Buniyadi Taleem
Author:
A. ArvindakshanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 716
₹
895
Available
जब हम गांधी जी द्वारा परिकल्पित तथा कार्यान्वित बुनियादी शिक्षा की बात करते हैं तो अजीब-सा अनुभव महसूस हो सकता है, क्योंकि गांधी जी की बुनियादी शिक्षा-परिकल्पना के साथ आज के शिक्षा-जगत् का कोई सम्बन्ध नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक का विचारणीय विषय यही है कि गांधी जी द्वारा परिकल्पित बुनियादी शिक्षा की मूल्यदृष्टि क्या है और आज उसे किस तरह से देखा-परखा जाना चाहिए तथा आज की नूतन शिक्षा-पद्धति के साथ इसको कैसे मिलाया जाना चाहिए।
गांधी जी सचमुच एक आत्मसजग पीढ़ी भारत के लिए तैयार करना चाहते थे। इसलिए प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को केन्द्र में रखा।
ऐसे में हमें यह सोचना चाहिए कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा, सभी तबकों के विद्यार्थियों को समान सुविधाओं वाली पाठशालाओं की परिकल्पना और उन्हें सुविधाएँ उपलब्ध कराना, शिक्षा-पद्धतियों को समान बनाना, अध्यापक-प्रशिक्षण को वैज्ञानिक बनाना, सुविधाओं से वंचित सामाजिक तबके के विद्यार्थियों को समकक्ष तक ले आने योग्य पद्धतियों व योजनाओं का अखिल भारतीय स्तर पर आविष्कार करना आदि समान दृष्टि से जब तक कार्यान्वित नहीं होगा, तब तक बुनियादी शिक्षा का यह मातृभाषा में शिक्षण का सपना अतीत का अवैज्ञानिक सपना ही सिद्ध हो सकता है।
पुस्तक में बुनियादी तालीम के विभिन्न पक्षों पर सारगर्भित लेख प्रस्तुत करने का प्रयास है। इस विषय पर गम्भीर चिन्तन के लिए यह एक प्रवेशिका का कार्य करेगी, इसी आशा के साथ इसे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।
ISBN: 9788126724246
Pages: 200
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Tum Pahle Kyon Nahi Aaye
- Author Name:
Kailash Satyarthi
- Book Type:

-
Description:
तुम पहले क्यों नहीं आए में दर्ज हर कहानी अँधेरों पर रौशनी की, निराशा पर आशा की, अन्याय पर न्याय की, क्रूरता पर करुणा की और हैवानियत पर इंसानियत की जीत का भरोसा दिलाती है। लेकिन इस जीत का रास्ता बहुत लम्बा, टेढ़ा-मेढ़ा और ऊबड़-खाबड़ रहा है। उस पर मिली पीड़ा, आशंका, डर, अविश्वास, अनिश्चितता, ख़तरों और हमलों के बीच इन कहानियों के नायक और मैं, वर्षों तक साथ-साथ चले हैं। इसीलिए ये एक सहयात्री की बेचैनी, उत्तेजना, कसमसाहट, झुँझलाहट और क्रोध के अलावा आशा, सपनों और संकल्प की अभिव्यक्ति भी हैं।
पुस्तक में ऐसी बारह सच्ची कहानियाँ हैं जिनसे बच्चों की दासता और उत्पीड़न के अलग-अलग प्रकारों और विभिन्न इलाक़ों तथा काम-धंधों में होने वाले शोषण के तौर-तरीक़ों को समझा जा सकता है। जैसे; पत्थर व अभ्रक की खदानें, ईंट-भट्ठे, क़ालीन कारख़ाने, सर्कस, खेतिहर मज़दूरी, जबरिया भिखमंगी, बाल विवाह, दुर्व्यापार (ट्रैफ़िकिंग), यौन उत्पीड़न, घरेलू बाल मज़दूरी और नरबलि आदि। हमारे समाज के अँधेरे कोनों पर रोशनी डालती ये कहानियाँ एक तरफ हमें उन खतरों से आगाह करती है जिनसे भारत समेत दुनियाभर में लाखों बच्चे आज भी जूझ रहे हैं। दूसरी तरफ धूल से उठे फूलों की ये कहानियाँ यह भी बतलाती हैं कि हमारी एक छोटी-सी सकारात्मक पहल भी बच्चों को गुमनामी से बाहर निकालने में कितना महत्त्वपूर्ण हो सकती है, नोबेल पुरस्कार विजेता की कलम से निकली ये कहानियाँ आपको और अधिक मानवीय बनाती हैं, और ज़्यादा ज़िम्मेदार बनाती है।
Aadhi Raat Koi Dastak De Raha Hai
- Author Name:
K.R. Malkani
- Book Type:

- Description: जै सा कि लेखक खुद कहते हैं, यह जेल-डायरी नहीं है, न ही यह इमरजेंसी का वृत्तांत है। इसकी बजाय यह आपातकाल पर पार्श्व प्रकाश है। मल्कानी ने एक बंदी के रूप में जेल में जो कुछ भी देखा, सुना और महसूस किया, उन पर अपने अनुभवों को लिखा है। हिसार, रोहतक और तिहाड़—इन तीन जेलों में उन्होंने इक्कीस महीने बिताए, जहाँ उनकी मुलाकात अपराधियों से लेकर आला नेताओं समेत तरह-तरह के लोगों से हुई। यह उनके विषय में एक बेहद मानवीय दस्तावेज है, जो कभी मनोरंजक, कभी मायूस करनेवाला तो कभी-कभी पीड़ादायी हो जाता है। जेल में एकांत में बिताए गए लंबे समय ने लेखक को हिंदू-मुसलिम समस्या पर गहन विश्लेषण का अवसर दिया, जिसके विषय में उन्होंने नई और उम्मीद जगानेवाली बातें लिखी हैं। पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखी गई इस पुस्तक में मर्मस्पर्शी छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जिनमें सियासी ज्ञान भी है, और जिनके कारण पढ़ने में यह पुस्तक बेहद रोचक हो जाती है। यह न केवल किसी एक व्यक्ति का दृष्टिकोण सामने रखती है, बल्कि सभी बंदियों के जीवन की झलक भी दिखाती है।
Taqut Watan Ki Humse Hai
- Author Name:
Rachna Bisht Rawat
- Book Type:

