Dalda Ki Aulad
(0)
Author:
Vishnu NagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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इधर कुछ वर्षों में लेखकों की अनेक आत्मकथाएँ आई हैं। कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। कुछ अभी सोशल मीडिया पर टहल रही हैं लेकिन यह विष्णु नागर की आत्मकथा नहीं है। आत्मकथा के तत्त्व यहाँ अवश्य हैं मगर इसका स्वरूप संस्मरणात्मक भी है और इसमें अपने आसपास के आज के जीवन का भरपूर पर्यवेक्षण भी है। इसमें जीवन के स्वरों के बहुत से आरोह-अवरोह, बहुत से राग-विराग, ध्वनियाँ मिलेंगी। ये आत्मपरक होते समाज के कल और आज की हालत के बारे में हैं। लेखक ने बचपन से अब तक समाज को जितने रूपों में, जिस तरह देखा है, वह इसके केन्द्र में है। संस्मरणों से लोग पुराने समय को पहचान पाएँगे और इस समय को भी संस्मरणों-बिंबों के माध्यम से। एक खास बात यह है कि लेखक अतीतजीवी नहीं है। अतीत को भी उसी निर्ममता से देखता है, जितना आज को।</p> <p>प्राय: छोटे कलेवर वाले इन संस्मरणों को लेखक की डायरी की तरह भी देखा जा सकता है यद्यपि यहाँ लेखक ने अपनी अनियमित डायरी का उपयोग केवल एक जगह किया है।</p> <p>विष्णु नागर ने कविताओं के अलावा गद्य भी काफी लिखा है। उनके व्यंग्यात्मक गद्य की अपनी एक पहचान है मगर इस किताब में उनके उस तरह के गद्य का जहाँ भी आस्वाद मिलता है वह एकदम अलग तरह से मिलता है। यह गद्य कुछ हद तक कविता के निकट है, तो कुछ कहानियों, निबन्धों-सा है। ‘डालडा की औलाद’ में उनके जीवन के विभिन्न अनुभवों-पर्यवेक्षणों ने जगह पाई है। इसमें उनका गृहनगर शाजापुर भी है, मुम्बई भी, दिल्ली भी, जर्मनी भी। बचपन भी और समय का यह दौर भी। पत्रकारिता के अनुभव भी, बेरोजगारी के अनुभव भी। आस-पड़ोस भी, दूर भी। आनन्द भी, वेदना भी। इसमें जो सरलता है वह लेखन के निरन्तर अभ्यास से आती है। इस पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद आपके लिए इसे बीच में छोड़ना कठिन होगा।
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इधर कुछ वर्षों में लेखकों की अनेक आत्मकथाएँ आई हैं। कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। कुछ अभी सोशल मीडिया पर टहल रही हैं लेकिन यह विष्णु नागर की आत्मकथा नहीं है। आत्मकथा के तत्त्व यहाँ अवश्य हैं मगर इसका स्वरूप संस्मरणात्मक भी है और इसमें अपने आसपास के आज के जीवन का भरपूर पर्यवेक्षण भी है। इसमें जीवन के स्वरों के बहुत से आरोह-अवरोह, बहुत से राग-विराग, ध्वनियाँ मिलेंगी। ये आत्मपरक होते समाज के कल और आज की हालत के बारे में हैं। लेखक ने बचपन से अब तक समाज को जितने रूपों में, जिस तरह देखा है, वह इसके केन्द्र में है। संस्मरणों से लोग पुराने समय को पहचान पाएँगे और इस समय को भी संस्मरणों-बिंबों के माध्यम से। एक खास बात यह है कि लेखक अतीतजीवी नहीं है। अतीत को भी उसी निर्ममता से देखता है, जितना आज को।</p>
<p>प्राय: छोटे कलेवर वाले इन संस्मरणों को लेखक की डायरी की तरह भी देखा जा सकता है यद्यपि यहाँ लेखक ने अपनी अनियमित डायरी का उपयोग केवल एक जगह किया है।</p>
