Indradhanush Ke Pichhe Pichhe
(0)
Author:
R. AnuradhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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लगभग छह साल पहले एक रोज़ अचानक लेखिका को पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। कैंसर जैसी बीमारी ट्यूमर चौथे स्टेज में और उसका विस्तार बगल के लिंफ नोड्स में भी। मृत्यु से इससे निकट का साक्षात्कार शायद और कुछ नहीं हो सकता। इस बीमारी ने लेखिका की दुनिया बदल दी, लेकिन उन्होंने इस जीवन का अन्त मानने से इनकार कर दिया।</p> <p>लेखिका की राय में कैंसर को दुश्मन मानकर उससे किसी बाहरी संक्रमण की तरह नहीं लड़ा जा सकता। आख़िर यह एक ऐसी बीमारी है जो बाहर से नहीं आती। इसके कारण हमारे-आपके शरीर के अन्दर होते हैं।</p> <p>यह किताब मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी है और असम्भव मान ली गई स्थितियों में जीने का सलीक़ा सिखाती है। कैंसर का पता चलने से लेकर इलाज के दौरान हुए प्रसंगों और अनुभवों को इसमें समेटा गया है। इसके सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक हैं, लेकिन पहचान छिपाने के लिए कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।
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लगभग छह साल पहले एक रोज़ अचानक लेखिका को पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। कैंसर जैसी बीमारी ट्यूमर चौथे स्टेज में और उसका विस्तार बगल के लिंफ नोड्स में भी। मृत्यु से इससे निकट का साक्षात्कार शायद और कुछ नहीं हो सकता। इस बीमारी ने लेखिका की दुनिया बदल दी, लेकिन उन्होंने इस जीवन का अन्त मानने से इनकार कर दिया।</p>
<p>लेखिका की राय में कैंसर को दुश्मन मानकर उससे किसी बाहरी संक्रमण की तरह नहीं लड़ा जा सकता। आख़िर यह एक ऐसी बीमारी है जो बाहर से नहीं आती। इसके कारण हमारे-आपके शरीर के अन्दर होते हैं।</p>
<p>यह किताब मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी है और असम्भव मान ली गई स्थितियों में जीने का सलीक़ा सिखाती है। कैंसर का पता चलने से लेकर इलाज के दौरान हुए प्रसंगों और अनुभवों को इसमें समेटा गया है। इसके सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक हैं, लेकिन पहचान छिपाने के लिए कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।
Book Details
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ISBN9788171199242
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Pages159
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
साल 1987; दिन 22 मई; समय तक़रीबन आधी रात। ग़ाज़ियाबाद से सिर्फ़ पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर मकनपुर गाँव की नहर के किनारे आज़ाद भारत का सबसे भयावह हिरासती हत्याकांड हुआ था। पी.ए.सी. ने मेरठ के हाशिमपुरा मुहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को यहाँ नहर की पटरी पर लाकर मार दिया था। विभूति नारायण राय उस समय गाजियाबाद के पुलिस कप्तान थे।
यह पुस्तक लेखक द्वारा उसी समय लिए गए एक संकल्प का नतीजा है, जब वे धर्मनिरपेक्ष भारत की विकास-भूमि पर अपने लेखकीय और प्रशासनिक जीवन के सबसे जघन्य दृश्य के सम्मुख थे। साम्प्रदायिक दंगों की धार्मिक-प्रशासनिक संरचना पर गहरी निगाह रखनेवाले, और ‘शहर में कर्फ़्यू’ जैसे अत्यन्त संवेदनशील उपन्यास के लेखक विभूति जी ने इस घटना को भारतीय सत्ता-तंत्र और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्धों के लिहाज़ से एक निर्णायक और उद्घाटनकारी घटना माना और इस पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ लिखने का फ़ैसला लिया जिसका नतीजा यह पुस्तक है।
यह सिर्फ़ उस घटना का विवरण भर नहीं है, उसके कारणों और उसके बाद चले मुक़दमे और उसके फ़ैसले के नतीजों को जानने की कोशिश भी है। इसमें दु:ख है, चिन्ता है, आशंका है, और उस ख़तरे को पहचानने की इच्छा भी है जो इस तरह की घटनाओं के चलते हमारे समाज और देश की सामूहिकता के सामने आ सकता है—घृणा, अविश्वास और हिंसा का चहुँमुखी प्रसार।
उम्मीद करते हैं कि इस किताब को पढ़ने के बाद हम एक सभ्य नागरिक समाज के रूप में अपने आस-पास पसरते इस ख़तरे के प्रति सतर्क होंगे और इसे रोकने का संकल्प लेंगे, जिसके कारण हाशिमपुरा जैसे कांड वैधता पाते हैं।
MEGA Life Story of A Death
- Author Name:
Ankur Saxena
- Rating:
- Book Type:

