Reetikaleen Bharatiya Samaj
Author:
Shashiprabha PrasadPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
वीरकाव्य–प्रणेताओं को चरित कवि कहा गया है। क्योंकि उनके काव्य का उद्देश्य अपने चरितनायक के जीवन के विभिन्न पक्षों का यशोगान ही है।</p>
<p>सामान्यत: ‘रीतियुग के कवि’ से तात्पर्य रीतिमुक्त एवं रीतिभुक्त कवियों से है, क्योंकि साहित्य की दृष्टि से उन्हें ही आलोच्यकाल का प्रतिनिधि कवि माना गया है।</p>
<p>कवि भावलोक का प्राणी होता है। युग–जीवन उसके सृजन में प्रतिबिम्बित अवश्य होता है, किन्तु उसके चित्र को सम्यक् एवं पूर्णरूप से देखने के लिए काव्येतर स्रोतों से विवेच्य काल की सामाजिक परिस्थितियों का ज्ञान अपेक्षित है। इस दृष्टिकोण से पहले अध्याय में काव्येतर स्रोतों से तत्कालीन समाज की प्रतिमा निर्मित करने का प्रयास किया गया है। दूसरे अध्याय से काव्य–स्रोतों के आधार पर तत्कालीन समाज का अध्ययन आरम्भ होता है जिसमें समाज की सामान्य रचना को लिया गया है। इसमें समाज के भौतिक एवं धार्मिक विभाग, हिन्दुओं की वर्णाश्रम व्यवस्थाएँ और पारिवारिक रचना अन्तर्भुक्त हैं। तीसरे अध्याय में तत्कालीन समाज के राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन को देखने का प्रयत्न किया गया है। चौथे अध्याय में रहन–सहन के अन्तर्गत मानव जीवन की मूल आवश्यकताएँ, असन–वसन–आवास, और मनुष्य के सहज सौन्दर्यबोध से परिचालित शृंगार–प्रसाधन और अलंकरण के उपविभाग हैं। पाँचवें अध्याय में लोकजीवन के उल्लास एवं आह्लाद को वाणी देनेवाले संस्कार–पर्वादि का विवेचन किया गया है। छठे अध्याय में रीतिकालीन काव्य में चित्रित समाज के नारी–सम्बन्धी दृष्टिकोण की विवेचना की गई है। सातवें अध्याय में आलोच्यकाल के उन विश्वासों एवं प्रत्ययों का अध्ययन किया गया है जो हिन्दू जाति को एक अलग व्यक्तित्व और विवेच्य युग को अलग सत्ता प्रदान करते हैं। इसे जीवन–दृष्टि के नाम से अभिहित किया गया है, जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित युग की विभिन्न प्रवृत्तियों, धर्म एवं धर्माभास, विश्वासों एवं अज्ञात आधारवाले विश्वासों, कर्मफलवाद, भाग्यवाद व पुनर्जन्म एवं सांस्कृतिक समन्वय आदि हैं।</p>
<p>सात अध्यायों में विभाजित शशिप्रभा प्रसाद की महत्त्वपूर्ण आलोच्य कृति है ‘रीतिकालीन भारतीय समाज’। अध्येताओं, शोध–छात्रों एवं पुस्तकालयों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
ISBN: 9788180311680
Pages: 250
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: द पॉलिटिकल ऑब्जर्वर में 1998 से लेकर 2022 तक के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक बड़े घटनाक्रम पर समकाल में लिखे गए आलेखों का विराट संकलन है। इसमें छत्तीसगढ़ की सियासत से लेकर देश की बदलती, ढहरती राजनीतिक तस्वीर को सिनेमा की तरह फ्रेम दर फ्रेम पेश किया गया है। रोमांचक राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं का ऐसा कोलाज है जहां आप महसूस करेंग जैसे टाइम मशीन में बैठकर अतीत के वर्तमान में जा पहुंचे हैं। द पॉलिटिकिल ऑब्जर्वर भारत की सियासत की गवाह ही नहीं बल्कि यहां हो रहे हर घटना पर मुखरता से दखल भी है। लगभग 100 घटनाक्रम और उन पर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार बरुण सखाजी की पैनी कलम सियासत को अपना रवैया बदलने को मजबूर कर देती है। तोहमतों और अविश्वास के इस दौर में भी मीडिया में ऐसे पत्रकार और विचारशील राजनीैतिक विश्लेषक हैं, यह तसल्ली की बात है। इस पुस्तक की भूमिका देश के प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध ने लिखी है। लेखक व पत्रकार बरुण सखाजी छत्तीसगढ़ के स्थापित पत्रकार व राजनीतिक चिंतन, विश्लेषण और परामर्श के क्षेत्र में प्रमुखता से सक्रिय हैं।
Bolna Hi Hai
- Author Name:
Ravish Kumar
- Rating:
- Book Type:

- Description: रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज़ है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है। हिन्दी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेज़ी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है।
Uttarakhand Ke Aaine Mein Hamara Samay
- Author Name:
Puran Chandra Joshi
- Book Type:

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Description:
पूरनचन्द्र जोशी की इस रचना का नाम ही उसका असली परिचय है। इस निबन्ध-संग्रह का मूल विषय है हमारा समय और उसके चरित्र की रचना करनेवाले वे मूल प्रश्न और प्रेरणाएँ जो ‘स्थान’, ‘राष्ट्र’ और ‘विश्व’ के नए रिश्तों की तलाश से जुड़े हैं। पिछले कुछ दशकों से ‘उत्तराखंड’ इस तलाश की जीवन्त प्रयोगशाला बनकर उभरा है।
इस निबन्ध-संग्रह को अनुप्राणित करनेवाले मूल प्रश्न और चिन्ताएँ स्थान-सम्बन्धित और स्थान-केन्द्रित हैं। जिन नई व्यवस्थाओं की रचना के लिए आज वैश्विक और राष्ट्रीय स्तरों पर प्रभुत्ववान वर्ग और सत्ताएँ सक्रिय हैं उनमें ‘स्थान’ का स्थानीय लोगों की अपनी इच्छाओं और प्राथमिकताओं, हितों और ज़रूरतों का, स्थानीय संसाधनों, प्रकृति और पर्यावरण, स्थानीय भाषाओं, संस्कृतियों और जीवन-शैलियों, स्थानीय भाषाओं का—क्या भविष्य है?
पिछली शताब्दी के अन्तिम दशकों से तेज़ी से बदलते सन्दर्भ ने स्थानीय जनों को अपने हितों और प्राथमिकताओं के लिए असाधारण रूप से सजग, सक्रिय और आग्रही बनाया है। स्थान की गम्भीर चिन्ता और चेतना से ही उपजे थे उत्तराखंड के चिपको आन्दोलन, बड़े बाँध प्रतिरोधी अभियान, ‘मैती’ आन्दोलन, जल-स्रोत संरक्षण आन्दोलन, स्वायत्त राज्य-व्यवस्था आन्दोलन आदि जिनके द्वारा उत्तराखंड के स्थानीय जनों ने स्थान के संरक्षण और संवर्द्धन और स्थानीय हितों की सुरक्षा के लक्ष्य को विश्व और राष्ट्रीय स्तर पर बुनियादी मानव अधिकारों की सूची में शामिल करवाने की पहल की है।
सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास-प्रक्रिया में ‘स्थान’ और ‘क्षेत्र’ के महत्त्व का अहसास इन निबन्धों की मूल प्रेरणा है।
यह संग्रह एक माने में परिवर्तन और विकास के नए दर्शन और कार्यक्रम की खोज से प्रेरित एक समाज विज्ञानी के रूप में पूरनचन्द्र जोशी की लम्बी वैचारिक और अन्वेषण यात्रा की चरम उपलब्धि है और साथ ही एक नई यात्रा का प्रारम्भ भी।
Goongi Rulaai Ka Chorus
- Author Name:
Ranendra
- Book Type:

- Description: भारतीय जन-जीवन का एक लम्बा दौर ऐसा भी रहा जिसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अति-साधारण लोग बिना किसी वैचारिक आग्रह या सचेत प्रयास के, जीवन की सहज धारा में रहते-बहते एक साझा सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हो रहे थे। एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी उसी विरासत का हिस्सा है जो इस उपन्यास के केंद्र में है। खिलजी शासनकाल में देवगिरी के महान गायक गोपाल नायक और अमीर खुसरो के मेल से जिस संगीत की धारा प्रवाहित हुई, अकबर, मुहम्मद शाह रंगीले और वाजिद अली शाह के दरबारों से बहती हुई वह संगीत के अलग-अलग घरानों तक पहुँची। मैहर के बड़ो बाबा अलाउद्दीन खान की तरह इस उपन्यास के बड़ो नानू उस्ताद मह्ताबुद्दीन खान के यहाँ भी संगीत ही इबादत है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के खुर्शीद जोगी और बंगाल के बाउल परम्परा के कमोल उनके घर से दामाद के रूप में जुड़े। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में विभाजन-प्रेम एक नशे के तौर पर उभर कर आता है। गुजरात में सदी के शुरू में जो हुआ वह अब यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा का सबसे तेज़ रंग है। इस जहरीले परिवेश में नानू अयूब खान, अब्बू खुर्शीद जोगी, बाबा मदन बाउल और अंत में कमोल कबीर एक-एक कर खत्म कर दिए जाते हैं। बच जाती है एक रुलाई जो खुलकर फूट भी नहीं पाती। हलक तक आकर रह जाती है। यह उपन्यास इसी रुलाई का कोरस है। विभाजन को अपना पवित्रतम ध्येय मानने वाली वर्चस्वशाली विचारधारा के खोखलेपन और उसकी रक्त-रंजित आक्रामकता को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के समावेशी चरित्र को हिन्दुस्तानी संगीत की लय-ताल के साथ पुनः स्थापित करने का प्रयास करता है।
Janane ki Batein (Vol. 10)
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay
- Book Type:

- Description: Janane ki Batein (Vol. 10) about Social Studies
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