<p>विष्णु नागर ने कविताओं के अलावा गद्य भी काफी लिखा है। उनके व्यंग्यात्मक गद्य की अपनी एक पहचान है मगर इस किताब में उनके उस तरह के गद्य का जहाँ भी आस्वाद मिलता है वह एकदम अलग तरह से मिलता है। यह गद्य कुछ हद तक कविता के निकट है, तो कुछ कहानियों, निबन्धों-सा है। ‘डालडा की औलाद’ में उनके जीवन के विभिन्न अनुभवों-पर्यवेक्षणों ने जगह पाई है। इसमें उनका गृहनगर शाजापुर भी है, मुम्बई भी, दिल्ली भी, जर्मनी भी। बचपन भी और समय का यह दौर भी। पत्रकारिता के अनुभव भी, बेरोजगारी के अनुभव भी। आस-पड़ोस भी, दूर भी। आनन्द भी, वेदना भी। इसमें जो सरलता है वह लेखन के निरन्तर अभ्यास से आती है। इस पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद आपके लिए इसे बीच में छोड़ना कठिन होगा।
Book Details
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ISBN9789394902176
-
Pages238
-
Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Dinkar Kumar
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- Description: "मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया महान् भारतीय इंजीनियर, विद्वान्, शिक्षाविद्, राजनेता और मैसूर के दीवान रहे। विश्वेश्वरैया को दीर्घायु का स्वस्थ जीवन मिला। 15 सितंबर, 1860 को जनमे विश्वेश्वरैया को सन् 1955 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिला। उन्होंने ब्रिटिश राज के मातहत भी अनेक उच्च राजपदों पर कार्य किया और सदैव जनहित को सर्वोच्च रखा। मैसूर के कृष्ण राज सागर बाँध का निर्माण उन्हीं की देखरेख में हुआ और हैदराबाद के बाढ़ सुरक्षा तंत्र के प्रमुख डिजाइनर वे ही रहे। इसके अलावा उन्होंने अनेक प्रमुख भवन, बाँध व सड़क निर्माण परियोजनाओं का कार्यान्वयन किया। उनके उत्कृष्ट आभियांत्रिक कार्यों के लिए उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ दि इंडियन एंपायर’, ‘भारत रत्न’ जैसे दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित देशी-विदेशी पुरस्कारों और मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। उनकी जन्मतिथि 15 सितंबर को सम्मानस्वरूप ‘अभियंता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। छात्रों, युवाओं तथा सभी आयुवर्गों के पाठकों के लिए पठनीय एक महान् विभूति की उत्कृष्ट जीवनी। "
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- Author Name:
Sunilkumar Lawate
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Description:
आप विश्वास करें या न करें, लेकिन है यह हक़ीक़त। एक बालक अनाथाश्रम में जन्मा, पला और बड़ा हुआ। उसके माँ-बाप, रिश्तेदार कोई नहीं था। उसका जाति-धर्म, वंश, गोत्र कुछ नहीं था। सिर्फ़ था एक नम्बर, जैसे कारावास में क़ैदी का होता है। वह ‘नेम नॉट नोन’ था।
प्रश्नों से घिरी उसकी ज़िन्दगी में प्रश्नों ने ही उसे पाला-पोसा। प्रश्नों ने ही उसे वयस्क बनाया, समझदार बनाया।
आज वह एक ‘वेलनोन’ सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, समीक्षक, वक्ता, अनुवादक, सम्पादक और प्राचार्य के रूप में सुविख्यात है। एक सामाजिक ‘आयडॉल’ बना है।
प्रस्तुत पुस्तक ‘नेम नॉट नोन’ सुनीलकुमार लवटे की आत्मकथा है। सब कुछ होने पर भी कुछ न करने वालों को यह आत्मकथा न सिर्फ़ सक्रिय करती है, अपितु सोचने को भी प्रेरित करती है कि आख़िर मनुष्य में वह कौन-सा रसायन होता है जो उसे सारी प्रतिकूलताओं को परास्त करने की ऊर्जा देता है, जीते-जी मृत्युंजय बनाता है।
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