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सामाजिक सरोकारों को लेकर अत्यन्त सचेत कथाकार अमरकान्त के इस उपन्यास के केन्द्र में क़स्बाई परिवेश की साधारण घरेलू महिलाएँ हैं जो धीरे-धीरे पुरुषप्रधान पारिवारिक व्यवस्था में अपनी अस्मिता और स्थिति के प्रति सजग होती हैं। उनका यह सफ़र शुरू होता है उस वक़्त जब मुहल्ले में किराये पर रहने वाला एक आत्ममुग्ध व्यक्ति बरसों से गाँव में छोड़ी अपनी पत्नी को लेकर आता है। यह सीधी-सादी ग्रामीण स्त्री बस एक सवाल से वहाँ की सुखी-सन्तुष्ट स्त्रियों को झिंझोड़ देती है—‘ख़ूब कहती हो बहिनी, कहीं सुहागिन स्त्री का नाम पूछता है कोई? नाम लेकर बुलाता है भला?’ इस सवाल का जवाब किसी से नहीं बन पाता। वे सोचने लगती हैं कि वाक़ई, अपने ही विवाहित जीवन में, अपने ही परिवार में उनका नाम कैसे ग़ायब हो गया! यहीं से शुरू होता है उनका आत्म-चिन्तन जो पहले अकेले-दुकेले और फिर नियमित बैठकों तक जाता है और एक संस्था के रूप में फलीभूत होता है। अपनी पहचान को लेकर सजग होती स्त्रियों की विचारोत्तेज कथा है यह कृति।
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सामाजिक सरोकारों को लेकर अत्यन्त सचेत कथाकार अमरकान्त के इस उपन्यास के केन्द्र में क़स्बाई परिवेश की साधारण घरेलू महिलाएँ हैं जो धीरे-धीरे पुरुषप्रधान पारिवारिक व्यवस्था में अपनी अस्मिता और स्थिति के प्रति सजग होती हैं।
उनका यह सफ़र शुरू होता है उस वक़्त जब मुहल्ले में किराये पर रहने वाला एक आत्ममुग्ध व्यक्ति बरसों से गाँव में छोड़ी अपनी पत्नी को लेकर आता है। यह सीधी-सादी ग्रामीण स्त्री बस एक सवाल से वहाँ की सुखी-सन्तुष्ट स्त्रियों को झिंझोड़ देती है—‘ख़ूब कहती हो बहिनी, कहीं सुहागिन स्त्री का नाम पूछता है कोई? नाम लेकर बुलाता है भला?’
इस सवाल का जवाब किसी से नहीं बन पाता। वे सोचने लगती हैं कि वाक़ई, अपने ही विवाहित जीवन में, अपने ही परिवार में उनका नाम कैसे ग़ायब हो गया!
यहीं से शुरू होता है उनका आत्म-चिन्तन जो पहले अकेले-दुकेले और फिर नियमित बैठकों तक जाता है और एक संस्था के रूप में फलीभूत होता है। अपनी पहचान को लेकर सजग होती स्त्रियों की विचारोत्तेज कथा है यह कृति।
Book Details
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ISBN9789360864224
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Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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प्रसिद्ध उपन्यासकार अमरकान्त का यह उपन्यास पति द्वारा परिव्यक्त राजलक्ष्मी नाम की उस स्त्री की कहानी है जो न केवल नर-भेड़ियों से भरे समाज में अपनी अस्मत बचा के रखती है, बल्कि कुछ लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। विवाह होते ही उसका निजत्व तिरोहित हो जाता है और नया नाम मिलता है—सुन्नर पांडे की पतोह। सुन्नर पांडे की पतोह का पति झुल्लन पांडे एक दिन उसे छोड़कर कहीं चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। अन्तहीन प्रतीक्षा के धुँधलके में जीती राजलक्ष्मी के पास पति की निशानी सिन्दूर बचा रहता है। औरत की इच्छाओं, हौसलों और अधिकारों से वंचित होने पर भी उसे सिन्दूर ही औरत होने का गर्व और गरिमा देता है। वस्तुतः पहले सिन्दूर का मतलब था पति, बाद में पति का मतलब