- Description: 15 Minutes! What if you’re told you have just fifteen minutes before being sedated, finally getting relieved of the excruciating pain you’ve endured with every breath for so long? Will you celebrate the end of pain or regret the impending loss of life? How will you face death? How will you spend your last 15 minutes? Happiness, anger, grief, sadness, fear, disgust, guilt, envy, pride, compassion, anxiety, stress, hope, gratitude—which emotion will define your final moments on Earth? What will you ponder about the time you spent on the planet? Rather how will you spend the last 15 minutes of life you are spared with? Do the last 15 minutes really count? Or was life about each second that passed by? Meet MEGHA who had this uncanny ability to live life every moment, an ardent soul that brought smile to every face she met, a bubbly girl that lit up the mood and a persona that personifies life! And as this MEGA life story unfolds, realize that it’s not the years in your life that count. It’s the life in your years that does!
Zakir Saheb Ki Kahani Unki Beti Ki Zubani
- Author Name:
Syeda Khursheed Alam
- Book Type:

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Description:
ज़ाकिर साहब के जीवन के अनेक पहलुओं को उजागर करनेवाली पुस्तक : ‘ज़ाकिर साहब की कहानी : उनकी बेटी की ज़ुबानी।’
लेखिका ने ज़ाकिर साहब को बहुत निकट से देखा है और उनके अन्तरंग जीवन को बड़े आदर के साथ परखा है।
प्रस्तुत पुस्तक में ज़ाकिर साहब की जीवनी प्रारम्भ से लेकर अन्त तक दी गई है। उनकी ज़िन्दगी के अनेक उतार-चढ़ाव को मार्मिक स्पर्श दिया गया है। जहाँ इसमें ज़ाकिर साहब की चरित्रगत विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है, वहीं उनके कुछ महत्त्वपूर्ण संस्मरणों को भी रेखांकित किया गया है, जिनके माध्यम से ज़ाकिर साहब का व्यक्तित्व अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ प्रस्फुटित होता है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ूबी है रोचकता के साथ इसकी प्रस्तुति। कहने का ढंग इतना निराला कि पढ़ते ही बनती है। हर आयु का व्यक्ति इसको पढ़कर ज़रूर आनन्द ले सकता है। किशोरों के लिए तो यह विशेष रूप से उपयोगी है। यह पुस्तक निश्चित रूप से उन्हें बहुत कुछ सोचने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा के साथ-साथ देश का अच्छा और सच्चा नागरिक बनने की सूझबूझ, व्यापक उदार दृष्टि और राष्ट्रप्रेम प्रदान करेगी।
Subhedari
- Author Name:
Avinash Subhedar
- Book Type:

- Description: अविनाश सुभेदार यांचं ‘सुभेदारी' हे आत्मकथन म्हणजे लोकसेवेचं असिधारा व्रत स्वीकारून संपूर्ण सेवाकाल त्याच निष्ठेने व्यतीत करणाऱ्या एका ध्येयवेड्या ज्येष्ठ आयएएस अधिकाऱ्याचा, प्रसंगी अविश्वसनीय वाटू शकणारा जीवनप्रवास आहे. या मनमोकळ्या निवेदनाचा विशेष म्हणजे, त्याचा केंद्रबिंदू सर्वसामान्य माणूस हा आहे. साधारणपणे निवृत्त अधिकारी आपल्या आठवणी शब्दबद्ध करतात, तेव्हा प्रकाशझोत स्वत:वर ठेवतात. मात्र, सुभेदारांनी कटाक्षाने हा मोह टाळला आहे. ‘सुभेदारी'मधून लेखकाने लोकहितास केंद्रस्थानी ठेवल्याचे पानोपानी जाणवते. दुसरे वैशिष्ट्य म्हणजे, एखादा अपवाद सोडता कोठेही नकारात्मकता या लिखाणात जाणवत नाही. तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी यांचे खासगी सचिव म्हणून काम करताना या विलक्षण नेत्याचा सहवास त्यांना सलग चार वर्षांपेक्षा अधिक काळ लाभला. त्याबाबतच्या आठवणी अत्यंत वाचनीय आहेत. त्यात आजपर्यंत काळाच्या उदरात लपलेल्या अनेक प्रसंगांचा हृद्य परामर्श वाचकांच्या मनातील राजकारण्यांविषयीची प्रतिकूल प्रतिमा काही अंशी बदलू शकेल एवढा प्रभावी आहे. शासकीय सेवा पार पाडताना नोकरशाहीतील अनेक आव्हाने झेलावी लागतात, कौटुंबिक जीवनाचा प्राधान्यक्रमही कित्येक प्रसंगी दूर ठेवावा लागतो. ही बाजूही सुभेदार यांनी संयत शब्दांत मांडली आहे. व्यक्तिगत स्तरावर विविध मान्यवरांबरोबर सुभेदार यांचे अत्यंत जिव्हाळ्याचे ऋणानुबंध आहेत. तथापि, त्यांनी कधीही अशा नात्यागोत्याचा प्रभाव आपल्या कारकिर्दीवर पडू दिला नाही. ही उपलब्धी आजच्या काळात दुर्मिळ म्हणावी लागेल. ग्रामीण भागातून आलेला एक जिद्दी तरुण परिश्रम आणि सचोटी यांच्या जोरावर सार्वजनिक जीवनात उच्च पदावर कसा पोहोचू शकतो, समाजोपयोगी भरीव योगदान कसे देऊ शकतो, याचा वस्तुपाठ म्हणजे ‘सुभेदारी' हे प्रांजळ आत्मकथन म्हणता येईल. - दिलीप चावरे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया'चे निवृत्त पत्रकार Subhedari | Avinash Subhedar सुभेदारी - अविनाश सुभेदार
The Life and Times of Sri Aurobindo Ghosh
- Author Name:
Kaushal Kishore
- Book Type:

