Maran Sagar Pare
(0)
Author:
ShivaniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।</p> <p>कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।</p> <p>इस पुस्तक में ‘वंकिम तोमार नाम’, ‘एक श्रद्धांजलि’, ‘केशव कहि न जाय’, ‘पेयेछी छूटी’, ‘दिशा प्रवर्त्तक’, ‘यात्री आमी ओरे’, ‘एक टी शिशिर बिन्दु!’, ‘लोक्खी टी’, ‘अब न आँखि तर’, ‘कहाँ गईलै हो…’, ‘मरण सागर पारे’, ‘डॉक्टर खजानचन्द्र’, ‘गंगा बाबू कौन’, ‘मेरा भाई’, ‘तुभ्यं श्री गुरुवे नम:’ शीर्षक संस्मरण और रेखाचित्रों को संकलित किया गया है। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।</p>
<p>कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।</p>
<p>इस पुस्तक में ‘वंकिम तोमार नाम’, ‘एक श्रद्धांजलि’, ‘केशव कहि न जाय’, ‘पेयेछी छूटी’, ‘दिशा प्रवर्त्तक’, ‘यात्री आमी ओरे’, ‘एक टी शिशिर बिन्दु!’, ‘लोक्खी टी’, ‘अब न आँखि तर’, ‘कहाँ गईलै हो…’, ‘मरण सागर पारे’, ‘डॉक्टर खजानचन्द्र’, ‘गंगा बाबू कौन’, ‘मेरा भाई’, ‘तुभ्यं श्री गुरुवे नम:’ शीर्षक संस्मरण और रेखाचित्रों को संकलित किया गया है। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
Book Details
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ISBN9788183611565
-
Pages102
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है। ‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है। —रामकुमार कृषक
Sobti Ek Sohbat
- Author Name:
Krishna Sobti
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Description:
हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य पर कृष्णा सोबती एक विशिष्ट रचनाकार के रूप में समादृत हैं। यह कृति उनके बहुचर्चित कथा-साहित्य, संस्मरणों, रेखाचित्रों, साक्षात्कारों और कविताओं से एक चयन है। उनके कुछ विचारोत्तेजक निबन्धों को भी इसमें रखा गया है। इसके साथ ही ‘ज़िन्दगीनामा-2’ से कुछ महत्त्वपूर्ण अंश भी इसमें शामिल हैं, जिसे वे अभी लिख रही हैं।
उल्लेखनीय है कि अपनी विभिन्न कथाकृतियों के माध्यम से कृष्णा सोबती ने संस्कृति, संवेदना और भाषा-शिल्प की दृष्टि से हिन्दी साहित्य को एक नई व्यापकता प्रदान की है। इस सन्दर्भ में उनकी इस मान्यता से सहमत हुआ जा सकता है कि हिन्दी अगर किसी प्रदेश-विशेष या धर्म-वर्ग की भाषा नहीं है तो उसे अपने संस्कार को व्यापक बनाना होगा। वस्तुत: उन्होंने बने-बनाए साँचे, चौखटे और चौहद्दियाँ हर स्तर पर अस्वीकार की हैं तथा रचना के साथ-साथ स्वयं भी एक नया जन्म लिया है। उनके लिए रचनाकार की ही तरह रचना भी एक जीवित सच्चाई है; उसकी भी एक स्वायत्तता है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो ‘रचना न बाहर की प्रेरणा से उपजती है, न केवल रचनाकार के मानसिक दबाव और तनाव से। रचना और रचनाकार—दोनों अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता में एक-दूसरे का अतिक्रमण करते हैं और एक हो जाते हैं। इसी के साथ लेखक पर रचना की शर्तें लागू हो जाती हैं और रचना पर लेखकीय संयम और अनुशासन।’
कहना न होगा कि यह एक ऐसी कृति है जो न सिर्फ़ एक लेखक की बहुआयामी रचनाशीलता को समझने का अवसर जुटाती है, बल्कि समकालीन रचनात्मकता से जुड़े अनेक सवालों को भी हमारी चिन्ताओं में शामिल करती है।
Aaine Ke Samne
- Author Name:
Atia Dawood
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Description:
अतिया दाउद पाकिस्तान की मशहूर लेखिका एवं एक्टिविस्ट हैं और यह किताब ‘आईने के सामने’ उनकी आपबीती है।
सच है कि ज़िन्दगी गुज़ारने से ज़्यादा तकलीफ़देह गुज़री हुई ज़िन्दगी को दोहराना होता है। स्वयं अतिया के शब्दों में—‘‘वो सब लिखते ही उसके बारे में सोचने में ख़ुद अपने जिस्म से निकलकर माज़ी के उस मंज़र में आकर ठहर जाती थी।...हर अज़ीयतनाक मंज़र इसी तरह से मुझ पर बीता फिर से...और मैं फूट-फूटकर रोई हूँ, तड़पी हूँ, जुदाई की आग में जली हूँ।’’
यह किताब गाँव की उस छोटी-सी बच्ची की कहानी है जो फ़क़ीरों और भिखारियों की मदद करने के लिए धूप में धूल के पीछे भागती है और जिसे उस मासूम उम्र में ही सुनना पड़ता है—‘‘मेरी मासूम यतीम बेटी, अपने बाप की शक्ल आख़िरी बार देख लो।’’ जो कम उम्र में ही अपनी माँ की ममता से भी महरूम हो जाती है लेकिन ज़िन्दगी चलती रहती है और कहानी जारी रहती है। यह किताब उस औरत की कहानी है जो पारम्परिक, दकियानूसी और ख़स्ताहाल समाज में जन्म लेती है और क़दम-क़दम पर ठोकरें खाती हुई गिरती-सँभलती अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िन्दगी जीने का फ़ैसला लेती है।