- Description: क्या आप जानते हैं कि सेना एक ऐसा पेशा है, जो आपको विचित्र चीजें करने की छूट देता है, जैसे स्काई डाइविंग, रैली ड्राइविंग, पर्वतारोहण, काम पर जाने के लिए हेलीकॉप्टर उड़ाने जैसा काम। आप किसी अन्य क्षेत्र में कल्पना कर सकते हैं क्या? आपको उस काम के लिए पैसा दिया जाता है, जिसे पूरा करने के लिए आप कहीं और खर्च करने के लिए तत्पर रहते हैं और संभव है कि वे अवसर जीवन में शायद कभी हाथ नहीं आते। यह पुस्तक आपको बताएगी कि सेना के अधिकारी वास्तव में करते क्या हैं और इसके लिए 21 सैन्य अधिकारियों के जीवन की असल कहानियों के माध्यम से आपको रू-ब-रू कराया जाएगा। तथ्य यह है कि सेना के हर अधिकारी के पास दिलचस्प कहानी होती ही है बताने के लिए। लेकिन चूँकि उनको अपने काम और मिशनों के बारे में ज्यादा बात करने की छूट नहीं होती, इसलिए हम उनके तमाम साहसिक कारनामों के बारे में न सुन पाते हैं, न जान पाते हैं। ऐसा शायद पहली बार है, जबकि भारतीय फौजियों ने अपने हैरतअंगेज अनुभव साझा किए हैं। युवाओं को उत्साहित करने की अद्भुत क्षमता रखनेवाली ये कहानियाँ उन्हें राष्ट्र-कार्य हेतु सक्रिय होने के लिए प्रेरित करेंगी।
IKKISVIN SEERHI
- Author Name:
Ravindra Kumar
- Book Type:

- Description: ‘‘रविन्द्र कुमार जी की कविताओं में जीवन के विविध रंग मिले हुए हैं। ‘इक्कीसवीं सीढ़ी’, ‘चौराहा’, ‘जड़ से जूझना, लहर से नहीं’, ‘ये चीख’, ‘सियार से भेड़ तक’, ‘सीमित-जीवन’, ‘मन’, ‘बढ़ते चंगुल’ तथा ‘धरती की कोख में’ आदि कविताएँ इन्हीं विविध रंगों की बानगी हैं। कवि के पास जीवन का व्यापक अनुभव है और सच पूछा जाए तो कविता की व्यापकता जीवन की व्यापकता के समानांतर ही चलती है; और चलनी भी चाहिए। रविन्द्र कुमारजी की कविताएँ किसी वाद या विचारधारा की गुलाम न होकर एक शुद्ध झरने की तरह हैं।’’ ‘‘संग्रह की कविता ‘एक सपना’ में कवि के शब्द—‘‘एक सपना/जो मुझे बार-बार कचोटता/मेरे मन को मरोड़ता/जल की सतह के ऊपर नीचे डुबोता’’ और ‘‘कोई ध्वनि घनघनाकर धुएँ सा देता/और अंत में/एक हल्की/छोटी सी ज्वाला दे/खत्म हो जाता/ ...कितना अच्छा होता/ जो तू रहता अभी तक!’’—देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलामजी के उन शब्दों की याद दिलाती है कि सपने वे नहीं होते, जो सोते हुए देखते हैं वरन् सपने वे होते हैं, जो आपको सोने नहीं देते। इसलिए कवि हमेशा सपनों के साथ रहना चाहता है। पाठक को थोड़ी गहराई में जाकर ही ऐसी कविताओं का भावार्थ समझ में आएगा। जीवन की जटिलताओं के बीच भी उम्मीद की कुछ हरियाली सदा मौजूद रहती है और जीवन में कुछ हासिल करने का, सपनों को पाने का यही रास्ता है। व्यक्ति के लिए भी, समाज के लिए भी और देश के लिए भी।’’ —प्रेमपाल शर्मा वरिष्ठ साहित्यकार, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय, नई दिल्ली
Aadivasi : Shaurya Evam Vidroh
- Author Name:
Ramanika Gupta
- Book Type:

- Description: सर्वप्रथम हमें पूर्वोत्तर के इतिहास में जाना ज़रूरी है, जिससे यह पता चलता है कि वे अंग्रेज़ों, ज़ुल्मी राजाओं या किसी भी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े। इस पुस्तक में हमने अलग-अलग भाषा व राज्यों के वीर नायकों व नायिकाओं की कथाओं के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के भिन्न राज्यों में हुए विद्रोहों, प्रतिरोधात्मक आन्दोलनों पर शोधपरक गाथाएँ व सामग्री प्रस्तुत की है। ये सभी गाथाएँ—लिजिन्द्रियाँ, लोककथाएँ या लोकगीत व टिप्पणियाँ पूर्वोत्तर के ही लेखकों द्वारा लिखी गई हैं। हमने इनका चयन कर हिन्दी में अनूदित कर प्रस्तुत किया है। इनके चयन और सम्पादन में काफ़ी समय लगा। चूँकि अनूदित सामग्री की भाषा को परिष्कृत भी करना पड़ा। हमने हिन्दी में कुछ गाथाएँ पूर्वोत्तर में उपलब्ध भिन्न ग्रन्थों व दस्तावेज़ों में दर्ज टिप्पणियों के आधार पर तैयार करके भी प्रस्तुत की गई हैं। एक ही नायक पर भिन्न-भिन्न लेखकों ने अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री (लोकगीत, किंवदंतियों, लोककथाएँ, ऐतिहासिक दस्तावेज आदि) से लेकर अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत की है। हमने सभी को सम्मानित करने का प्रयास किया है, ताकि पूर्वोत्तर में घटित इस इतिहास को गहराई तक समझा और जाना जा सके और शेष भारत उनसे अपना दर्द का रिश्ता जोड़ कर संवाद क़ायम करे। —‘सम्पादकीय’ से
Bharatiya Jeevan Drishti
- Author Name:
Braj Kishore Kuthiala
- Book Type:

- Description: भारतीय जीवन दृष्टि प्रो. बृज किशोर कुठियाला का जीवन और दर्शन उनके लेखों में व्यापक रूप से दृश्यमान है, जो भारतीय संस्कृति का प्रतिमान है। जीवन पंचतत्त्व से उत्पन्न और पंचतत्त्व में समा जाने की यात्रा का वृत्तांत है। तत्त्वों के पारस्परिक उपयुक्त साहचर्य ही संतुलन कारक हैं। आत्मा और परमात्मा का संबंध देह से देहावसान तक और फिर मुक्ति की बैकुंठी भारतीय पुराणों में पढ़ने को मिलती है। जीवन एक सतत प्रवाह है, हमारे बाद भी चलेगा। ‘ब्रह्मसत्यम जगद् मिथ्या’ या ‘अहम् ब्रह्मास्मि तत्त्वमसि’ सूत्र वाक्य बहुत कुछ कह जाते हैं। संवाद जोड़ने का काम करता है, विवाद तोड़ने का। भारतीय संस्कृति समग्रता की दृष्टि से अस्तित्व में है। प्रो. कुठियाला के लेख वेदांत दर्शन अथवा एकात्म मानवदर्शन की भावना को व्यक्त करते हैं। भारतीय चिंतन में देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण से मुक्ति की बातें हैं। व्यक्ति पर समाज का ऋण भी है। मनुष्य राष्ट्रकल्याण, समाज-कल्याण, और लोक-कल्याण से इस ऋण से मुक्त हो सकता है। इसके लिए आवश्यक है हम लोक के साथ संवाद बनाए रखें। वादे वादे जायते तत्त्व बोधः। बात करते रहने से तत्त्व मिलता है। नारद और ब्रह्माजी, शौनकादि ऋषि और सूतजी, कृष्ण और अर्जुन, काकभुशुण्डि और गरुड़जी, आचार्य मंडन मिश्र और आदि-शंकराचार्य से जो ज्ञान मिला वह केवल मानव कल्याण के लिए नहीं है, बल्कि समस्त ब्रह्मांड के लिए है। प्रो. कुठियाला के लेखों में यह मंतव्य पढ़ने के बाद एहसास होगा। सभी लेख चिंतन, मनन और ज्ञानवर्धन के लिए उपयोगी हैं। —पार्थसारथि थपलियाल
Pahar
- Author Name:
Nilay Upadhayaya
- Book Type:

- Description: निश्छल प्रेम और दुर्निवार जीवन-तृष्णा की अपूर्व गाथा है—‘पहाड़’। राम ने अपनी प्रिया सीता के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था—प्रीत कारण सेतु बाँधल सिया उदेस सिरी राम हो। और दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी पिंजरी के लिए पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। राम देवता थे, जबकि दशरथ मांझी बिहार के गया ज़िले के एक साधारण गाँव के अति साधारण निवासी; समाज के सर्वाधिक उपेक्षित, वंचित और अभावग्रस्त समुदाय के एक सदस्य। लेकिन उन्होंने मानवीय प्रेम की ऐसी मिसाल क़ायम की, जिसके बारे में अब तक सिर्फ़ पौराणिक कथाओं-किंवदन्तियों में सुना गया था। इस तरह ‘पहाड़’ में साधारण की असाधारणता मूर्त हुई है। दशरथ मांझी की यह गाथा उनके प्रेम की व्यक्तिगत परिधि तक सीमित नहीं है। इसमें उनके और उनके जैसे अनेक लोगों का जीवन-संघर्ष चित्रित है, जो समाज की सामन्ती शक्तियों के उत्पीड़न का शिकार बनते हैं। लेकिन तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद वे अपनी स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की आकांक्षा से विमुख नहीं होते, बल्कि बार-बार संघर्ष करते हैं। उपन्यासकार ने काफ़ी बारीकी से सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं को प्रस्तुत किया है, जिससे यह कृति और व्यापक हो उठी है। ‘पहाड़’ का एक उल्लेखनीय पक्ष इसमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रस्तुत दृष्टिकोण भी है। यह उपन्यास बतलाता है कि प्रकृति को अपनी लिप्सा-पूर्ति का साधन बनाकर मनुष्य अपने को ही नष्ट कर लेगा, जबकि उसके साहचर्य में उसका अस्तित्व बचा रह सकता है।
Badalata Bharat - Paratantryatun mahasattekade
- Author Name:
Datta Desai
- Book Type:

- Description: बदलता भारत : पारतंत्र्यातून महासत्तेकडे... संपादन - दत्ता देसाई भारताचे बहुरूपदर्शक आणि समग्र चित्र रेखाटणारा संदर्भग्रंथ ! आपल्या देशाच्या स्वातंत्र्याची पंचाहत्तर वर्षे. असे स्वातंत्र्य आहे की जे जगात सर्वाधिक वर्चस्वशाली असणार्या ब्रिटिश सत्तेविरुध्द इथल्या कोट्यवधी जनतेने अथक संघर्ष करून मिळवले. जगाच्या इतिहासातील एक महान मुक्तिपर्व. एक असा गौरवशाली स्वातंत्र्यसंग्राम की ज्याने आधुनिक भारताला जन्म दिला आणि जगाच्या इतिहासावर आपली छाप उमटवली. असा इतिहास की ज्याने प्रत्येक देशप्रेमी व्यक्तीची मान आजही उंचावते. असे स्त्रीपुरुष 'नायक', नेते, समाजधुरीण, क्रान्तिकारक आणि महामानव की त्यांच्याविषयी आजही देशभर अपार आदर, प्रेम आणि अद्भुत आकर्षणही आहे. दोन शतकांचे विविध जनसमुदायांचे असे संघर्ष की ज्यांना अभिवादन केल्याशिवाय कोणीही भारतीय आजही पुढे जाऊ शकत नाही. या साऱ्याला मनोविकास प्रकाशन अभिवादन करत आहे 'बदलता भारत : पारतंत्र्यातून महासत्तेकडे... ' या आपल्या महाग्रंथाद्वारे! असा ग्रंथ की जो स्वातंत्र्य संग्रामाचा व स्वातंत्र्योत्तर देश उभारणीचा अनोख्या पद्धतीने अगदी मुळापासून वेध घेतो. ज्यात ‘रामायाण-महाभारत आणि भारतीय राष्ट्रवाद’, ‘छत्रपती शिवाजी, मराठेशाही आणि स्वातंत्र्याची वाटचाल’, ‘जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प’, ‘विवेकानंदांचा धर्म आणि त्यांची भारताची कल्पना’, ‘सावरकर-जीना आणि द्विराष्ट्रवाद’, ‘डावी कॉंग्रेस, उजवे राजकारण आणि सुभाषचंद्र बोस’, ‘चित्रपटांतून घडणारं भारतीयतेचं दर्शन’, ‘भारतीयता आणि बहुसांस्कृतिकता’ अशा विविध विषयांची सखोल मांडणी आहे. एक असा ग्रंथ की ज्याच्या दोन खंडातील आठ विभागात गुंफलेले साठ लेख आपल्याशी बोलतात - या सार्या गुंतागुंतीच्या आणि रोमांचकारी इतिहासावर. ते उकलतात या देशाचे असे अंतरंग की जे जितके विलोभनीय आहे तितकेच विषण्ण करणारेही आहे. विविध नामवंत लेखकांनी स्वतंत्र दृष्टिकोनांमधून आणि आपापल्या परिप्रेक्ष्यांतून भारतीय जीवनाच्या विविध क्षेत्रांचे आणि पैलूंचे केलेले परखड विश्लेषण! ज्यातून आपल्या समोर येतो भारताच्या भविष्याची निश्चित अशी दिशा उलगडणारा महाग्रंथ!! अनुक्रमणिका खंड : १ विभाग १ : आधुनिक भारताची जडणघडण : वाटा आणि वळणे १. बहुभाषिक राष्ट्र : इतिहास आणि भविष्य - अविनाश पांडे, रेणुका ओझरकर २. आर्यवादाचे औचित्य आणि भारतीय राष्ट्रवाद - हेमंत राजोपाध्ये ३. रामायण-महाभारताचे ‘लोकप्रिय’ राजकारण - श्रद्धा कुंभोजकर ४. प्रतिमांच्या कोंदणात अडकलेला मराठा इतिहास - प्राची देशपांडे ५. १८५७ : उठाव की स्वातंत्र्ययुद्ध? - अरविंद गणाचारी ६. इतिहासलेखन : दुहीचे की एकतेचे साधन? - जास्वंदी वांबुरकर विभाग २ : राजकीय इतिहास : विरोधाभास आणि वास्तव ७. राष्ट्रउभारणी : मुस्लिमांचे योगदान आणि भारतीयत्व - बशारत अहमद ८. भेदभावाच्या कोंडीत सापडलेला मुस्लीम राष्ट्रवाद - सरफराज अहमद ९. फाळणीआणि जीना-सावरकर - श्याम पाखरे १०. नेताजींचे‘गूढ’, कॉंग्रेस आणि उजवे राजकारण - रवी आमले ११. लोकशाही समाजवादाची वेगळी वाट - संजय मं गो १२. कम्युनिस्ट पक्ष : चढउताराचा आलेख - अशोक चौसाळकर १३. जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प : विरोधाभासी भारत - एस पी शुक्ला विभाग ३ : साहित्य-कला : भारतीय स्वातंत्र्याचे दर्शन १४. शोध सांगितिक भारतीयतेचा - नीला भागवत १५. मराठी कविता :स्वातंत्र्याचे उद्गार - रणधीर शिंदे १६. रंगभूमी : ‘राष्ट्रीय करमणूक’ की सामाजिक कल्लोळाचा वेध? - मकरंद साठे १७. भारतीयतेच्या शोधात हिंदी कादंबरी - सूर्यनारायण रणसुभे १८. संग्रहालये-स्मारकातील संस्कृती - दीपक घारे १९. दृश्यकला आणि बदलती भारतीय अभिव्यक्ती - नूपुर देसाई २०. लोकप्रिय भारतीय आरसा : हिंदी चित्रपट! - अशोक राणे विभाग ४ : लोकशाही, राजकीय बहुलता आणि राष्ट्रीय सुरक्षा २१. नागरिकत्व, राष्ट्र आणि लोकशाही : नवी आव्हाने - गणेश देवी २२. भारतीय लोकशाहीचे वेगळेपण ! - सुहास पळशीकर २३. राज्य कायद्याचे, पण न्याय किती? - उद्धव कांबळे २४. उपखंडातील भळभळती जखम : काश्मीर - प्रताप आसबे २५. पूर्वोत्तर भारत : सप्तभगिनी आणि सापत्नभाव - गायत्री लेले २६. शक्तिमान शेजारी आणि राष्ट्रवादांमधील तणाव - परिमल माया सुधाकर २७. भारतीय लष्कर आणि राष्ट्रीय सुरक्षा - विजय खरे २८. गुप्तचर यंत्रणा : सुशासन की सत्तेचे केंद्रीकरण? - अनंत बागाईतकर २९. संघराज्य,स्वायत्तता आणि अर्थपूर्ण लोकशाही - जयंत लेले ३०. स्वातंत्र्य - गोपाळ गुरु अनुक्रम खंड : २ विभाग १ : धर्म आणि संस्कृती : एकवचनी की बहुवचनी? १. विवेकानंद : वेष भगवा, स्वप्न समाजवादी भारताचे! - दत्तप्रसाद दाभोळकर २. धम्मक्रांतीचे सांस्कृतिक राजकारण - रावसाहेब कसबे ३. जमातवाद, दंगली आणि एकात्मता - इरफान इंजिनीयर ४. बदनाम धर्मनिरपेक्षता : एकात्म भारत घडणार कसा? - किशोर बेडकीहाळ ५. भारतीयता आणि सांस्कृतिक विविधता? - शांता गोखले ६. लोकसंस्कृतीचे सामर्थ्य आणि स्वातंत्र्य! - तारा भवाळकर ७. वेध विद्रोही जनसंस्कृतीचा - सचिन गरुड विभाग २ : राष्ट्रीयतेची साधने आणि स्वातंत्र्याची माध्यमे ८. हंटर ते नवे शैक्षणिक धोरण : विद्यार्थीकेंद्री शिक्षणाचा अभाव - डॉ.हेमचंद्र प्रधान ९. उच्चशिक्षण : सामाजिककडून आर्थिक मक्तेदारीकडे! - मिलिंद वाघ १०. राष्ट्रीय संस्था : देशाचा गौरवास्पद आधार - श्रीरंजन आवटे ११. विज्ञान-तंत्रज्ञान : भारत मागे पडतोय? - डी रघुनंदन १२. जनतेचे आरोग्य आणि राष्ट्राचे ‘स्वास्थ्य' - अनंत फडके १३. मैदान : क्रीडासंस्कृतीचे आणि राष्ट्रवादाचे? - पराग फाटक, ओंकार डंके १४. प्रसारमाध्यमांचे स्वातंत्र्य आणि राष्ट्रवादाचे कंपनीकरण - अभिषेक भोसले विभाग ३ : भारतीय विकासाचे पेच आणि पर्याय १५. वसाहत ते ‘अच्छे दिन' : विकासाचा पेच कायमचाच - शमा दलवाई १६. टाटा-बिर्ला ते अंबानी-अदानी : स्वातंत्र्योत्तर साटेलोटे-राज्य! - सचिन रोहेकर १७. शेतीची कोंडी आणि ‘इंडिया विरुद्ध भारत' - जयदीप हर्डीकर १८. ‘माता', ‘मंदिरे' आणि भारतीय जल-सिंचन! - प्रदीप पुरंदरे १९. सहकार : मार्ग जुना, दृष्टी नवी - गजानन खातू २०. सार्वजनिक क्षेत्र आणि खासगीकरणाचे ग्रहण - संजीव चांदोरकर २१. ‘विकासा'पलीकडचा गांधीमार्ग - पराग चोळकर २२. पर्यावरणीय संकट आणि विकासाचा शाश्वत पर्याय - के जे जॉय विभाग ४ : नवा भारत घडवणाऱ्या शक्ती २३. आदिवासींचा न संपलेला स्वातंत्र्यलढा! - देवकुमार आहिरे २४. भटक्या-विमुक्तांचे राष्ट्र कोणते? - नारायण भोसले २५. जातीचे द्वैत आणि राष्ट्रवादातील दुभंग - दिलीप चव्हाण, देवेंद्र इंगळे २६. बदलते जातवास्तव आणि अस्मितांचे राजकारण - शैलेंद्र खरात २७. अनिवासी भारतीय : ‘काळे पाणी' ते ‘गोरे' पाणी? - आनंद करंदीकर २८. कामगार चळवळीचे बदलते स्वरूप आणि नवी दिशा - अजित अभ्यंकर २९. सती ते पद्मावती : जोहार स्त्रियांचाच! - माया पंडित ३०. महिलांचे राजकीय नेतृत्व : बदल घडवेल? - संध्या नरे-पवार
Azadi
- Author Name:
Arundhati Roy
- Book Type:

- Description: आज़ादी—कश्मीर में आज़ादी के संघर्ष का नारा है, जिससे कश्मीरी उस चीज़ की मुख़ालफ़त करते हैं जिसे वे भारतीय क़ब्ज़े के रूप में देखते हैं। विडम्बना ही है कि यह भारत की सड़कों पर हिन्दू राष्ट्रवाद की परियोजना की मुख़ालफ़त करनेवाले लाखों अवाम का नारा भी बन गया। आज़ादी की इन दोनों पुकारों के बीच क्या है–क्या यह एक दरार है या एक पुल है? इस सवाल के जवाब पर ग़ौर करने का वक़्त अभी आया ही था कि सड़कें ख़ामोश हो गईं। सिर्फ़ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की सड़कें। कोविड–19 के साथ आई आज़ादी की एक और समझ, जो कहीं ख़ौफ़नाक थी। इसने मुल्कों के बीच सरहदों को बेमानी बना दिया, सारी की सारी आबादियों को क़ैद कर दिया और आधुनिक दुनिया को इस तरह ठहराव पर ला दिया जैसा कभी नहीं देखा गया था। रोमांचित कर देनेवाले इन लेखों में अरुंधति रॉय एक चुनौती देती हैं कि हम दुनिया में बढ़ती जा रही तानाशाही के दौर में आज़ादी के मायनों पर ग़ौर करें। इन लेखों में, हमारे बेचैन कर देनेवाले इस वक़्त में निजी और सार्वजनिक ज़ुबानों पर बात की गई है, बात की गई है क़िस्सागोई और नए सपनों की ज़रूरत की। रॉय के मुताबिक़, महामारी एक नई दुनिया की दहलीज़ है। जहाँ आज यह महामारी बीमारियाँ और तबाही लेकर आई है, वहीं यह एक नई क़िस्म की इंसानियत के लिए दावत भी है। यह एक मौक़ा है कि हम एक नई दुनिया का सपना देख सकें। आज के समय में जब समाज को बाँटने और नफ़रत की राजनीति मज़बूत हो रही है, ऐसे में लेखिका विचार करती हैं कि क़िस्सागोई और भाषा की भूमिका कितनी अहम है। किताब का ख़ास हिस्सा नए नागरिकता क़ानून (सीएए) और एनपीआर-एनसीआर के बारे में है, और इनके ख़िलाफ़ आंदोलनों के बारे में भी। लेखिका ने इस राजनीति और बँटे हुए समाज में कोरोना महामारी के मायने और प्रभाव को एक गहरी नज़र से देखने की कोशिश की है। एक उपन्यासकार के रूप में लेखिका ने अपने दोनों उपन्यासों को सोचने और उन्हें लिखने की प्रक्रिया पर विस्तार से लिखा है। साथ ही एक निबंध लेखक के रूप में अपने काम पर भी एक निगाह डाली है। अनुवाद ऐसा जैसे किताब मूल हिन्दी में लिखी गई हो।.
Arctic : Madhya Ratri Ke Surya Ka Kshetra
- Author Name:
Neloy Khare +1
- Book Type:

