Sangharsh Narmada Ka
(0)
Author:
Jitendra Kumar, Nandini Oza, Suhas Paranjape, Swatija ManoramaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
350
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‘संघर्ष नर्मदा का’ नर्मदा बचाओ आन्दोलन में नर्मदा घाटी के लोगों, ख़ासकर आदिवासी समुदाय के योगदान, संघर्ष और बलिदानों की कहानी को उनके ही नज़रिये से सामने लाती है। सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित आदिवासियों के जीवन, विस्थापन और पुनर्स्थापन की पीड़ाजनक प्रक्रिया के ब्योरे इस किताब में दर्ज हैं जो प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली और विनाशकारी विकास-प्रक्रिया के द्वन्द्व के हवाले से, मानव समाज की भावी चुनौतियों और समाधान की ओर संकेत करते हैं। वाचिक इतिहास की अहमियत को रेखांकित करती हुई यह किताब बतलाती है कि स्मृति को सुनना एक राजनीतिक कर्म भी हो सकता है और परिवर्तनकारी भी। कार्यकर्ताओं, पयार्वरण-अध्येताओं, नृतत्त्व में रुचि रखनेवालों तथा मानवाधिकारों की पैरवी करनेवाले लोगों के लिए यह किताब एक ज़रूरी पाठ है।
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‘संघर्ष नर्मदा का’ नर्मदा बचाओ आन्दोलन में नर्मदा घाटी के लोगों, ख़ासकर आदिवासी समुदाय के योगदान, संघर्ष और बलिदानों की कहानी को उनके ही नज़रिये से सामने लाती है। सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित आदिवासियों के जीवन, विस्थापन और पुनर्स्थापन की पीड़ाजनक प्रक्रिया के ब्योरे इस किताब में दर्ज हैं जो प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली और विनाशकारी विकास-प्रक्रिया के द्वन्द्व के हवाले से, मानव समाज की भावी चुनौतियों और समाधान की ओर संकेत करते हैं। वाचिक इतिहास की अहमियत को रेखांकित करती हुई यह किताब बतलाती है कि स्मृति को सुनना एक राजनीतिक कर्म भी हो सकता है और परिवर्तनकारी भी। कार्यकर्ताओं, पयार्वरण-अध्येताओं, नृतत्त्व में रुचि रखनेवालों तथा मानवाधिकारों की पैरवी करनेवाले लोगों के लिए यह किताब एक ज़रूरी पाठ है।
Book Details
-
ISBN9788119028382
-
Pages272
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Dharma Ki Sadhana
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Swami Vivekanand
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स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई। स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
Vishwas Aur Andhvishwas
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Narendra Dabholkar +3
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विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 3 : Siddhant
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Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : सिद्धांत' पुस्तक में गहन विचार-मंथन है। ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, धर्मनिपेक्षता जैसे विषयों पर समाज-सुधारकों और विवेकवादी चिन्तकों ने समय-समय पर जो विचार व्यक्त किए, उनके मतभेदों को आन्दोलन के अनुभवों के आधार पर और व्यक्तिगत चिन्तन द्वारा परिभाषित किया गया है। ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करते हुए लेखक का मुख्य उद्देश्य है कि—'व्यक्ति को विवेकशील बनाकर ही विवेकवादी समाज-निर्माण का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।'
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Vivek Ki Pratibaddhata
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Narendra Dabholkar +3
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्थात् कार्यकारण भाव। चमत्कार अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। यह सम्बन्ध प्रकाश और अँधेरे के समान है। एक का होना याने अनिवार्यतः दूसरे का ना होना। विज्ञान में चमत्कार नहीं होते। चमत्कार या तो रासायनिक, भौतिक प्रक्रिया होती है या हाथ की सफ़ाई होती है। बदमाशी भी हो सकती है और प्रसंग के अनुसार प्रकृति की अनसुलझी पहेली भी चमत्कार में शामिल होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन में स्वीकारने का अर्थ है, आज या कल समझ में आनेवाली वैज्ञानिक विचार-पद्धति पर समाज का विश्वास होना।
चमत्कारों को चुनौती देने की भूमिका को ठीक से समझना चाहिए। संविधान ने हर व्यक्ति को उपासना, अलौकिक जीवन, आध्यात्मिक कल्याण की आज़ादी दी है, इसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन चमत्कार पर विश्वास करना, उसकी जाँच-पड़ताल का विरोध और ऐसे चमत्कारों का प्रसार करते रहना, यह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। भारतीय समाज बहुत जल्द भयग्रस्त हो जाता है। दैववादी मानसिकता के कारण लोग संकट को भाग्य का परिणाम मानते हैं। कई लोगों को लगता है कि दैवी-शक्ति प्राप्त कोई बाबा या कोई धार्मिक तीर्थ उन्हें कठिनाई से उबार लेगा। इस मानसिकता में रहनेवाला समाज स्वाभिमानशून्य, भगौड़ा, डरपोक और बुद्धि को रेहन पर रखनेवाला होता है। स्वाभिमानी, प्रयत्नवादी और निर्भय समाज बनाने के लिए चमत्कार का विरोध आवश्यक है।