बचपन की मस्ती, खेल, भाई-बहन, ख़ानदान, शिक्षा-दीक्षा, नौकरी, मोहब्बत और निकाह, अदबी संगत, एक्टिविस्टिक गतिविधियाँ और डब्ल्यू.ए.एफ़. से वाबस्तगी आदि की कई संवेदनशील यादें इस किताब में क़लमबंद हैं। दरअसल यादों का एक बड़ा क़ब्रिस्तान है यहाँ और बहुत सन्नाटा है, गूँजता हुआ। यादों की क़ब्रें हद्देनज़र तक फैली हुई हैं और अतिया की झोली में ढेर सारे फूल हैं और यह वाजिब चिंता भी कि कट्टरपंथियों के वहशी दौर में एक बच्ची को आसानी से अपना जीवन जीने का हौसला रखनेवाली औरत बनने के लिए कितना दर्द सहना पड़ेगा एवं कितना दौड़ना पड़ेगा और यह दुआ भी कि ये लड़की, काश, कभी मंज़र से ओझल हो।
Kaafi Hain Ek Zindagi
- Author Name:
Anjani Kumar Singh
- Book Type:

-
Description:
‘हर व्यक्ति की एक कहानी होती है। उस कहानी में एक घर-गाँव होता है। मेरे गाँव का नाम है चमथा… बिहार के चार जिलों का संगम है मेरा गाँव।’
अंजनी कुमार सिंह के संस्मरण इन पंक्तियों के साथ शुरू होते हैं। इसके बाद के पन्नों में, हम एक उल्लेखनीय जीवन को प्रकट होते देखते हैं—एक ऐसा जीवन जो 'संगम' है परंपरा और आधुनिकता का, अनुभव के माध्यम से सीखने और बिहार की विविध दुनियाओं की खोज का, और सार्वजनिक सेवा और व्यक्तिगत जुनून का। शासन और विकास कार्य की चुनौतियों और संतुष्टि के बारे में असाधारण अंतर्दृष्टि के साथ, अंजनी कुमार सिंह ने भारत और विदेशों में यात्रा के और दुर्लभ पौधों के एक संग्रह के निर्माण के अपने अनुभव भी साझा किए हैं। और साझा किया है एक शानदार उपलब्धि का अनुभव—बिहार संग्रहालय की स्थापना, जो कि दक्षिण एशिया की शास्त्रीय और समकालीन कला का घर है, और जिसकी तुलना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संग्रहालयों से की जा सकती है।
काफ़ी है एक ज़िंदगी को आप लोक सेवक और कला प्रेमी के सबसे रोचक और असामान्य संस्मरणों में से एक पाएंगे।
Naye Daur Ki Ore
- Author Name:
Kishore Biyani
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- Description: नए दौर की ओर’ भारतीय ग्राहक तथा फ्यूचर ग्रुप, बिग बाजार एवं पैंटलून्स की किशोर बियानी के अपने शब्दों में लिखी कहानी है। एक मध्यवर्गीय परिवार में जनमे किशोर बियानी ने ‘स्टोन वॉश’ कपड़े को रिटेल व्यापारियों को बेचने से अपने व्यापारिक जीवन की शुरुआत की। कुछ ही वर्षों में पैंटलून्स, बिग बाजार, फूड बाजार, सेंट्रल और अन्य कई रिटेल मॉडल शुरू कर उन्होंने भारतीय रिटेल व्यापार को एक नया आयाम और नई दिशा दी। किशोर बियानी की कोशिश रही कि वे मुंबई के निवेशक से लेकर मेरठ के किसान तक की जेब में रखे हर नए पैसे को अपने रिटेल व्यापार की तरफ आकर्षित कर सकें। बियानी शॉपिंग मॉल बनाने एवं उपभोक्ता ब्रांड्स बनाने से बीमा बेचने तक, हर उस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ उपभोक्ता है और पैसा खर्च करता है। ‘नए दौर की ओर’ में सिर्फ उनके शब्द ही नहीं हैं, बल्कि इस उतार-चढ़ाव की यात्रा में उनके मित्र, सहयोगी, पार्टनर, परिवार के सदस्यों की राय एवं संस्मरण शामिल हैं। ‘रिटेल के राजा’ के रूप में प्रसिद्ध किशोर बियानी अनेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित हुए हैं। पैंटलून्स को अमेरिका के नेशनल रिटेल फेडरेशन ने ‘अंतरराष्ट्रीय रिटेलर-2007’ से सम्मानित किया है। ‘नए दौर की ओर’ दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास एवं अदम्य इच्छाशक्ति से सपने सच करने की कहानी है और ‘नियमों को बदलो—मूल्यों को बनाए रखो’ मंत्र का सजीव चित्रण है।
The Three Muscat Years
- Author Name:
Dr. K. M. Harikrishnan
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- Description: In this book of adventure, a greenhorn Army doctor chronicles his discovery of a foreign land, newfound love, and new peoples. Three Muscat years and a series of matchless experiences help him cope with personal loss, understanding of fellow human beings, and self-discovery along the way. How does a young man come face-to-face with deep-rooted traditions and overpowering emotions experienced never before? Read on to find out from this heartwarming, brutally honest account.
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