When Ravens Speak and Horses Fly
Author:
Mona Lisa JenaPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
EnglishCategory:
Short-story-collections2 Ratings
Price: ₹ 186.75
₹
225
Available
When Ravens Speak and Horses Fly: Odia folktales in this book have been retold by Mona Lisa Jena, author, poet and translator. They have been chosen for their diverse cultural significance. Odisha is an ancient civilization. Oral literature flourished in the form of folk literature, by women, sowing the seeds of a literary tradition of individualism. Folk elements lived and continue to live in villages, which are yet to undergo urbanization. The more inaccessible and unaffected the land, the stronger its folk elements. Odia folktales revolved around seafarers, kings and princes, princesses and village idylls, and yet-to-be explored tribal tales. The tribals wove stories about the creation of the world, gods, and totems like how the sun and moon came into being, and how the tallest hill in the village was the tutelary deity with the most power. Rural tales included trees, animals and birds, with the addition of magic, witchcraft and ghosts. All these makes the folktales irresistible.
ISBN: 9789355481085
Pages: 211
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रवर्तक माने जाते हैं। खड़ी बोली हिन्दी को साहित्य के माध्यम के रूप में प्रसारित-प्रचारित करने तथा रचनात्मक स्तर पर इस्तेमाल करने के लिए, साथ ही, अपने समय की बहुसंख्य प्रतिभाओं को अपने विराट मित्रमंडली में शामिल और प्रोत्साहित करने के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। सुविदित है कि 1870 के दशक में उनकी प्रकाशन गतिविधियाँ बहुत तेज़ी से बढ़ी और वे उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों में केन्द्रीय महत्त्व वाली एक शख़्सियत के रूप में उभरे। उनकी दो साहित्यिक पत्रिकाएँ—‘कविवचनसुधा’ (1868-85) औ‘हरिश्चन्द्र मैगज़ीन’, जिसका नाम बाद में ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ (1873-85) कर दिया गया—उनके जीवनकाल में ही प्रसिद्धि हासिल कर चुकी थीं। इनके साथ-साथ 1874 से 1877 तक उन्होंने महिलाओं की पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ भी सम्पादित की थी, जिसका हिन्दी की पहली स्त्री-पत्रिका होने के नाते साहित्यिक इतिहास में विशिष्ट महत्त्व है। पर यह एक विडम्बना है कि भारतेन्दु की सभी जीवनियों में अनिवार्य और सम्मानजनक नामोल्लेख के बावजूद इस पत्रिका की सामग्र अन्तर्वस्तु या ढब-ढाँचे को लेकर वहाँ या अन्यत्र भी कोई विवेचन नहीं मिलाता और न ही इसकी प्रतियाँ कहीं सुलभ हैं। विभिन स्रोतों से इकट्ठा किए गए बालाबोधिनी के अंकों को पुस्तकाकार रूप में हिन्दी जगत् के सामने लाना इसीलिए महत्त्वपूर्ण है। यह सन्तोष की बात है कि अब भारतेन्दु पर या हिन्दी प्रदेश में स्त्री-प्रश्न पर काम करनेवालों के सामने इस प्रथम स्त्री-मासिक का नामोल्लेख भर करने की मजबूरी नहीं रहेगी।
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