- Description: आर्कटिक ः मध्य रात्रि के सूर्य का क्षेत्र—निलय खरे, श्यामसुंदर शर्मा पृथ्वी के सुदूर उत्तरी भाग में स्थित आर्कटिक क्षेत्र अपने में एक पूरे महासागर को समेटे हुए है और वर्ष में अधिकांश समय बर्फ से ढका रहता है। यद्यपि यह इतना निर्जन प्रदेश तो नहीं है, जैसा कि एकदम दक्षिण में स्थित अंटार्कटिक, परंतु संसार के सबसे विरल आबादीवाले क्षेत्रों में से एक अवश्य है। भारत के लिए आर्कटिक महासागर का विशेष महत्त्व है। यह महासागर न सिर्फ हमारी जलवायु बल्कि मानसून पवनों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित करता है, इसलिए आर्कटिक का गहन अध्ययन हमारे वैज्ञानिकों के लिए समय-संगत है। प्रस्तुत पुस्तक आर्कटिक क्षेत्र की भौतिक रचना, इसकी खोज का इतिहास, जलवायु, बर्फ, खनिज, यहाँ के निवासी, यहाँ पाई जानेवाली वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं और भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों इत्यादि का रोचक वर्णन सरल भाषा में करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक के लेखक डॉ. निलय खरे स्वयं तीन बार आर्कटिक जा चुके हैं। उनके स्वयं के अनुभवों और व्यावहारिक ज्ञान से परिपूर्ण यह पुस्तक अत्यंत प्रामाणिक और जानकारीपरक बन गई है।
Sangh Samjun Ghetana
- Author Name:
Dattaprasad Dabholkar
- Rating:
- Book Type:

- Description: भर वर्षांच्या अथक, एकाकी, समर्पित, कष्टप्रद, काही काळ यातनामय वाटचालीनंतर संघ आज निर्विवादपणे सत्तेत केंद्रस्थानी उभा आहे. संघाने स्पष्टपणे सांगितलंय आमचा फक्त एककलमी कार्यक्रम आहे, ‘हिंदूंचाच हिंदूस्थान' म्हणजे हे हिंदूराष्ट्र आहे. भारत हे संघराज्य नाही ते एक राष्ट्र आहे आणि हा देश एकाधिकारशाही मानतो. भारतरत्न बाबासाहेब आंबेडकर राज्यघटना बनवत असताना ऑरगनायर्झरने त्याला कडवा विरोध केलाय. या देशाची घटना मनुस्मृतीवर आधारित हवी म्हणून सांगितले. राजकारण करताना ‘वारांगनेव नृपनिती अनेकरूपा' हा मंत्र बरोबर ठेवा आणि मुखवटे घालून राजकारणात वाटचाल करा. हा आदेश संघाने राजकारणात पाठवलेल्या स्वयंसेवकांना दिलाय. पुरोगामी परिवर्तनवादी चळवळ ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने' म्हणून त्याकडे उपेक्षेने खरंतर उपहासाने पाहत उभी होती. आज ही चळवळ भांबावलेल्या खरंतर भेदरलेल्या अवस्थेत आहे. त्यामुळे खरी गरज आहे, यातून बाहेर येवून संघाची शक्तिस्थाने आणि मर्मस्थाने जाणून घेण्याची व पुरोगामी परिवर्तनवादी चळवळीने केलेले ‘हिमालयीन ब्लंडर' समजावून घेत रणनीती ठरविण्याची.या व अशा प्रश्नांचा मागोवा घेत अस्वस्थ मनस्थितीत गेल्या दहा वर्षात दत्तप्रसाद दाभोळकर यांनी लिहिलेल्या काही प्रमुख लेखांचे हे संकलन. आज आपणासमोर असलेल्या धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक राजकारणाचा चक्रव्यूह समजावून घेण्यासाठी हे पुस्तक वाचले आणि संग्रहीपण ठेवले पाहिजे. Sangh Samjun Ghetana | Dattaprasad Dabholkar संघ समजून घेताना | दत्तप्रसाद दाभोळकर
Stritvavadi Vimarsh : Samaj Aur Sahitya
- Author Name:
Kshama Sharma
- Book Type:

- Description: किसी बुज़ुर्ग के पाँव छुइए और आशीर्वाद पाइए—‘मेरे पूत बने रहें,’ या कि ‘अखंड सौभाग्यवती रहो,’ यानी कि जब मरो तो सुहागिन मरो। यह जीवन का नहीं, मृत्यु का वरदान है। इस प्रकार के वरदानों से हमारा प्राचीन साहित्य भरा पड़ा है। जहाँ एक ओर नायिका–भेद पढ़ाए जाते हैं तो दूसरी ओर स्त्रियों से बचने के तरीक़े। ‘औरत पर कभी भरोसा न करो।’—यह इन महान ग्रन्थों का सूत्र–वाक्य है। स्त्रियों और दलितों से इस समय का समाज इतना आक्रान्त है कि उन्हें पीटने का कोई तरीक़ा नहीं छोड़ता। चूँकि सारे विधान, सारी संहिताएँ, सारे नियम, धर्म, क़ानून पुरुषों ने रचे हैं, इसलिए हर क़ानून, हर रीति–रिवाज और परम्परा का पलड़ा उनके पक्ष में झुका हुआ है। माफ़ कीजिए, साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। एक भारतीय नारी जो त्यागमयी है, सती–सावित्री है, जिसके मुँह में ज़ुबान नहीं है, जो सबसे पहले उठती है, दिन–भर घर की चक्की में पिसती है, सबसे बाद में सोती है, जो कभी शिकायत नहीं करती और इसी के बरक्स एक पश्चिमी नारी जो स्कर्ट पहनती है, सिगरेट पीती है, मर्दों के साथ क्लबों में नाचती है, एक नहीं, बहुत सारे प्रेमी पालती है—इन दो स्टीरियो टाइप में हर कठिन परिस्थिति के बाद भारतीय नारी की विजय होती है और पश्चिमी संस्कृति की प्रतीक नारी या तो किसी की गोली का शिकार होती है अथवा भारतीय नारी अपने पति, जो इस ‘कुलटा’ द्वारा फँसा लिया गया था, के द्वारा झोंटा पकड़कर बाहर निकाल दी जाती है। जितनी दूर तक उसे घसीटा जाता है, उतनी ही दूर और देर तक पश्चिमी संस्कृति पर भारतीय संस्कृति की विजय की तालियाँ आप सुन सकते हैं। ऐसे ही समाज और साहित्य के विभिन्न आयामों से गुज़रती यह पुस्तक स्त्री-परिदृश्य में एक बड़े विमर्श को जन्म देती है, और कई अनदेखी चीज़ों को देखने की दृष्टि भी। आज के दौर में एक बेहद ही महत्त्वपूर्ण कृति है ‘स्त्रीवादी-विमर्श : समाज और साहित्य’।
Jirah Ajudhia
- Author Name:
Rakesh Tewari
- Book Type:

- Description: ‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Everybody Loves A Good Drought
- Author Name:
P. Sainath
- Rating:
- Book Type:

- Description: A CLASSIC OF REPORTAGE FROM RURAL INDIA BY AWARD-WINNING AUTHOR, WITH A FOREWORD BY GOPALKRISHNA GANDHI – Prescribed in over 100 universities – Reveals the human face of poverty – Key to understanding issues of globalization, human rights, development economics in India – One of the classics of journalism Acclaimed across the world, prescribed in over 100 universities and colleges, and included in part in The Century’s Greatest Reportage (Ordfront, 2000), alongside the works of Gabriel Garcia Marquez, Studs Terkel and John Reed, Everybody Loves a Good Drought is the established classic on rural poverty in India. Twenty years after publication, it remains unsurpassed in the scope and depth of reportage, providing an intimate view of the daily struggles of the poor and the efforts, often ludicrous, made to uplift them. An illuminating introduction accompanying this twentieth-anniversary edition reveals, alarmingly, how a large section of India continues to suffer in the name of development so that a small percentage may prosper. Besides exposing chronic misgovernance, it is also a devastating comment on the media’s failure to speak for the voiceless.
Vibhram Aur Yathartha
- Author Name:
Christopher Caudwell
- Book Type:

-
Description:
‘विभ्रम और यथार्थ’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखी गई काव्यशास्त्र की सम्भवतः पहली और हमारे युग की विशिष्टतम पुस्तक है। इसमें कविता की तो चर्चा है ही, कविता के स्रोतों की भी चर्चा की गई है। कविता भाषा में लिखी जाती है, इसलिए इस पुस्तक में भाषा के स्रोतों का भी विवेचन किया गया है। भाषा मनुष्य को समाज से प्राप्त होती है। एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से लोग न केवल अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, एक-दूसरे को प्रेरित और प्रोत्साहित भी करते हैं, इसलिए भाषा समाज में रहनेवाले मनुष्यों की प्रेरणा का भी उपकरण है। यानी कविता के स्रोतों का अध्ययन समाज के अध्ययन का अंग है, उसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता। साहित्य समाज की उपज है, यह कोई नई स्थापना नहीं है। किन्तु मार्क्सवादी समीक्षा-प्रणाली में इसका निहितार्थ यह होता है कि साहित्य या कला की आलोचना के लिए आलोचक को साहित्य से बाहर जाना पड़ता है। उसके लिए साहित्य केन्द्रीय महत्त्व का होता है, किन्तु भौतिक विज्ञान, नृतत्त्वशास्त्र इतिहास और दर्शनशास्त्र आदि विषय में भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इस पुस्तक में साहित्य के सैद्धान्तिक अध्ययन के लिए विशुद्ध सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण के निषेध और साहित्य अथवा कविता के मूल्यों को साहित्येतर मूल्यों के सन्दर्भ में देखने का आग्रह किया गया
है।कॉडवेल इस बात की लगातार वकालत करते दिखते हैं कि कला को कला के भीतर से नहीं, अपितु उसके बाहर से (यानी समाज के भीतर से) देखना चाहिए। उनके मतानुसार, कला या साहित्य की आलोचना शुद्ध सर्जना अथवा शुद्ध रसास्वादन से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें एक समाजशास्त्रीय तत्त्व निहित होता है। वस्तुतः साहित्य के हर जिज्ञासु पाठक के लिए यह अत्यंत आवश्यक और उपयोगी पुस्तक है।
Uttar Bharat Mein Chamar Aur Dalit Aandolan Ka Itihas
- Author Name:
Ramnarayan S. Rawat
- Book Type:

- Description: ‘उत्तर भारत में चमार और दलित आन्दोलन का इतिहास’ दलितों के उन संघर्षों का इतिहास है, जो उन्होंने अस्पृश्यता और बेगार-प्रथा के विरुद्ध और अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए किए थे और जिनमें वे सफल हुए थे। यह पहली कृति है जिसमें दलितों के सन्दर्भ में औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के समय तक की गहरी छानबीन की गई है। इसमें प्रामाणिक तथ्यों के ज़रिये बतलाया गया है कि अधिकतर चमार हमेशा से किसान रहे हैं। लेकिन औपनिवेशिक इतिहासकारों ने उन्हें खालों के लिए मवेशियों को ज़हर देकर मारने वाला गठित अपराधी गिरोह बताया। इस मिथ्या धारणा को नकारने की ज़रूरत राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी नहीं समझी। दरअसल ब्राह्मणों ने सभी शिल्पकार और किसान जातियों के बारे में ऐसी धारणाएँ गढ़ी थीं जो लगभग प्रत्येक दलित जाति के लिए अस्पृश्यता का कारण बनता है। इनके विरुद्ध दलितों की विभिन्न स्तरों पर प्रतिक्रियाएँ और प्रतिरोध हुए लेकिन यह सब इतिहास में प्रायः अनुल्लिखित रहा, जिन्हें सामने लाकर यह पुस्तक एक ज़रूरी सन्दर्भ मुहैया कराती है। डॉ. आंबेडकर से भी एक सदी पहले, उत्तर प्रदेश में शुरू हुए चमारों के अस्मिता-आन्दोलन, उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश में शुरू हुए किसान-आन्दोलन में दलितों के प्रतिनिधित्व और तीसरे दशक में चले आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन पर इसमें विस्तार से विचार किया गया है। आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन ने राजनीतिक संगठन के लिए सम्पूर्ण दलित जातियों के लिए एक मूल श्रेणी के रूप में ‘अछूत’ पहचान का निर्माण किया, जिसने नया दलित-इतिहास निर्मित किया और वे प्रमुख मुद्दे निर्धारित किए जो बीते आठ दशक से दलित राजनीति को आकार दे रहे हैं। बेशक यह दलित आन्दोलन को उसके मूल परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए एक आवश्यक पुस्तक है। पठनीय, विचारणीय और संग्रहणीय!
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
- Book Type:

- Description: कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
DHARMADVANDVA
- Author Name:
Shabnam Gupta
- Book Type:

- Description: धर्मद्वद्वं एक रोचक काल्पनिक कथानक है। जिस समय में भारतवर्ष पांडवों और कौरवों के दो पालों में बँटता दिख रहा था, उस समय में एक ऐसा आचार्य था जो किसी राजवंश के नहीं, देश के सर्वोपरि होने की बात करता था। जब धर्म अपने नियत खूटे में बँधा हुआ था, तब वो उसकी सीमा रेखा के आगे जाकर, एक नई परिभाषा लिखता था जहाँ धर्म और विवेक का संगम होता है । जिस परिवेश में स्त्री को वस्तु की तरह पाँच भाइयों में बाँट दिया गया था, उसी परिवेश में वह स्त्री शिक्षा और सशक्तिकरण का पाठ पढ़ाता था। जब समाज, वर्ण और वर्ग में बँटा हुआ था, तब वो जन्म नहीं, कर्म से मनुष्य की पहचान बनाने में क्रियार्थ था। ये उस काल्पनिक आचार्य की कहानी है, जिसका नाम वासू था। भारतीय पौराणिक आख्यान पर केंद्रित मर्मस्पर्शी तथा पठनीय कृति, जो आपको जीवन के आदर्श और मानवमूल्यों से परिचय कराएगी
Gandhi Ke Desh Mein
- Author Name:
Sudhir Chandra
- Book Type:

-
Description:
विवेक, सन्मति और सदाशयता के धनी चिन्तक, विख्यात इतिहासकार सुधीर चन्द्र की निबन्ध पुस्तक।
‘‘सत्य, अहिंसा, प्रेम, अस्तेयादि एक झटके में और कायमी तौर पर लोगों की ज़िन्दगी में परिवर्तन ला देनेवाले गुण नहीं हैं। ख़ुद गांधी सारी ज़िन्दगी अपने को गांधी बनाने में लगे रहे थे। पर गांधी के नाम पर सब कुछ निछावर करनेवालों ने क़ुर्बानियाँ जो भी की हों, उन लोगों ने अपने को वैसा बनाने की कोशिश नहीं की जैसा बनकर ही गांधी का स्वराज हासिल हो सकता था।’’
‘‘गांधी की हमारी समझ गम्भीर रूप से अपूर्ण रहेगी जब तक हम अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में उस हिंसा के स्वरूप और परिस्थितियों को समझने की शुरुआत नहीं करते, जिसे नैतिक हिंसा कहा जा सके।’’
‘‘समलैंगिकता को अप्राकृतिक या अस्वाभाविक मान लेने का आधार क्या है? इसी से जुड़ा एक बुनियादी सवाल भी उठता है : क्या किसी कर्म का अप्राकृतिक होना काफ़ी है उसे दंडनीय अपराध बनाए जाने के लिए? किसी कर्म का प्राकृतिक या अप्राकृतिक होना—जिस हद तक इस तरह का निर्धारण सम्भव है—उसे अपराध की श्रेणी में न तो लाता है और न ही उससे बाहर रखता है। हिंसा और वासना से जुड़े तमाम अपराधों को प्राकृतिक कृत्यों के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी तरफ़ सभ्यता और संस्कृति का विकास उत्तरोत्तर हमें प्रकृति से दूर लाता आया है।’’
‘‘जो मैं नहीं समझ पाता वह है बहुत सारे लोगों का विश्वास, देरीदा की मिसाल देते हुए कि, ‘डीकंस्ट्रक्शन’ और परिणामस्वरूप उत्तर-आधुनिकतावाद ‘एमॉरल’—नैतिक-अनैतिक से परे—है। देरीदा को, न कि देरीदा के बारे में, थोड़ा ही सही, पढ़े बगै़र कुछ प्रचलित भ्रान्तियों को मान लेना बौद्धिक आलस है।’’
देश के गतिशील समकालीन यथार्थ को समझने के लिए एक ज़रूरी पाठ।
Rajkahini-The Princely Tales of Rajasthan
- Author Name:
Abanindranath Tagore
- Rating:
- Book Type:

- Description: Rajkahini-The Princely Tales of Rajasthan is an English translation of Abanindranath Tagore's Bengali classic Rajkahini. It is a collection of nine stories that are replete with episodes and incidents involving the royalty of Rajasthan. Expectedly, therefore, bravery, nobility palace intrigues, wars, skirmishes, feuds betrayal, caste, religion, marriage, motherhood and progeny, all play a dynamic role as the fictionalized social and political history of early Rajasthan is unfurled. Authoring Rajkahini as a literary expression of the legends and tales of the Rajput kings can also be considered a part of the postcolonial action to etch out a narrative that could draw the far part of the nation closer to the Bengali readership.
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book