🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Ghumati Nadi

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

प्रख्यात विद्वान प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी की आत्मकथा ‘घूमती नदी’ एक दस्तावेज़ी किताब है। किताब के पहले अध्याय को ‘ख़ुश्बू-ए-पैरहन’ का शीर्षक दिया गया है। यह नहीं मालूम कि प्रो. किरमानी ने ‘गोमती नदी’ का नाम ‘घूमती नदी’ कहाँ से लिया है। हमारे पुराने हिन्दुस्तानी साहित्य में इस नदी को गोमती नदी ही लिखा गया है। किरमानी साहब ने गोमती के किनारे हरे-भरे मैदानों, खेतों और पुराने क़स्बों की आलीशान मस्जिदों और मन्दिरों का ज़िक्र बड़े ख़ूबसूरत अन्दाज़ में किया है, और फिर उस इलाक़े के मशहूर क़स्बे देवा शरीफ़ में अपनी पैदाइश सन् 1925 में लिखी है। इसी के साथ अवध की रंगारंग तह्ज़ीब, मेले-ठेले, त्योहारों और उत्सवों का दिलचस्प उल्लेख किया गया है। अवध का रहन-सहन, साहित्य, संस्कृति, भाषा, आपसी मेलजोल, भाईचारा, आपसी एकता और अखंडता की जीती-जागती तस्वीरें इस किताब में विशिष्ट प्रकार से मौजूद हैं। अवधी ज़बान, हिन्दुस्तानी मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं की ऐसी झलकियाँ पेश की गई हैं कि पाठक उन अनुभूतियों में खो जाता है और गुज़री हुई ज़िन्दगी की प्रतिध्वनि साफ़ सुनाई देती है। किरमानी जी के माता-पिता की मृत्यु के बाद मजबूरियों और अभावों का वर्णन भी बहुत मार्मिक है। किताब में जगह-जगह ऐतिहासिक घटनाएँ दुहराई गई हैं, जिससे उनके ऐतिहासिक ज्ञान का पता चलता है। जैसा कि उन्होंने देहली के सुल्तान इल्तुतमिश के बचपन का वर्णन एक फ़ारसी किताब से उद्धृत किया है। इसी तरह औरंगज़ेब के समय की भी एक घटना उल्लिखित की है, जिससे शहंशाह के बारे में ग़लतफ़हमी दूर होती है। इसी के साथ वारिस साहब ने अपने पूर्वजों के बारे में एक दिलचस्प घटना लिखी है जिसके स्रोत का उल्लेख किताब में नहीं है। किताब में वारिस साहब के बचपन, उनके माता-पिता और गुरुजनों की आदतों, तौर-तरीक़ों, लिबास और व्यावहारिक रंग-ढंग का उल्लेख सामाजिक इतिहास का हिस्सा है, जिसे दस्तावेज़ी हैसियत हासिल है। किरमानी साहब की आत्मकथा जोश मलीहाबादी की ‘यादों की बारात’ से कहीं ज़ियादा साहित्यिक और दिलचस्प है, जिसे पूरी पढ़े बग़ैर रखने को जी नहीं चाहता। —पुस्तक की भूमिका से

Read more

₹ 350

280 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Ghumati Nadi This book ₹280
Urdu Ka Arambhik Yug Shamsurrahman Farooqui ₹250
Match Point - A Shuttler's Story Sanjay Sharma ₹149
3 books selected ₹749 ₹679
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

प्रख्यात विद्वान प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी की आत्मकथा ‘घूमती नदी’ एक दस्तावेज़ी किताब है। किताब के पहले अध्याय को ‘ख़ुश्बू-ए-पैरहन’ का शीर्षक दिया गया है। यह नहीं मालूम कि प्रो. किरमानी ने ‘गोमती नदी’ का नाम ‘घूमती नदी’ कहाँ से लिया है। हमारे पुराने हिन्दुस्तानी साहित्य में इस नदी को गोमती नदी ही लिखा गया है। किरमानी साहब ने गोमती के किनारे हरे-भरे मैदानों, खेतों और पुराने क़स्बों की आलीशान मस्जिदों और मन्दिरों का ज़िक्र बड़े ख़ूबसूरत अन्दाज़ में किया है, और फिर उस इलाक़े के मशहूर क़स्बे देवा शरीफ़ में अपनी पैदाइश सन् 1925 में लिखी है। इसी के साथ अवध की रंगारंग तह्ज़ीब, मेले-ठेले, त्योहारों और उत्सवों का दिलचस्प उल्लेख किया गया है। अवध का रहन-सहन, साहित्य, संस्कृति, भाषा, आपसी मेलजोल, भाईचारा, आपसी एकता और अखंडता की जीती-जागती तस्वीरें इस किताब में विशिष्ट प्रकार से मौजूद हैं। अवधी ज़बान, हिन्दुस्तानी मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं की ऐसी झलकियाँ पेश की गई हैं कि पाठक उन अनुभूतियों में खो जाता है और गुज़री हुई ज़िन्दगी की प्रतिध्वनि साफ़ सुनाई देती है।

किरमानी जी के माता-पिता की मृत्यु के बाद मजबूरियों और अभावों का वर्णन भी बहुत मार्मिक है। किताब में जगह-जगह ऐतिहासिक घटनाएँ दुहराई गई हैं, जिससे उनके ऐतिहासिक ज्ञान का पता चलता है। जैसा कि उन्होंने देहली के सुल्तान इल्तुतमिश के बचपन का वर्णन एक फ़ारसी किताब से उद्धृत किया है। इसी तरह औरंगज़ेब के समय की भी एक घटना उल्लिखित की है, जिससे शहंशाह के बारे में ग़लतफ़हमी दूर होती है। इसी के साथ वारिस साहब ने अपने पूर्वजों के बारे में एक दिलचस्प घटना लिखी है जिसके स्रोत का उल्लेख किताब में नहीं है। किताब में वारिस साहब के बचपन, उनके माता-पिता और गुरुजनों की आदतों, तौर-तरीक़ों, लिबास और व्यावहारिक रंग-ढंग का उल्लेख सामाजिक इतिहास का हिस्सा है, जिसे दस्तावेज़ी हैसियत हासिल है।

किरमानी साहब की आत्मकथा जोश मलीहाबादी की ‘यादों की बारात’ से कहीं ज़ियादा साहित्यिक और दिलचस्प है, जिसे पूरी पढ़े बग़ैर रखने को जी नहीं चाहता।

—पुस्तक की भूमिका से

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2011
Weight
400 grams
ISBN-13
9788126719303
Pages
259
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp