Meri Dhaka Diary
(0)
Author:
Madhu KankariyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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वरिष्ठ कथाकार मधु कांकरिया की 'मेरी ढाका डायरी' एक प्रबुद्ध व्यक्ति की आँख से एक देश और उसके समाज की ली गई थाह है। यह देश है पड़ोस का बांग्लादेश जिससे हम भारतीयों की हमेशा से साझेदारी रही है, कुछ इतनी गहरी कि वक़्त की करवटों की बदौलत बीच में खिंच गई नई सरहद के बावजूद, आज भी दोनों देशों के आम अवाम के दिल में बहुत कुछ एक-सा धड़कता है। यह किताब वक़्त की उन करवटों और उस ‘एक-सी धड़कन’, दोनों का जायज़ा लेती है। लेखक की ख़ासियत यह है कि बांग्लादेश में प्रवास के दौरान वह न केवल वहाँ की परिस्थितियों को हिसाब में लेती हैं बल्कि उन परिस्थितियों से प्राप्त सूत्रों से उन कारणों की शिनाख़्त भी करती चलती हैं जिनसे ‘सोनार बांग्ला’ की श्यामल भूमि का सहज हास बाधित हो रहा है। ये कारण हैं ग़रीबी की गहरी जड़ें, बहुसंख्यक आबादी के बीच साम्प्रदायिकता की बढ़ती पैठ और अल्पसंख्यकों में बढ़ता असुरक्षाबोध आदि। एक संवेदनशील लेखक के तौर पर मधु कांकरिया आज के बांग्लादेश के इन सभी पहलुओं को देखती हैं और ढाका के अभिजात इलाक़ों से लेकर ग़रीब-गुरबा की दैनिक जद्दोजहद तक को अपने दायरे में लेती हुईं वर्तमान बांग्लादेश से हमारा परिचय कराती हैं। कह सकते हैं कि यह पाठ एक देश ही नहीं, मानवीय जीवन की भी महागाथा है।
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वरिष्ठ कथाकार मधु कांकरिया की 'मेरी ढाका डायरी' एक प्रबुद्ध व्यक्ति की आँख से एक देश और उसके समाज की ली गई थाह है। यह देश है पड़ोस का बांग्लादेश जिससे हम भारतीयों की हमेशा से साझेदारी रही है, कुछ इतनी गहरी कि वक़्त की करवटों की बदौलत बीच में खिंच गई नई सरहद के बावजूद, आज भी दोनों देशों के आम अवाम के दिल में बहुत कुछ एक-सा धड़कता है।
यह किताब वक़्त की उन करवटों और उस ‘एक-सी धड़कन’, दोनों का जायज़ा लेती है। लेखक की ख़ासियत यह है कि बांग्लादेश में प्रवास के दौरान वह न केवल वहाँ की परिस्थितियों को हिसाब में लेती हैं बल्कि उन परिस्थितियों से प्राप्त सूत्रों से उन कारणों की शिनाख़्त भी करती चलती हैं जिनसे ‘सोनार बांग्ला’ की श्यामल भूमि का सहज हास बाधित हो रहा है। ये कारण हैं ग़रीबी की गहरी जड़ें, बहुसंख्यक आबादी के बीच साम्प्रदायिकता की बढ़ती पैठ और अल्पसंख्यकों में बढ़ता असुरक्षाबोध आदि।
एक संवेदनशील लेखक के तौर पर मधु कांकरिया आज के बांग्लादेश के इन सभी पहलुओं को देखती हैं और ढाका के अभिजात इलाक़ों से लेकर ग़रीब-गुरबा की दैनिक जद्दोजहद तक को अपने दायरे में लेती हुईं वर्तमान बांग्लादेश से हमारा परिचय कराती हैं। कह सकते हैं कि यह पाठ एक देश ही नहीं, मानवीय जीवन की भी महागाथा है।
Book Details
-
ISBN9789360865047
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘कठघरे में लोकतंत्र’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। इस पुस्तक में संकलित लेखों में अरुन्धति रॉय ने आम जनता पर राज्य-तंत्र के दमन और उत्पीड़न का जायज़ा लिया है, चाहे वह हिन्दुस्तान में हो या तुर्की में या फिर अमरीका में। जैसा कि इस किताब के शीर्षक से साफ़ है, ये सारे लेख ऐसी तमाम कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हैं जिनके चलते लोकतंत्र–यानी जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन–मुट्ठी-भर सत्ताधारियों का बँधुआ बन जाता है।
