Vinayak
(1)
Author:
Ramesh Chandra Shah, Sudhir KumarPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
EnglishCategory:
Contemporary-fiction₹
350
₹ 280 (20% off)
Available
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Vinayak, a Sahitya Akademi-award winning Hindi Novel, as a sequel to the author;s first novel 'Gobar Ganesh', according to the novelist, is the "pratismriti" (remembrance of our national-cultural memories) and the katha or narrative of India as a civilizational state. Its multi-perspectiveal, multi-centric kathana (plot), involving characters representing a cross section of Indian Society, is marked by engaging and interesting debates on such issues as gender-politics, culturalimperialism, casteism, communalism, the Kashmir-question and the condition of Kashmiri Pundits, sustainable development, ecological consciouness, swaraj or decolonization of mind, role of "Breaking India" forces comouflaged as NGO-activism, and the all0embracing nature of the spiritual that subsumes the secular, the significance of purusharthas or cardinal principles of life, etc. A sahridaya or cultivaed reader whould also relish how deftly the narrative echoes the voices of such great masters as Valmiki, Vyas, Krishna, Keats, Rike, Yeats, Eliot, Naipaul, Proust, Prasad and others.
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Vinayak, a Sahitya Akademi-award winning Hindi Novel, as a sequel to the author;s first novel 'Gobar Ganesh', according to the novelist, is the "pratismriti" (remembrance of our national-cultural memories) and the katha or narrative of India as a civilizational state. Its multi-perspectiveal, multi-centric kathana (plot), involving characters representing a cross section of Indian Society, is marked by engaging and interesting debates on such issues as gender-politics, culturalimperialism, casteism, communalism, the Kashmir-question and the condition of Kashmiri Pundits, sustainable development, ecological consciouness, swaraj or decolonization of mind, role of "Breaking India" forces comouflaged as NGO-activism, and the all0embracing nature of the spiritual that subsumes the secular, the significance of purusharthas or cardinal principles of life, etc. A sahridaya or cultivaed reader whould also relish how deftly the narrative echoes the voices of such great masters as Valmiki, Vyas, Krishna, Keats, Rike, Yeats, Eliot, Naipaul, Proust, Prasad and others.
Book Details
-
ISBN9789389778045
-
Pages296
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पुलिसवाले ने अपनी दकनी उर्दू में कहा, ‘‘आप लोकां बड़े ऊँचे हाकिमान हैं तो इस प्राइवेट कार में क्या करता मियाँ? पायलट लोग तो सरकारी गाड़ी में तकरीबन घंटा भर पहले गए। अब जरा तकलीफ करके नीचे उतर आओ। तुम्हारी पूरी दास्तान फुरसत से थाने में सुनेंगे।’’ मैंने बहुत समझाया, पर बात इस मुद्दे पर खत्म हुई कि मैं जो अपने को प्रेसिडेंट साहेब का पायलट बता रहा था, अपना आई.डी. कार्ड भी नहीं दिखा पा रहा था। फिर उसने भाई साहेब से पूछा, ‘‘और हजरत, आप तो जरूर प्राइम मिनिस्टर साहेब के खासुलखास ड्राइवर होंगे?’’ मैंने आवाज ऊँची करके कहा, ‘‘अपने सीनियर ऑफिसर से तुरंत वॉकी-टॉकी पर बात कराइए, वरना मेरी नौकरी तो जाएगी, पर आपकी भी बचेगी नहीं।’’ नतीजा उलटा निकला। त्योरियाँ चढ़ाकर वह बोला, ‘‘अरे, मेरे को धमकी देते? जाने दो प्रेसिडेंट साहेब को, फिर मैं देखता मियाँ कि तुम फाख्ता उड़ाते कि हवाई जहाज।’’ जीवन और मृत्यु के खेल से गुजर जाने के बाद इस उड़ान का अंत भी सदा की तरह सकुशल रूप से हो गया। राष्ट्रपति महोदय के जाने के बाद हमारे कप्तान ने पीठ ठोंकी। मैंने पूछा, ‘‘सर, क्या ईनाम दे रहे हैं आप मुझको?’’ अपनी घनी मूँछों के नीचे से मुसकराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘बस किसी को बताऊँगा नहीं कि महामहिम राष्ट्रपतिजी हैदराबाद एयरपोर्ट पर खड़े होकर आज महामहिम फ्लाइट लेफ्टिनेंट वर्मा की प्रतीक्षा करने के दंड से बच गए।’’ —इसी उपन्यास से
Pachchoon Ka Ghar
- Author Name:
Chandrabhushan
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लेखक राजनीतिक-सामाजिक रूप से सजग और उद्विग्न हो तो पाठक हर पल कुछ नया पाने की उम्मीद करता है। वह कवि हृदय और पत्रकार भी हो तो यह एक लीथल कॉम्बिनेशन होता है। चंद्रभूषण की राजनीतिक सक्रियता के आरंभिक एक दशक का गवाह होने के नाते मैं भरोसे से कह सकता हूँ कि उनके कहन में अनुभवों का ताप है। विविध विषयों पर लिखने और रमे रहने की उनकी मेधा मुझे ईष्र्या की सीमा तक आकर्षित करती रहती है। मेरे लेखे चंद्रभूषण, जिन्हें हम चंदूभाई कहते हैं, एक दुर्धर्ष पढ़ाकू और घुमंतू व्यक्ति हैं जिसकी अब स्वाभाविक निष्पत्ति लिक्खाड़ की है। चंद्रभूषण की यह कहानी अंतत: एक समय की कहानी है, जो अभी जारी है और जिसमें हम सबका साझा है। —सैयद मोहम्मद इरफान (ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट, एंकर सेलिब्रिटी टॉक शो 'गुफ्तगू') कार्यकर्ता जब कार्यकर्ता है तो उसे पक्षधर होना ही चाहिए। वहीं, पत्रकार से उम्मीद होती है कि वह निष्पक्ष हो जाए। जैसा देखे वैसा रिपोर्ट करे। विश्लेषण में भी तटस्थ रहे। फिर वह कोई छोटी जमात तो है नहीं जो कार्यकर्ता से पत्रकार बनी। गांधीवादी, आंबेडकरवादी, सावरकरवादी, वामपंथी, अति वामपंधी हर धारा के कार्यकर्ता पत्रकार बनते रहे हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता से पत्रकार बनने की एक यात्रा चंद्र्रभूषण के भी हिस्से आई है लेकिन पत्रकारिता से जुड़ी तीरंदाजी के किस्से इस किताब में नहीं हैं। यहाँ एक इंसान का जीवन है, जिसकी यात्रा समकालीन इतिहास को आड़े-तिरछे काटती है। एक ऐसा व्यक्ति जो संसार को खुली आँखों देखता है और उसके भद्देपन को अस्वीकार करता है। —दिलीप मंडल (पूर्व संपादक, इंडिया टुडे)
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