सिन्दूर हो गया। लेकिन एक रात जब उसने अपनी सास-ससुर की बातें सुनीं तो जैसे पाँवों-तले की ज़मीन ही खिसक गई। जब घर में ही स्त्री की अस्मत असुरक्षित हो तो कोई स्त्री क्या करे! वह अन्ततः गाँव-घर, देवी-देवता, चिरई-चुरंग, नदी-पोखर सबको अन्तिम प्रणाम कर अनजानी राह पर चल पड़ी...। निम्नमध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और एक परित्यक्त स्त्री की जिजीविषाओं का बेहद प्रभावशाली और अन्तरंग चित्रण से लबरेज़ यह उपन्यास अपने जीवन्त मानवीय संस्पर्श के कारण एक उदात्त भाव पाठकों के मन में भरता चलता है। लोकजीवन के मुहावरों और देशज शब्दों के प्रयोग से भाषा में माटी का सहज स्पर्श और ऐसी सोंधी गन्ध महसूस होती है जो पाठकों को निजी लोक के उदात्त क्षेत्रों में ले आती है। निश्चय ही यह कृति पाठकों के मन में देर तक और दूर तक रची-बसी रहेगी।
Sidhi-Sachchi Baaten
- Author Name:
Bhagwaticharan Verma
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हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल उपन्यास ‘भूले-बिसरे चित्र’ के विषय में आलोचकों ने कहा था–‘‘एक महान कृति–भारतीय समाज और परिवार के विकास की विविध दिशाओं और रूपों का एक विराट एवं प्रभावोत्पादक चित्र...’’ ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ और ‘भूले-बिसरे चित्र’ की परम्परा में‘सीधी-सच्ची बातें’ भगवतीचरण वर्मा की तीसरी महत्त्वपूर्ण कृति है जिसमें 1939 से 1948 तक के काल की एक सशक्त कहानी है, और जिसमें मानसिक संघर्ष और राजनीतिक संघर्ष का अभूतपूर्व सम्मिश्रण हुआ है। मध्यवर्गीय परिवार का एक युवक, कुशाग्र बुद्धि और तेजस्वी, अपनी नैतिकता, आस्था और विश्वास के साथ अनायास ही उस नवीन हलचल में आ पड़ता है, द्वितीय महायुद्ध, देश की स्वतंत्रता, देश का बँटवारा जिसके भाग थे। और अन्त में उसके सामने थी अन्दर की घुटन, आदर्शों के पीछे वैयक्तिक स्वार्थों और कमज़ोरियों का विकृत चित्र और निराशा। ‘सीधी-सच्ची बातें’ एक सशक्त कहानी है, और साथ ही सीधी-सच्ची बातें भी।
Paapoo
- Author Name:
Rita Indiana +1
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आठ साल की एक लड़की सांतो दोमिंगो में अपने पिता–पापू–का इन्तज़ार करती है। यह इन्तज़ार उसे एक लम्बी और दर्दनाक मौत जैसा लगता है लेकिन वह राह देखती है कि पापू अमेरिका से आएँगे और अपनी दौलत और शोहरत की शानदार उपलब्धियों—चमचमाती नई कारों, पोलो शर्टों, सोने की चेन और सुन्दर जूतों से उसे अभिभूत कर देंगे। जब पापू आते हैं तो वह उसे फ़िल्म ‘फ़्राइडे द थर्टींथ’ के जेसन जैसे मालूम पड़ते हैं—स्मार्ट, चतुर और निर्मम। वे एक डोमिनिकन माफ़िया बॉस हैं, एक ड्रग डीलर, एक ऐसा शख़्स जो अविश्वसनीय रूप से ख़तरनाक है, लेकिन इससे उसकी बेटी ख़ुद को बेहद ताक़तवर और जीवन्त महसूस करती है। लड़की के जीवन में पापू आते हैं, ग़ायब हो जाते हैं और फिर एक बार और प्रकट होते हैं पैसे, गाड़ियों और मार-तमाम तोहफ़ों से लदे हुए, प्रेमिकाओं से घिरे हुए। सांतो दोमिंगो और अपने पिता के साथ की गई अमेरिका की जगर-मगर यात्राओं के बीच विभाजित, एक लड़की की बचपन की यादों को समेटे यह उपन्यास एक बेटी के प्यार के अलावा अपराध और मर्दानगी के आकर्षण और बड़ों की दुनिया की हिंसा का कभी न भूलने वाला चित्र पेश करता है। एक बच्ची की कल्पना के साथ व्यंग्य और विज्ञान-कथा के साथ ख़ौफ़ का कुशल मिश्रण, कैरेबियाई संस्कृति की पृष्ठभूमि में बुनी गई इस कहानी को अत्यन्त प्रभावी बना देता है।