अपनी बेबाक मगर तार्किक शैली में अरुन्धति रॉय ने तीखे और ज़रूरी सवाल उठाए हैं, जो नए विचारों ही को नहीं, नई सक्रियता को भी प्रेरित करेंगे। और यह सच्चे लोकतंत्र के प्रति अरुन्धति की अडिग निष्ठा का सबूत हैं।
–नीलाभ
Adab Se Muthbhed
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- Description: अदब से मुठभेड़ में हमारे वक्त के पाँच महत्त्वपूर्ण रचनाकारों—राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, प्रियंवद, शिवमूर्ति और मक़बूल फ़िदा हुसेन—से ओमा शर्मा के अलग-अलग लिए गए साक्षात्कार संकलित हैं। यह किताब सिर्फ इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि ये व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण हैं, दरअसल यह किताब, साक्षात्कारकर्ता के अनचाहे, अनजाने ही साक्षात्कारों की एक सैद्धान्तिकी जैसी बन गई है। जैसे राजेन्द्र यादव से बातचीत में एक बिन्दु वह भी आता है जब यह राजेन्द्र यादव का राजेन्द्र यादव से साक्षात्कार बन जाता है। इसी तरह हुसेन से बातचीत के दौरान उनकी जानी-पहचानी छवि के बरक्स, हमारी मुलाकात एक कमजोर, वेध्य, गुस्सैल हुसेन से होती है—उस जलावतनी के एहसास के चलते भी, जो पार्श्व में एक उदास धुन सरीखा बजता रहता है। मन्नू भंडारी से साक्षात्कार जैसे मन्नू जी की ही कोई लम्बी कहानी हो—एक घरेलू दिखने वाली, बौद्धिक तड़क-भड़क से दूर, सीधी-सादी संकोचशील लेखिका, उस वक्त के नामचीन लेखकों के बहुत करीब रहते हुए भी उनसे बेपरवाह, सिर्फ अन्तःप्रेरणा से मार्गदर्शन लेती, एक तनाव भरे दाम्पत्य के बीच खामोशी से अपना काम करते हुए, किस प्रकार ‘महाभोज’ और ‘आपका बंटी’ जैसे उपन्यासों और बेशुमार कहानियों में अपने समय का एक विश्वसनीय साक्ष्य रच पाती है, यह जानना एक मार्मिक अनुभव है। जिस प्रकार कलाकार या लेखक की दुनिया अलग होती है, उसी तरह यहाँ तक जाने के रास्ते भी समान नहीं होते। अगर प्रियंवद की दुनिया तक जाने का रास्ता सुरंग सरीखी व्यूहात्मक और उलझी हुई गलियों से गुजरता है तो शिवमूर्ति के सन्दर्भ में यह एक तपती हुई पगडंडी है, बीच-बीच में गुम हो जाती हुई। शिवमूर्ति इस बातचीत में अपने अन्तर्मन को जिस तरह अनावृत्त करते हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ भी बीच-बीच में विस्फोट की तरह आनेवाले ऐसे लम्हे बेशुमार हैं जब इस महादेश का विकराल और लोमहर्षक यथार्थ, सर्वदा घात लगाए—जैसे अचानक सामने आता और आपके कन्धे बेरहमी से झिंझोड़ देता है। —योगेन्द्र आहूजा
Aisa Kyon Hota Hai
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Zindagi Ki Kitab (A To Z)
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Alochak Aur Alochana
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Bachchan Singh
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- Description: पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
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