
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- Description: हे पुस्तक सजग, सर्वसामान्य वाचकांसमोर भारतीय निसर्ग-पर्यावरण आणि त्यातील आर्थिक, सामाजिक, राजकीय गुंतागुंत सविस्तर उलगडते.पर्यावरण क्षेत्रात सक्रिय व्यक्ती/संस्था/समूहांना आजवर पडलेल्या बहुतांश अनुत्तरित प्रश्नांची समर्पक उत्तरे देणारे; निव्वळ ‘झाडे लावा, वाघ वाचवा' ह्यांच्यापलीकडे असणारा पर्यावरण प्रश्नांवरील उपायांबाबतचा संवाद-आवाका भारतीय संदर्भ घेऊन समजवणारे आणि इथल्या पर्यावरण समस्या निवारण्यासाठी आवश्यक संवादाच्या दिशा अचूक दर्शवणारे हे पुस्तक आहे.पर्यावरणसंवादाचे सामाजिक न्याय, विज्ञान, समाजशास्त्र, व्यवस्थापन, राज्यशास्त्र, मानसशास्त्र, तंत्रज्ञान, विक्री-कौशल्ये या अन्य विद्याशाखांशी गहिरे नाते असते. हे पुस्तक ते विस्तृत रीतीने दर्शवते. संबंधित विषयांच्या अभ्यासकांना, अध्यापकांना, संशोधकांना या आंतरविद्याशाखीय अभ्यासक्षेत्रातील भावी अभ्यास-संशोधनाचे थांबे, हे पुस्तक स्पष्ट करते. पैस पर्यावरणसंवादाचा | संतोष शिंत्रे Pais Paryavaransanvadacha I Santosh Shintre
Encyclopaedia Of Humanities (Psychology)
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Nagendra
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- Description: Encyclopaedia Of Humanities (Psychology)- Comparative study of Indian and Western intentions.
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