Is Umra Mein
(0)
Author:
Shrilal ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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हिन्दी साहित्य के शिखर रचनाकार श्रीलाल शुक्ल की महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है ‘इस उम्र में’। यह एक अप्रतिम लेखक की अपने सामाजिक यथार्थ पर अचूक पकड़ और उसे बयान करने की उसकी अद् भुत कला का साक्ष्य है। उसकी कहानियाँ हिन्दी कहानी की रूढ़ियों, फ़ार्मूलों, खाद्यानों से दूर खड़ी हैं और रचना के संसार में नई निर्मितियाँ तैयार कर रही हैं। ‘इस उम्र में’ की कहानियाँ तीक्ष्ण अन्वीक्षण क्षमता से सम्पन्न होकर भारतीय समाज की गहन मीमांसा करती हैं। इनमें मौजूदा समय में प्रकट हो रहे नये बदलावों की संवेदनात्मक आहटें हैं। यहाँ तक कि कई समसामयिक घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और रुझान भी दर्ज हैं। न केवल इतना, श्रीलाल शुक्ल ने सामाजिक संरचना में तेज़ी से उभर रहीं नई शक्तियों के प्रतिरोध और परिवर्तन को भी पहचान कर उस प्रकट किया है।<br>‘इस उम्र में’ की कहानियाँ कई बार चली आ रही वास्तविकता को नई जीवन-दृष्टि से उलट-पुलट जाती हैं तो कई बार इनमें नई पीड़ाओं, दु:खों और क्रूरताओं को पुरानी धारणाओं के प्रहसनात्मक विखंडन के ज़रिए उजागर किया गया है। श्रीलाल शुक्ल यहाँ अभिव्यक्ति के नए-पुराने रूपों में बेमुरौवत तोड़-फोड़ करते हैं, फिर उनका ऐसा अजीब मिलाप कराते हैं कि समाज का चेहरा उजागर हो जाता है और हिन्दी कहानी का चेहरा बदल जाता है। <br>ये कहानियाँ अपनी कहन-शैली के लिए भी लम्बे समय तक याद की जाएँगी। वातावरण तथा चरित्रों की जैसी सघन पड़ताल और बात कहने के लिए जैसी तिर्यक भाषा ‘इस उम्र में’ की रचनाओं में सतत मौजूद है, वह हिन्दी कहानी में विरल है। ‘इस उम्र में’ की कहानियाँ सुविख्यात कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की अनेक कृतियों की तरह गहरी हलचल पैदा करने की सामर्थ्य रखती हैं। वे इस बात का सुराग़ भी देती हैं कि क्यों श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं के प्रति लोगों में हमेशा एक उत्सुकता, इज़्ज़त और अधीर प्रतीक्षा बनी रहती है।</p> <p>
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हिन्दी साहित्य के शिखर रचनाकार श्रीलाल शुक्ल की महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है ‘इस उम्र में’। यह एक अप्रतिम लेखक की अपने सामाजिक यथार्थ पर अचूक पकड़ और उसे बयान करने की उसकी अद् भुत कला का साक्ष्य है। उसकी कहानियाँ हिन्दी कहानी की रूढ़ियों, फ़ार्मूलों, खाद्यानों से दूर खड़ी हैं और रचना के संसार में नई निर्मितियाँ तैयार कर रही हैं। ‘इस उम्र में’ की कहानियाँ तीक्ष्ण अन्वीक्षण क्षमता से सम्पन्न होकर भारतीय समाज की गहन मीमांसा करती हैं। इनमें मौजूदा समय में प्रकट हो रहे नये बदलावों की संवेदनात्मक आहटें हैं। यहाँ तक कि कई समसामयिक घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और रुझान भी दर्ज हैं। न केवल इतना, श्रीलाल शुक्ल ने सामाजिक संरचना में तेज़ी से उभर रहीं नई शक्तियों के प्रतिरोध और परिवर्तन को भी पहचान कर उस प्रकट किया है।<br>‘इस उम्र में’ की कहानियाँ कई बार चली आ रही वास्तविकता को नई जीवन-दृष्टि से उलट-पुलट जाती हैं तो कई बार इनमें नई पीड़ाओं, दु:खों और क्रूरताओं को पुरानी धारणाओं के प्रहसनात्मक विखंडन के ज़रिए उजागर किया गया है। श्रीलाल शुक्ल यहाँ अभिव्यक्ति के नए-पुराने रूपों में बेमुरौवत तोड़-फोड़ करते हैं, फिर उनका ऐसा अजीब मिलाप कराते हैं कि समाज का चेहरा उजागर हो जाता है और हिन्दी कहानी का चेहरा बदल जाता है। <br>ये कहानियाँ अपनी कहन-शैली के लिए भी लम्बे समय तक याद की जाएँगी। वातावरण तथा चरित्रों की जैसी सघन पड़ताल और बात कहने के लिए जैसी तिर्यक भाषा ‘इस उम्र में’ की रचनाओं में सतत मौजूद है, वह हिन्दी कहानी में विरल है। ‘इस उम्र में’ की कहानियाँ सुविख्यात कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की अनेक कृतियों की तरह गहरी हलचल पैदा करने की सामर्थ्य रखती हैं। वे इस बात का सुराग़ भी देती हैं कि क्यों श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं के प्रति लोगों में हमेशा एक उत्सुकता, इज़्ज़त और अधीर प्रतीक्षा बनी रहती है।</p>
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Book Details
-
ISBN9788126708048
-
Pages143
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रेणु ने अपने आत्म-कथ्य में चित्रगुप्त महाराज द्वारा निर्मित भाग्य-लेख के अंशों में अपना परिचय देते हुए कहा है कि यह आदमी ‘एक ही साथ सुर और असुर, सुन्दर और असुन्दर, पापी और विवेकी, दुरात्मा और सन्त, आदमी और साँप, जड़ और चेतन—सब कुछ होगा।’ क्या यही परिचय अपने विविध और विस्तृत रूप में उनकी समस्त रचनाओं में नहीं लहरा रहा है? जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को गतिशील और व्यापक फ़लक प्रदान करनेवाली रेणु की कहानियों ने हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी है—सामाजिक परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है। यह दिशा ही रेणु की रचनाओं की मूल सोच है। बड़े चुपके से कभी उनकी कहानियाँ किसानों और खेत मज़दूरों के कान में कह देती हैं कि ज़मींदारी प्रथा अब नहीं रह सकती और ज़मीन जोतनेवाले की ही होनी चाहिए। कभी मज़दूरों को यह सन्देश देने लगती हैं कि तुम्हारी मुक्ति में ही असली सुराज का अर्थ छिपा है—भूल-भुलैया में पड़ने की जरूरत नहीं। क्या कला, क्या भाषा, क्या अन्तर्वस्तु और विचारधारा, कोई भी कसौटी क्यों न हो, रेणु की कहानियाँ एकदम खरी उतरती हैं, लोगों का रुझान बदल देती हैं और यही रचनात्मक गतिविधि रेणु के साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को अक्षुण्ण बनाती है। ‘अच्छे आदमी’ में संग्रहीत विधित रंगों की ये कहानियाँ रेणु की इसी विशिष्ट रचना-यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
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पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Anugoonj
- Author Name:
Geetanjali Shree
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‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान।
यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
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