Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
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Author:
Govind MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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समकालीन कथा-परिवेश और यथार्थवादी कथा-लेखन के सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए एक जगह गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “यथार्थवादी लेखन के इस युग में लेखक को सामाजिक विसंगतियों की यंत्रणा चित्रित करने के आगे उन बातों और चरित्रों में भी जाना होगा, जिनकी वजह से विसंगतियाँ है”, ताकि न तो मानवीय यंत्रणा के अधूरेपन का अहसास हो और न क्रान्तिकारिता के खोखलेपन का। दरअसल हिन्दी-कहानी के विभिन्न दौरों से निरपेक्ष रहते हुए जिन कथाकारों ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है, गोविन्द मिश्र उनकी पहली क़तार में आते हैं। यह संकलन उनके कई प्रकाशित कहानी-संग्रहों से उनकी महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानियों का चयन है। इन कहानियों के माध्यम से हम वर्तमान भारतीय समाज के विभिन्न चरित्रों और स्तरों से परिचित होते हैं। अपने कथा-चरित्रों के प्रति लेखक का कोई पूर्वग्रह नहीं, बल्कि वह उन्हें जीवन-स्थितियों के बीच पहचानता है। यही कारण है कि ये कहानियाँ हमें जीवन की विविधता तक ले जाती हैं और हमारे भीतर एक इन्द्रधनुषी संसार सजीव हो उठता है।
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समकालीन कथा-परिवेश और यथार्थवादी कथा-लेखन के सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए एक जगह गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “यथार्थवादी लेखन के इस युग में लेखक को सामाजिक विसंगतियों की यंत्रणा चित्रित करने के आगे उन बातों और चरित्रों में भी जाना होगा, जिनकी वजह से विसंगतियाँ है”, ताकि न तो मानवीय यंत्रणा के अधूरेपन का अहसास हो और न क्रान्तिकारिता के खोखलेपन का।
दरअसल हिन्दी-कहानी के विभिन्न दौरों से निरपेक्ष रहते हुए जिन कथाकारों ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है, गोविन्द मिश्र उनकी पहली क़तार में आते हैं। यह संकलन उनके कई प्रकाशित कहानी-संग्रहों से उनकी महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानियों का चयन है। इन कहानियों के माध्यम से हम वर्तमान भारतीय समाज के विभिन्न चरित्रों और स्तरों से परिचित होते हैं। अपने कथा-चरित्रों के प्रति लेखक का कोई पूर्वग्रह नहीं, बल्कि वह उन्हें जीवन-स्थितियों के बीच पहचानता है। यही कारण है कि ये कहानियाँ हमें जीवन की विविधता तक ले जाती हैं और हमारे भीतर एक इन्द्रधनुषी संसार सजीव हो उठता है।
Book Details
-
ISBN9788126706488
-
Pages117
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘ओ भैरवी!’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ओ भैरवी!’, ‘वर्दी’, ‘नकारा’, ‘सामन्ती कृपा’, ‘देवी की लीला’, ‘गौ माता’, ‘महाराजा का इलाज’, ‘मूर्ख क्रोध’, ‘सब की इज़्ज़त’, ‘न्याय और दंड’, ‘मन की पुकार’ और ‘देखा-सुना आदमी’।
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