Salute
(0)
Author:
ShankarPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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कथाकार शंकर के 'सैल्यूट' कहानी-संग्रह की रचनाएँ मध्यवर्ग की संवेदनहीनता और वैचारिक संकट के दस्तावेज की तरह हैं। जिस दौर में मानव सभ्यता बाजार सभ्यता में बदल गई हो, सामान्य मनुष्य किस तरह इसकी हिंस्रता और विसंगतियों का सामना करता है, साथ ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहता है, इसके अनोखे वृत्तांत शंकर की कहानियों में है। अपनी लंबी कथा-यात्रा में प्रगतीशील सरोकारों से सदा प्रतिबद्ध रहने वाले कथाकार ने इस संग्रह की कहानियों में छोटी-छोटी घटनाओं के भीतर से जीवन के यथार्थों को बड़ी रोचकता से उद्घाटित किया है। एक सहज और बांध लेने वाली भाषा, किसी फार्मूले में बंधे बिना, इन कहानियों को जितनी प्रहारात्मक बनाती है, उतनी ही पारदर्शी भी। कहानी विधा जिस दौर में एक खास किस्म के संकट से गुजर रही है और कई कथाकारों ने इस विधा को लगभग त्याग दिया है, वरिष्ठ कथाकार शंकर में एक निरंतरता बनी रही है। इनकी कहानियों में छोटे कैनवास पर भी जीवन के छूट गए कई बड़े पहलू उभरते हैं। इनमें संकट के पार देखने के गुण हैं, जो एक गहरे 'विजन' की वजह से हैं। कहानी सबसे पहले कहानी की तरह हो और यह अंतत: एक आवाज बने, इस संग्रह की कहानियों में यह दुर्लभ चीज मौजूद है। —शंभुनाथ वरिष्ठ आलोचक, संपादक 'वागर्थ'
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कथाकार शंकर के 'सैल्यूट' कहानी-संग्रह की रचनाएँ मध्यवर्ग की संवेदनहीनता और वैचारिक संकट के दस्तावेज की तरह हैं। जिस दौर में मानव सभ्यता बाजार सभ्यता में बदल गई हो, सामान्य मनुष्य किस तरह इसकी हिंस्रता और विसंगतियों का सामना करता है, साथ ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहता है, इसके अनोखे वृत्तांत शंकर की कहानियों में है। अपनी लंबी कथा-यात्रा में प्रगतीशील सरोकारों से सदा प्रतिबद्ध रहने वाले कथाकार ने इस संग्रह की कहानियों में छोटी-छोटी घटनाओं के भीतर से जीवन के यथार्थों को बड़ी रोचकता से उद्घाटित किया है। एक सहज और बांध लेने वाली भाषा, किसी फार्मूले में बंधे बिना, इन कहानियों को जितनी प्रहारात्मक बनाती है, उतनी ही पारदर्शी भी। कहानी विधा जिस दौर में एक खास किस्म के संकट से गुजर रही है और कई कथाकारों ने इस विधा को लगभग त्याग दिया है, वरिष्ठ कथाकार शंकर में एक निरंतरता बनी रही है। इनकी कहानियों में छोटे कैनवास पर भी जीवन के छूट गए कई बड़े पहलू उभरते हैं। इनमें संकट के पार देखने के गुण हैं, जो एक गहरे 'विजन' की वजह से हैं। कहानी सबसे पहले कहानी की तरह हो और यह अंतत: एक आवाज बने, इस संग्रह की कहानियों में यह दुर्लभ चीज मौजूद है। —शंभुनाथ वरिष्ठ आलोचक, संपादक 'वागर्थ'
Book Details
-
ISBN9789391925680
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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