Ghumati Nadi
Author:
Varis KirmaniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
प्रख्यात विद्वान प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी की आत्मकथा ‘घूमती नदी’ एक दस्तावेज़ी किताब है। किताब के पहले अध्याय को ‘ख़ुश्बू-ए-पैरहन’ का शीर्षक दिया गया है। यह नहीं मालूम कि प्रो. किरमानी ने ‘गोमती नदी’ का नाम ‘घूमती नदी’ कहाँ से लिया है। हमारे पुराने हिन्दुस्तानी साहित्य में इस नदी को गोमती नदी ही लिखा गया है। किरमानी साहब ने गोमती के किनारे हरे-भरे मैदानों, खेतों और पुराने क़स्बों की आलीशान मस्जिदों और मन्दिरों का ज़िक्र बड़े ख़ूबसूरत अन्दाज़ में किया है, और फिर उस इलाक़े के मशहूर क़स्बे देवा शरीफ़ में अपनी पैदाइश सन् 1925 में लिखी है। इसी के साथ अवध की रंगारंग तह्ज़ीब, मेले-ठेले, त्योहारों और उत्सवों का दिलचस्प उल्लेख किया गया है। अवध का रहन-सहन, साहित्य, संस्कृति, भाषा, आपसी मेलजोल, भाईचारा, आपसी एकता और अखंडता की जीती-जागती तस्वीरें इस किताब में विशिष्ट प्रकार से मौजूद हैं। अवधी ज़बान, हिन्दुस्तानी मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं की ऐसी झलकियाँ पेश की गई हैं कि पाठक उन अनुभूतियों में खो जाता है और गुज़री हुई ज़िन्दगी की प्रतिध्वनि साफ़ सुनाई देती है।</p>
<p>किरमानी जी के माता-पिता की मृत्यु के बाद मजबूरियों और अभावों का वर्णन भी बहुत मार्मिक है। किताब में जगह-जगह ऐतिहासिक घटनाएँ दुहराई गई हैं, जिससे उनके ऐतिहासिक ज्ञान का पता चलता है। जैसा कि उन्होंने देहली के सुल्तान इल्तुतमिश के बचपन का वर्णन एक फ़ारसी किताब से उद्धृत किया है। इसी तरह औरंगज़ेब के समय की भी एक घटना उल्लिखित की है, जिससे शहंशाह के बारे में ग़लतफ़हमी दूर होती है। इसी के साथ वारिस साहब ने अपने पूर्वजों के बारे में एक दिलचस्प घटना लिखी है जिसके स्रोत का उल्लेख किताब में नहीं है। किताब में वारिस साहब के बचपन, उनके माता-पिता और गुरुजनों की आदतों, तौर-तरीक़ों, लिबास और व्यावहारिक रंग-ढंग का उल्लेख सामाजिक इतिहास का हिस्सा है, जिसे दस्तावेज़ी हैसियत हासिल है।</p>
<p>किरमानी साहब की आत्मकथा जोश मलीहाबादी की ‘यादों की बारात’ से कहीं ज़ियादा साहित्यिक और दिलचस्प है, जिसे पूरी पढ़े बग़ैर रखने को जी नहीं चाहता।</p>
<p>—पुस्तक की भूमिका से
ISBN: 9788126719303
Pages: 259
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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समकालीन संस्कृति और हिन्दी साहित्य के पिछले दशकों के दृश्य में जो कुछ व्यक्ति बेहद सक्रिय और उतने ही विवादास्पद रहे हैं, उनमें अशोक वाजपेयी निश्चय ही एक हैं। जहाँ उनके जीवट, साहस, बेबाकी और अदम्यता की व्यापक सराहना होती रही है वहीं उन्हें समाज-विरोधी, नीचट कलावादी, अभिजात, आत्मकेन्द्रित आदि भी कहा जाता रहा है। अशोक वाजपेयी की कविता आज लिखी जा रही अधिकांश कविता का प्रतिपक्ष है, अपनी ज़िद पर अड़ी कविता। उनकी आलोचना का वितान बहुत व्यापक है : वे कविता, विश्व कविता, साहित्य-चिन्तन से लेकर शास्त्रीय और समकालीन कलाओं का साधिकार विश्लेषण और आकलन करने में समर्थ रहे हैं। युवा प्रतिभा का, फिर वह शास्त्रीय संगीत या नृत्य हो, ललित कलाएँ हों या रंगमंच या लोककलाएँ, अशोक वाजपेयी जैसा उन्नायक बिरला ही होगा लेकिन उन पर हिन्दी की युवतम प्रतिभा को दुर्लक्ष्य करने का आरोप लगता रहता है। अपने समय की सभी प्रमुख बहसों में उनकी हिस्सेदारी रही है और वे इस समय हिन्दी के सबसे प्रखर और विचारोत्तेजक वक्ता माने जाते हैं। उन पर कभी भी कटूक्ति करने से न चूकने का इल्ज़ाम लगता रहता है। हमेशा हँसमुख, मददगार अशोक वाजपेयी अपने गुट के अथक समर्थक माने जाते हैं। बेहद यारबाश होने के बावजूद अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि वे ऐकान्तिक अवसाद से घिरे रहते हैं। पिछली अधसदी में हिन्दी अंचल में सबसे अधिक संस्कृति सम्बन्धी संस्थाओं के निर्माता और उनमें से अनेक के सफल संचालक अशोक वाजपेयी को सांस्कृतिक ज़ार कहा जाता रहा है।
