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Purab Ki Betiyaan

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‘पूरब की बेटियाँ’ किताब जिस पूरब को हमारे सामने लाती है, वह कोई दिशा नहीं, एक भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र है। उसकी सामाजिक संरचना में बेटियों के क्या मायने हैं, क्या दर्जा है, शैलजा पाठक कथेतर विधा की अपनी पहली किताब में बहुत महीन ढंग से परत-दर-परत खोलती हैं। बचपन से बुढ़ापे तक का स्त्री-जीवन ही नहीं, तीन पीढ़ियों की स्त्री-दशा कम-से-कम शब्दों में जीवन्त कर देती हैं। शैलजा अपनी दृश्य-भाषा में बाइस्कोप दिखाती हैं जैसे; पूरब के क़स्बाई जीवन की सामूहिकता से लेकर मुम्बई के महानगरीय एकाकीपन तक के त्रास का। उस ‘स्त्री’ का जिसे ‘विमर्श’ की किसी परिभाषा में अँटा देना अभी सम्भव नहीं हो सका है। शैलजा स्मृतियाँ लिखती हैं डायरी की तरह, बात कहती हैं आमने-सामने हुई मुलाक़ात की तरह। उनकी लिखत की भाषा कहन-सुनन के लहजे में है। एक ही साथ भावप्रवण, यथार्थपरक, ईमानदार, कठोर और गुलाबजल भिंगोया रुई का फाहा। यह किताब हँसाते हुए रूलाती है और रूलाते हुए सवालों से बेधती है। सवाल कि तमाम रिश्तों के बीच एक स्त्री का अपना जीवन कहाँ है? बन्धुत्व और मैत्री—स्त्री के जीवन में क्या मायने रखते हैं? सुना जाना—कितना बड़ा जीवन-मूल्य है उसके लिए? ‘पूरब की बेटियाँ’ को पढ़ते हुए हमारे मानस की पीढ़ियों की नींद में खलल पड़ती है। अपने किरदार को परखने और स्त्री-मन को महसूसने के लिए पढ़ी जाने वाली एक संवेदनात्मक स्मृति-कथा!

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‘पूरब की बेटियाँ’ किताब जिस पूरब को हमारे सामने लाती है, वह कोई दिशा नहीं, एक भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र है। उसकी सामाजिक संरचना में बेटियों के क्या मायने हैं, क्या दर्जा है, शैलजा पाठक कथेतर विधा की अपनी पहली किताब में बहुत महीन ढंग से परत-दर-परत खोलती हैं।

बचपन से बुढ़ापे तक का स्त्री-जीवन ही नहीं, तीन पीढ़ियों की स्त्री-दशा कम-से-कम शब्दों में जीवन्त कर देती हैं।

शैलजा अपनी दृश्य-भाषा में बाइस्कोप दिखाती हैं जैसे; पूरब के क़स्बाई जीवन की सामूहिकता से लेकर मुम्बई के महानगरीय एकाकीपन तक के त्रास का। उस ‘स्त्री’ का जिसे ‘विमर्श’ की किसी परिभाषा में अँटा देना अभी सम्भव नहीं हो सका है।

शैलजा स्मृतियाँ लिखती हैं डायरी की तरह, बात कहती हैं आमने-सामने हुई मुलाक़ात की तरह। उनकी लिखत की भाषा कहन-सुनन के लहजे में है। एक ही साथ भावप्रवण, यथार्थपरक, ईमानदार, कठोर और गुलाबजल भिंगोया रुई का फाहा। यह किताब हँसाते हुए रूलाती है और रूलाते हुए सवालों से बेधती है। सवाल कि तमाम रिश्तों के बीच एक स्त्री का अपना जीवन कहाँ है? बन्धुत्व और मैत्री—स्त्री के जीवन में क्या मायने रखते हैं? सुना जाना—कितना बड़ा जीवन-मूल्य है उसके लिए?

‘पूरब की बेटियाँ’ को पढ़ते हुए हमारे मानस की पीढ़ियों की नींद में खलल पड़ती है। अपने किरदार को परखने और स्त्री-मन को महसूसने के लिए पढ़ी जाने वाली एक संवेदनात्मक स्मृति-कथा!

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
130 grams
ISBN-13
9789390971350
Pages
152
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
12 × 19 cm
Language
Hindi

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