- Description: Aurobindo's ideology and principles embody divinity, ethics, spontaneity and knowledge. He was an accomplished teacher, a profound scholar, a writer and a spiritual Guru. For him, nationalism was a holy offering to the motherland when viewed from the divine perspective. Aurobindo also played a very prominent role as a revolutionary. His contribution to politics cannot be ignored. Although his writings are philosophical, they also provide valuable social and cultural analysis. He was the one who suggested that "Poorna Swaraj" should be the main aim behind the revolutionary movement against the British. Nationalists were inspired to seize power from foreign masters. Aurobindo was an eminent educationist also. He greatly valued the inherent qualities and talents in each child. He felt that the role of education should be to nurture and enhance these God-given qualities. This book throws light on Sri Aurobindo Ghosh's Life. This is a biographical sketch for readers.
Ghumati Nadi
- Author Name:
Varis Kirmani
- Book Type:

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Description:
प्रख्यात विद्वान प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी की आत्मकथा ‘घूमती नदी’ एक दस्तावेज़ी किताब है। किताब के पहले अध्याय को ‘ख़ुश्बू-ए-पैरहन’ का शीर्षक दिया गया है। यह नहीं मालूम कि प्रो. किरमानी ने ‘गोमती नदी’ का नाम ‘घूमती नदी’ कहाँ से लिया है। हमारे पुराने हिन्दुस्तानी साहित्य में इस नदी को गोमती नदी ही लिखा गया है। किरमानी साहब ने गोमती के किनारे हरे-भरे मैदानों, खेतों और पुराने क़स्बों की आलीशान मस्जिदों और मन्दिरों का ज़िक्र बड़े ख़ूबसूरत अन्दाज़ में किया है, और फिर उस इलाक़े के मशहूर क़स्बे देवा शरीफ़ में अपनी पैदाइश सन् 1925 में लिखी है। इसी के साथ अवध की रंगारंग तह्ज़ीब, मेले-ठेले, त्योहारों और उत्सवों का दिलचस्प उल्लेख किया गया है। अवध का रहन-सहन, साहित्य, संस्कृति, भाषा, आपसी मेलजोल, भाईचारा, आपसी एकता और अखंडता की जीती-जागती तस्वीरें इस किताब में विशिष्ट प्रकार से मौजूद हैं। अवधी ज़बान, हिन्दुस्तानी मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं की ऐसी झलकियाँ पेश की गई हैं कि पाठक उन अनुभूतियों में खो जाता है और गुज़री हुई ज़िन्दगी की प्रतिध्वनि साफ़ सुनाई देती है।
किरमानी जी के माता-पिता की मृत्यु के बाद मजबूरियों और अभावों का वर्णन भी बहुत मार्मिक है। किताब में जगह-जगह ऐतिहासिक घटनाएँ दुहराई गई हैं, जिससे उनके ऐतिहासिक ज्ञान का पता चलता है। जैसा कि उन्होंने देहली के सुल्तान इल्तुतमिश के बचपन का वर्णन एक फ़ारसी किताब से उद्धृत किया है। इसी तरह औरंगज़ेब के समय की भी एक घटना उल्लिखित की है, जिससे शहंशाह के बारे में ग़लतफ़हमी दूर होती है। इसी के साथ वारिस साहब ने अपने पूर्वजों के बारे में एक दिलचस्प घटना लिखी है जिसके स्रोत का उल्लेख किताब में नहीं है। किताब में वारिस साहब के बचपन, उनके माता-पिता और गुरुजनों की आदतों, तौर-तरीक़ों, लिबास और व्यावहारिक रंग-ढंग का उल्लेख सामाजिक इतिहास का हिस्सा है, जिसे दस्तावेज़ी हैसियत हासिल है।
किरमानी साहब की आत्मकथा जोश मलीहाबादी की ‘यादों की बारात’ से कहीं ज़ियादा साहित्यिक और दिलचस्प है, जिसे पूरी पढ़े बग़ैर रखने को जी नहीं चाहता।
—पुस्तक की भूमिका से
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