Etawah Files
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मैंने नेताजी से कहा कि इंटर स्टेट गैंग के कुख्यात इनामी डकैत भूरा यादव मारा गया है और 4 लोगों की जान बचाई गई है। यदि मैंने इस साहसिक मुठभेड़ के बाद पूरे थाने को निलंबित कर दिया तो पुलिस का मनोबल टूटेगा और ऐसी स्थिति में वे राम आसरे चौबे उर्फ फक्कड़ गैंग पर कैसे कार्रवाई करेंगे। मुख्यमंत्रीजी नाराज होकर मीटिंग से उठ गए। डी.जी.पी. घबराकर कहने लगे कि मैं सबको निलंबित करता हूँ। मैंने पुलिस महानिदेशक को साफ-साफ बता दिया कि मैं पुलिसजनों को निलंबित नहीं करूँगा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वर्ष 2013 में एक ही दिन आतंकवादियों के मुकदमों की 14 चार्जशीटों को न्यायालय से वापस लेने के आदेश दिए थे, परंतु इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें झटका दे दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति आर.एस.आर. मौर्या की पीठ ने निर्णय दिया कि आज आप आतंकवादियों को रिहा कर रहे हैं, कल आप उन्हें पद्मभूषण भी दे सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के विश्लेषण से पता चलता है कि गोली शिवपाल सिंह के गनर राजेश की कार्बाइन से चली थी, जिसमें एस.आई. आर.पी. सिंह मारे गए और हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह घायल हो गए। साक्ष्य को मिटाने के लिए शिवपाल सिंह के गनर द्वारा कार्बाइन और 192 कारतूस इटावा पुलिस लाइन की आर्मरी में जमा कर दिए गए।
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मैंने नेताजी से कहा कि इंटर स्टेट गैंग के कुख्यात इनामी डकैत भूरा यादव मारा गया है और 4 लोगों की जान बचाई गई है। यदि मैंने इस साहसिक मुठभेड़ के बाद पूरे थाने को निलंबित कर दिया तो पुलिस का मनोबल टूटेगा और ऐसी स्थिति में वे राम आसरे चौबे उर्फ फक्कड़ गैंग पर कैसे कार्रवाई करेंगे। मुख्यमंत्रीजी नाराज होकर मीटिंग से उठ गए। डी.जी.पी. घबराकर कहने लगे कि मैं सबको निलंबित करता हूँ। मैंने पुलिस महानिदेशक को साफ-साफ बता दिया कि मैं पुलिसजनों को निलंबित नहीं करूँगा।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वर्ष 2013 में एक ही दिन आतंकवादियों के मुकदमों की 14 चार्जशीटों को न्यायालय से वापस लेने के आदेश दिए थे, परंतु इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें झटका दे दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति आर.एस.आर. मौर्या की पीठ ने निर्णय दिया कि आज आप आतंकवादियों को रिहा कर रहे हैं, कल आप उन्हें पद्मभूषण भी दे सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के विश्लेषण से पता चलता है कि गोली शिवपाल सिंह के गनर राजेश की कार्बाइन से चली थी, जिसमें एस.आई. आर.पी. सिंह मारे गए और हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह घायल हो गए। साक्ष्य को मिटाने के लिए शिवपाल सिंह के गनर द्वारा कार्बाइन और 192 कारतूस इटावा पुलिस लाइन की आर्मरी में जमा कर दिए गए।
Book Details
-
ISBN9789355215079
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘काठ का उल्लू’ को ‘दोआबा’ पत्रिका में प्रकाशित करते हुए, सम्पादकीय के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की गई थी कि यह उपन्यास अपनी थीम के कारण पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा। प्रश्न उठता है कि इस उपन्यास की ‘थीम’ है क्या? निःसन्देह इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता है। ‘काठ के उल्लू’ की थीम के कई स्तर हैं जो प्याज के छिलके की भाँति परत दर परत खुलते चले जाते हैं। सपनों में पलती नौकरशाही, अभिजात्य वर्ग की ढँकी-छुपी