Krantikari Shaheed Chandrashekhar Azad Ki Jeevan-Katha
About the book
‘असहयोग आन्दोलन’ गांधीजी का बिल्कुल अनूठा और नया प्रयोग था। असहयोग की लहर में पूरा देश बह गया था। एक 14 वर्षीय छात्र ने भी इसमें अपनी आहुति दी। चन्द्रशेखर नाम के इस किशोर ने अदालत में अपना नाम ‘आज़ाद’ बताया। तब से वह आज़ाद ही रहा। एक किशोर असहयोगी से भारतीय क्रान्तिकारी दल के अजेय सेनापति बनने तक की आज़ाद की महागाथा अत्यन्त रोमांचकारी है। वे बहुत ग़रीब और रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे मगर विद्रोही व्यक्तित्व के कारण उससे जल्दी ही मुक्ति पा ली। शुरुआती दौर में वे असहयोगी बने, लेकिन तेज़ी से छलाँग लगाकर क्रान्तिकारी पार्टी की सदस्यता ले ली और थोड़े ही समय बाद उसके ‘कमांडर-इन-चीफ’ नियुक्त हो गए। वे पुलिस की आँखों में लगातार धूल झोंककर बड़े करतब करते रहे। आज़ाद जीते-जी किंवदन्ती बन गए थे। जनता में वे बेहद लोकप्रिय थे। उन पर अनेक लोकगीत रचे और गाए गए। मगर आज़ाद की स्मृति-रक्षा के लिए सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया। उनका जन्मस्थान भावरा (मध्य प्रदेश) तथा पैतृक घर बदरका (उन्नाव) आज भी उनकी यादों को सँजोए ख़ामोश हैं। उनकी माताजी श्रीमती जगरानी देवी ने स्वतंत्र भारत में अपने अन्तिम दिन अत्यन्त दयनीय स्थितियों में गुज़ारे। हम उन्हें एक राष्ट्रीय शहीद की माँ का दर्जा और सम्मान नहीं दे पाए। आज आज़ाद का कोई क्रान्तिकारी साथी जीवित नहीं है। स्वतंत्र भारत में उनके सारे साथियों की एक-एक कर मौत होती रही और किसी ने नहीं जाना। वे सब गुमनाम चले गए जिनके न रहने पर किसी ने आँसू नहीं बहाए, न कोई मातमी धुन बजी। किसी को पता ही न लगा कि ज़मीं उन आस्माओं को कब कहाँ निगल गई...। यह पुस्तक आज़ाद की संस्मृतियों से रची गई है जो न केवल उनकी कहानी से हमें रू-ब-रू कराती है, बल्कि उनके दौर की राजनीतिक हलचलों और अनेक गुमनाम क्रान्तिकारियों की याद दिलाती है, जिन्होंने आज़ादी के संग्राम में अपनी आहुति दी।
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About the Book
‘असहयोग आन्दोलन’ गांधीजी का बिल्कुल अनूठा और नया प्रयोग था। असहयोग की लहर में पूरा देश बह गया था। एक 14 वर्षीय छात्र ने भी इसमें अपनी आहुति दी। चन्द्रशेखर नाम के इस किशोर ने अदालत में अपना नाम ‘आज़ाद’ बताया। तब से वह आज़ाद ही रहा।
एक किशोर असहयोगी से भारतीय क्रान्तिकारी दल के अजेय सेनापति बनने तक की आज़ाद की महागाथा अत्यन्त रोमांचकारी है। वे बहुत ग़रीब और रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे मगर विद्रोही व्यक्तित्व के कारण उससे जल्दी ही मुक्ति पा ली। शुरुआती दौर में वे असहयोगी बने, लेकिन तेज़ी से छलाँग लगाकर क्रान्तिकारी पार्टी की सदस्यता ले ली और थोड़े ही समय बाद उसके ‘कमांडर-इन-चीफ’ नियुक्त हो गए। वे पुलिस की आँखों में लगातार धूल झोंककर बड़े करतब करते रहे।
आज़ाद जीते-जी किंवदन्ती बन गए थे। जनता में वे बेहद लोकप्रिय थे। उन पर अनेक लोकगीत रचे और गाए गए। मगर आज़ाद की स्मृति-रक्षा के लिए सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया। उनका जन्मस्थान भावरा (मध्य प्रदेश) तथा पैतृक घर बदरका (उन्नाव) आज भी उनकी यादों को सँजोए ख़ामोश हैं। उनकी माताजी श्रीमती जगरानी देवी ने स्वतंत्र भारत में अपने अन्तिम दिन अत्यन्त दयनीय स्थितियों में गुज़ारे। हम उन्हें एक राष्ट्रीय शहीद की माँ का दर्जा और सम्मान नहीं दे पाए।
आज आज़ाद का कोई क्रान्तिकारी साथी जीवित नहीं है। स्वतंत्र भारत में उनके सारे साथियों की एक-एक कर मौत होती रही और किसी ने नहीं जाना। वे सब गुमनाम चले गए जिनके न रहने पर किसी ने आँसू नहीं बहाए, न कोई मातमी धुन बजी। किसी को पता ही न लगा कि ज़मीं उन आस्माओं को कब कहाँ निगल गई...।
यह पुस्तक आज़ाद की संस्मृतियों से रची गई है जो न केवल उनकी कहानी से हमें रू-ब-रू कराती है, बल्कि उनके दौर की राजनीतिक हलचलों और अनेक गुमनाम क्रान्तिकारियों की याद दिलाती है, जिन्होंने आज़ादी के संग्राम में अपनी आहुति दी।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 5th
- Publication year
- 2015
- Weight
- 300 grams
- ISBN-13
- 9788126725113
- Pages
- 331
- Reading time
- ~11 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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