The Lowland
Author:
Jhumpa LahiriPublisher:
Penguin IndiaLanguage:
EnglishCategory:
Contemporary-fiction2 Ratings
Price: ₹ 373.5
₹
450
Unavailable
Two brothers bound by tragedy. A fiercely brilliant woman haunted by her past. A country torn by revolution. A love that lasts long past death. This extraordinary, emotionally riveting new novel, set in India and America, expands the scope and range of one of our most beloved storytellers: the Pulitzer Prize-winning, #1 New York Times best-selling author of Interpreter of Maladies and Unaccustomed Earth.
Born just fifteen months apart, Subhash and Udayan Mitra are inseparable brothers, one often mistaken for the other in the Calcutta neighborhood where they grow up. But they are also opposites, with gravely different futures ahead. It is the 1960s, and Udayan-charismatic and impulsive-finds himself drawn to the Naxalite movement: he will give everything, risk all, for what he believes. Subhash, the dutiful son, does not share his brother’s political passion; he leaves home to pursue a life of scientific research in a quiet, coastal corner of America.
But when Subhash learns what happened to his brother in the lowland outside their family’s home, he comes back to India, hoping to pick up the pieces of a shattered family, and to heal the wounds Udayan left behind-including those seared in the heart of his brother’s wife.
Suspenseful, sweeping, piercingly intimate, The Lowland is a masterly novel of fate and will, exile and return. Shifting among the points of view of a wide range of richly drawn characters, it is at once a page-turner and a work of great beauty and complex emotion; an engrossing family saga with very high stakes; and a story steeped in history that seamlessly spans generations and geographies. A tour de force and an instant classic, this is Jhumpa Lahiri at the height of her considerable powers.
ISBN: 9788184005752
Pages: 352
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Mamta Kaliya
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- Description: ‘सच्चा झूठ’ उपन्यास का विषय कोरोना काल है, और यह कहानियाँ सुनाता है उन लोगों की जो अपनी-अपनी जगहों पर, अपनी-अपनी हैसियत और हदों के साथ इस स्याह समय से गुज़रे, जिन्होंने इसकी तकलीफ़ों, डरों, सदमों और दुखों को कभी हिम्मत से तो कभी आशंकाओं के साथ झेला। यानी कथा है हम सब की। बहुत समय नहीं बीता है, जब सारी दुनिया अचानक कोरोना नाम की इस ख़ौफ़नाक महामारी के सामने असहाय हो गई थी। अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े, सब अचानक ऐसे हालात के सामने आ खड़े हुए जिनसे निबटने का तरीका किसी को नहीं आता था। एक नए ढंग की छुआछूत ने हम सबको अपनों तक से दूर कर दिया। शारीरिक दूरी की जगह सामाजिक दूरी ने ले ली और उन तमाम धागों को उधेड़ दिया, जो सामान्य समय में हमें एक समाज बनाते थे। इस उपन्यास में अलग-अलग पात्रों के हवाले से इस पूरे दौर की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की गई है। यहाँ एक तरफ़ अगर मौत का भय है, तो दूसरी तरफ़ हमारी सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक उलझनें। कहीं पारिवारिक सम्बन्धों की दरकन दिखती है तो कहीं मनुष्यता के अनुकरणीय उदाहरण भी–यह उपन्यास इन सभी पहलुओं को बहुत बारीकी से अंकित करता है। एक प्रेम-कथा भी इस उपन्यास का हिस्सा है जो कोरोना के इसी भयानक दौर में धीर-धीरे परवान चढ़ती है, और कोरोना की चुनौती के साथ सामाजिक भेदभाव की बाधा को भी सफलतापूर्वक पार करती है।
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