Qyamat
- Author Name:
Rahi Masoom Raza +2
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‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का बेहद दिलचस्प उपन्यास है। राही मासूम रज़ा के कथा साहित्य का विश्लेषण करते समय प्रायः उनकी एक-आध कृति को छोड़कर बाक़ी की चर्चा न के बराबर की जाती है। एक कारण तो यह कि वे उपन्यास हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं अर्थात् वे मूल रूप से उर्दू में लिखे गए हैं। दूसरा यह कि कई बार विभिन्न वजहों से कुछ रचनाओं को ‘पॉपुलर’ के खाते में डाल दिया जाता है। गोया पॉपुलर होने और स्तरीय होने में कोई अनिवार्य अन्तर्विरोध हो! और तो और, कई बार पठनीयता को भी श्रेष्ठता के विपक्ष में खड़ा कर दिया जाता है। कहना चाहिए कि ‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का पठनीय और लोकप्रिय होने के साथ स्तरीय उपन्यास है। भाषा में वही शक्ति है जो राही की पहचान है। उदाहरण के लिए\ “जो हिन्दुस्तान से पाकिस्तान चले गए हैं या पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आ गए हैं, घर की याद तो उन्हें भी आती होगी। और रात को घर के ख़्वाब आते होंगे। और वो ख़्वाब ही में उदास हो जाते होंगे। और शायद रो भी देते हों।...” डॉ. एम. फ़ीरोज़ ख़ान और डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ ने हिन्दी में ‘क़यामत’ का प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है।
Jo Ghar Phoonke Aapna…
- Author Name:
Arunendra Nath Verma
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पुलिसवाले ने अपनी दकनी उर्दू में कहा, ‘‘आप लोकां बड़े ऊँचे हाकिमान हैं तो इस प्राइवेट कार में क्या करता मियाँ? पायलट लोग तो सरकारी गाड़ी में तकरीबन घंटा भर पहले गए। अब जरा तकलीफ करके नीचे उतर आओ। तुम्हारी पूरी दास्तान फुरसत से थाने में सुनेंगे।’’ मैंने बहुत समझाया, पर बात इस मुद्दे पर खत्म हुई कि मैं जो अपने को प्रेसिडेंट साहेब का पायलट बता रहा था, अपना आई.डी. कार्ड भी नहीं दिखा पा रहा था। फिर उसने भाई साहेब से पूछा, ‘‘और हजरत, आप तो जरूर प्राइम मिनिस्टर साहेब के खासुलखास ड्राइवर होंगे?’’ मैंने आवाज ऊँची करके कहा, ‘‘अपने सीनियर ऑफिसर से तुरंत वॉकी-टॉकी पर बात कराइए, वरना मेरी नौकरी तो जाएगी, पर आपकी भी बचेगी नहीं।’’ नतीजा उलटा निकला। त्योरियाँ चढ़ाकर वह बोला, ‘‘अरे, मेरे को धमकी देते? जाने दो प्रेसिडेंट साहेब को, फिर मैं देखता मियाँ कि तुम फाख्ता उड़ाते कि हवाई जहाज।’’ जीवन और मृत्यु के खेल से गुजर जाने के बाद इस उड़ान का अंत भी सदा की तरह सकुशल रूप से हो गया। राष्ट्रपति महोदय के जाने के बाद हमारे कप्तान ने पीठ ठोंकी। मैंने पूछा, ‘‘सर, क्या ईनाम दे रहे हैं आप मुझको?’’ अपनी घनी मूँछों के नीचे से मुसकराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘बस किसी को बताऊँगा नहीं कि महामहिम राष्ट्रपतिजी हैदराबाद एयरपोर्ट पर खड़े होकर आज महामहिम फ्लाइट लेफ्टिनेंट वर्मा की प्रतीक्षा करने के दंड से बच गए।’’ —इसी उपन्यास से
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