यह पुस्तक अशोक वाजपेयी के अन्तरंग का आत्मीय, सटीक और मुखर दस्तावेज़ है। इसके गद्य में उनकी कविता की गरमाहट और आलोचना की तीक्ष्णता का ऐसा संयोग है जो उन्हें हमारे समय का समर्थ और साक्षी गद्यकार भी सिद्ध करता है।
Asahmati Mein Utha Ek Hath : Raghuvir Sahay Ki Jeewani
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

- Description: रघुवीर सहाय का जीवन-भर का काम प्रभूत और बहुमुखी है, जैसा कि इस जीवनी से एक बार और स्पष्ट होगा। इतना बहुमुखी और इतना मौलिक है कि सब कुछ पर यहाँ लिखा भी नहीं जा सका लेकिन उनके सोच के दायरे में आनेवाली कुछ चीज़ों का संकेत और सार यहाँ है, जिन पर अभी तक दुर्भाग्य से हमारा ध्यान नहीं गया है। मेरे ख़याल से उन बातों को भी जीवनी का अंग बनाना चाहिए, जो किसी लेखक के यहाँ अलग से दिखाई देती हैं और साहसिक ढंग से दिखाई देती हैं। उनकी कविताओं-कहानियों का कोई मूल्यांकन यहाँ करने से यथासम्भव बचा गया है, क्योंकि मेरे मत में यह जीवनी का काम नहीं है और रघुवीर जी के मूल्यांकन की बहुत-सी अच्छी कोशिशें हुई भी हैं। यहाँ प्रयत्न यह है कि उन्होंने ख़ुद अपने काम के बारे में क्या कहा है, क्या बताया है, यह अधिकाधिक सामने लाया जाए। एक आपत्ति यह हो सकती है कि किताब रघुवीर जी के बारे में कुछ अधिक प्रशंसात्मक हो गई है। अगर यह सही है तो इसका 'दोष' कुछ हद तक रघुवीर जी के व्यक्तित्व में है, कुछ उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करनेवालों में और अन्त में सबसे अधिक मेरा है। —विष्णु नागर (प्रस्तावना से)
Rahul Vangmaya Jeevani Aur Sansmaran Part-2 (4 Vols)
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

- Description: राहुल जी ने जो जीवनियाँ लिखीं, उनमें से अधिकांश के चरित नायक उनके घनिष्ठ रहे हैं। इस नाते वे उन चरित नायकों के जीवन के क्रमिक विकास, उनके बचपन, शिक्षा, व्यक्तिगत विशेषताओं, सामाजिक-राजनीतिक सम्बन्धों आदि का तथ्यपरक विवेचन प्रस्तुत कर सके हैं। दूसरी ओर ऐसे जननायकों की जीवनियाँ हैं, जिनके विचारों और चारित्रिक विशेषताओं से प्रभावित होकर, उनके विषय में विशेष रूप से पढ़-पढ़कर उन्होंने लिखा। इस भाग में संकलित ‘स्तालिन’ साम्यवादी व्यवस्था को आर्थिक रूप से मज़बूत करने और उसे फासिस्टवाद के घातक संकट से पार कराने का महत्त्वपूर्ण कार्य करनेवाले व्यक्ति स्तालिन की जीवन-कथा है। स्तालिन का जीवन पुराने युग के विनाश और नए युग के विकास की कहानी है। सर्वहारा के दृढ़ वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा की वर्गीय पार्टी के गठन, पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा वर्ग, किसानों तथा अन्य मेहनतकश जनता की एकता, रूस में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के अन्त, खेती के सामूहिकीकरण आदि स्तालिन के जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्यों के साथ ही रूस की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का सजीव अंकन राहुल जी ने इस कृति में किया है। ‘माओ-चे-तुंग’ चीन के राष्ट्रनायक, जनवादी चीनी गणतंत्र के संस्थापक एवं जननेता की जीवनी है। माओ ने 'लांग मार्च’ करके, अनेक कष्ट सहन करके अन्त में चीन को निरंकुश शासक के अत्याचारों से मुक्त कराया। इस चरित-नायक के देश-प्रेम, क्रान्तिकारी जीवन-दर्शन, त्याग एवं बलिदान को राहुल जी ने घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। माओ-चे-तुंग के जन्म, उनके बचपन, तरुणाई में ही राजनीतिक सक्रियता, चीन की क्रान्तिकारी सेना में प्रवेश, मंचू राजवंश के विरुद्ध विद्रोह, कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना का अत्यन्त सटीक वर्णन इस पुस्तक में हुआ है।
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