सच्चाई, स्याह-सफेद के बीच खिलवाड़ करती राजनीति... और एक सामान्य-सी लड़की को ‘दलित इकाई’ के रूप में बदल देने की चतुराई। अर्थात इस उपन्यास में हमारे समाज के इतने रंग हैं कि उन सबको मिला कर यदि ‘रंगामेज़ी’ शैली में कोई चित्र बनाया जाए तो वह बदरंग ही होगा, आकर्षक भले हो। जाहिर है कि यह एक जटिल यथार्थ है, जिसे एक छोटे से उपन्यास में व्यक्त कर देना आसान काम नहीं था। मगर, पल्लवी प्रसाद ने उसे बखूबी कर दिखाया है। इस उपन्यास में कई अन्य यथार्थ भी दर्ज हैं। जैसे गाँवों का ‘आधुनिक’ हो जाना, हर व्यक्ति का लगभग ‘आम आदमी’ हो जाना और अन्ततः कृष्णकान्त जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति का ‘काठ का उल्लू’ बन जाना। उल्लू का पसन्दीदा समय ‘अँधेरा’ पूरे उपन्यास में आदि से अन्त तक छाया हुआ है। मगर लेखिका ने उसमें भी रोशनी की एक ‘झिरी’ देख ली है। वह है एक बूढ़ी स्त्री जो गाँव में रहती है और जो किसी की माँ है, किसी की दादी तो किसी की परदादी। वास्तव में इस ‘झिरी’ ने ही इस उपन्यास को वह सार्थकता बख्शी है, जो उसका मूल उदेश्य प्रतीत होती है। पल्लवी प्रसाद का यह उपन्यास ऐसे समय में आया है जबकि अभिजात्य वर्ग में ही नहीं बल्कि सामान्य जीवन में भी पारिवारिक सम्बन्धों की दीवारें दरक रही हैं। इसलिए इस उपन्यास का अपना अलग ही महत्त्व है। —अब्दुल बिस्मिल्लाह
Tumhari Auqat Kya Hai
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Piyush Mishra
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पीयूष मिश्रा जब मंच पर होते हैं तो वहाँ उनके अलावा सिर्फ़ उनका आवेग दिखता है। जिन लोगों ने उन्हें मंडी हाउस में एकल करते देखा है, वे ऊर्जा के उस वलय को आज भी उसी तरह गतिमान देख पाते होंगे। अपने गीत, अपने संगीत, अपनी देह और अपनी कला में आकंठ एकमेक एक सम्पूर्ण अभिनेता! अब वे फिल्में कर रहे हैं, गीत लिख रहे हैं, संगीत रच रहे हैं; और यह उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने उपन्यास की तर्ज पर लिखा है। और लिखा नहीं; जैसे शब्दों को चित्रों के रूप में आँका है। इसमें सब कुछ उतना ही ‘परफ़ेक्ट’ है जितने बतौर अभिनेता वे स्वयं। न अतिरिक्त कोई शब्द, न कोई ऐसा वाक्य जो उस दृश्य को और सजीव न करता हो। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ‘अनयूजुअल’—से परिवार में जन्मा एक बच्चा चरण-दर-चरण अपने भीतर छिपी असाधारणता का अन्वेषण करता है; और क़स्बाई मध्यवर्गीयता की कुंठित और करुण बाधाओं को पार करते हुए धीरे-धीरे अपने भीतर के कलाकार के सामने आ खड़ा होता है। अपने आत्म के सम्मुख जिससे उसे ताज़िन्दगी जूझना है; अपने उन डरों के समक्ष जिनसे डरना उतना ज़रूरी नहीं, जितना उन्हें समझना है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास का नायक हैमलेट, यानी संताप त्रिवेदी यानी पीयूष मिश्रा यह काम अपनी ख़ुद की कीमत पर करता है। यह आत्मकथा जितनी बाहर की कहानी बताती है—ग्वालियर, दिल्ली, एनएसडी, मुम्बई, साथी कलाकारों आदि की—उससे ज़्यादा भीतर की कहानी बताती है, जिसे ऐसी गोचर दृश्यावली में पिरोया गया जो कभी-कभी ही हो पाता है। इसमें हम दिल्ली के थिएटर जगत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के कई सुखद-दुखद पहलुओं को देखते हैं; एक अभिनेता के निर्माण की आन्तरिक यात्रा को भी। और एक संवेदनशील रचनात्मक मानस के भटकावों-विचलनों-आशंकाओं को भी। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि इस किताब की इसका गद्य है। पीयूष मिश्रा की कहन यहाँ अपने उरूज़ पर है। पठनीयता के लगातार संकरे होते हिन्दी परिसर में यह गद्य खिली धूप-सा महसूस होता है।
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