मानसिक ग़ुलामी की सबसे बड़ी भयानकता यह है कि उस अवस्था में व्यक्ति की बुद्धि से प्रश्न पूछना तो दूर की बात है, व्यक्ति की बुद्धि, निर्णय-शक्ति, सम्पूर्ण विचार-क्षमता ये सभी बातें चमत्कार के आगे शून्य हो जाती हैं। व्यक्ति दासता में चला जाता है और फिर परिवर्तन की लड़ाई अधिक कठिन हो जाती है।
इस किताब में दाभोलकर जी के 2003 से 08 के दौरान लिखे आलेख शामिल हैं जो उन्होंने अन्धविश्वास और अवैज्ञानिकता के विरोध में विभिन्न मोर्चों और आन्दोलनों में काम करते हुए लिखे। उनके आन्दोलन का एकमात्र उद्देश्य एक विवेकशील मन का निर्माण था ताकि भारतीय लोग अपनी भौतिक लाचारगी और लिप्साओं के कारण धन्धेबाजों का शिकार न हों। उनके लेखन को पढ़ते हुए हम इक्कीसवीं सदी के भारत की धार्मिक-आध्यात्मिक-आर्थिक-सामाजिक विडम्बनाओं से भी परिचित होते हैं।
Bhram Aur Nirsan
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
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नरेंद्र दाभोलकर का ज़िन्दगी के सारे चिन्तन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इंसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षड्यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माडम्बरी गढ़ों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिन्दुओं के धार्मिक अन्धविश्वासों के चलते एक सुधारक का ख़ून किया गया।
एक सामान्य बात बहुत अहम है, वह यह कि विवेकवादी बनने से हमारा लाभ होता है या हानि इसे सोचें। अगर हमें यह लगे कि हमारा लाभ होता है तो उस रास्ते पर चलें। दूसरी बात यह भी याद रखें कि धर्माडम्बरी, पाखंडी बाबा तथा झूठ का सहारा लेनेवाले व्यक्ति का अविवेक उसे स्वार्थी बनाकर निजी लाभ का मार्ग बता देता है, अर्थात् उसमें उसका लाभ होता है और उसकी नज़र से उस लाभ को पाना सही भी लगता है; लेकिन उसके पाखंड, झूठ के झाँसे से हमें हमारा विवेक बचा सकता है।
‘भ्रम और निरसन’ किताब इसी विवेकवाद को पुख्ता करती है। हमारी आँखों को खोल देती है और हमें लगने लगता है कि भाई आज तक हमने कितनी ग़लत धारणाओं के साथ ज़िन्दगी जी है। मन में पैदा होनेवाला यह अपराधबोध ही विवेकवादी रास्तों पर जाने की प्राथमिक पहल है।
सोलह से पच्चीस की अवस्था में मनुष्य का मन एक तो श्रद्धाशील बन जाता है या बुद्धिवादी बन जाता है। बहुत सारे लोग समझौतावादी बन जाते हैं। इसीलिए अन्धविश्वास का त्याग करने के ज़रूरी प्रयास कॉलेजों के युवक-युवतियों में ही होने चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण तांत्रिक, गुरु अथवा ईश्वर के पास जाने की आदत बन गई कि पुरुषार्थ ख़त्म हो जाता, यह उन्हें समझना चाहिए या समझाना पड़़ेगा। भारतीय जनमानस और देश को लग चुका अन्धविश्वास का यह खग्रास ग्रहण श्री नरेंद्र दाभोलकर जी के प्रयासों से थोड़ा-बहुत भी कम हो गया तो भी लाभप्रद हो सकता है। वैज्ञानिक खोजबीन अपनी चरमसीमा को छू रही है। ऐसे दौर में अन्धविश्वासों का चश्मा आँखों पर लगाकर लडख़ड़ाते क़दम उठाने में कौन सी अक्लमन्दी है? —नारायण गणेश गोरे
Political Observer
- Author Name:
Varun Sakhaji
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द पॉलिटिकल ऑब्जर्वर में 1998 से लेकर 2022 तक के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक बड़े घटनाक्रम पर समकाल में लिखे गए आलेखों का विराट संकलन है। इसमें छत्तीसगढ़ की सियासत से लेकर देश की बदलती, ढहरती राजनीतिक तस्वीर को सिनेमा की तरह फ्रेम दर फ्रेम पेश किया गया है। रोमांचक राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं का ऐसा कोलाज है जहां आप महसूस करेंग जैसे टाइम मशीन में बैठकर अतीत के वर्तमान में जा पहुंचे हैं। द पॉलिटिकिल ऑब्जर्वर भारत की सियासत की गवाह ही नहीं बल्कि यहां हो रहे हर घटना पर मुखरता से दखल भी है। लगभग 100 घटनाक्रम और उन पर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार बरुण सखाजी की पैनी कलम सियासत को अपना रवैया बदलने को मजबूर कर देती है। तोहमतों और अविश्वास के इस दौर में भी मीडिया में ऐसे पत्रकार और विचारशील राजनीैतिक विश्लेषक हैं, यह तसल्ली की बात है। इस पुस्तक की भूमिका देश के प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध ने लिखी है। लेखक व पत्रकार बरुण सखाजी छत्तीसगढ़ के स्थापित पत्रकार व राजनीतिक चिंतन, विश्लेषण और परामर्श के क्षेत्र में प्रमुखता से सक्रिय हैं।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 1 : Vichar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : विचार' पुस्तक में अंधविश्वास उन्मूलन से सम्बन्धित बुनियादी बातों का ज़िक्र है। इसमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण', 'विज्ञान की कसौटी पर फलित ज्योतिष', 'वास्तुशास्त्र नहीं वास्तुश्रद्धाशास्त्र', 'छद्म विज्ञान अर्थात् स्यूडो साइंस', 'मनोविकार', 'भूतप्रेत बाधा या भूतावेश', 'सम्मोहन', 'देवी सवारना' जैसे विषयों पर विचार और विवेचन किया गया है जिससे यथार्थ और भ्रम का सदियों पुराना अन्तर स्पष्ट होता है।
लेखक के आत्मप्रत्यय और चेतना की नींव पर खड़ी यह पुस्तक अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
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