Main Tumse Kuchh Kahna Chahati Hun
(0)
Author:
Anand, Alice MunroPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
550
440 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
“प्रतिभा का शानदार नमूना...लेखिका की कला का चमत्कार देखकर पाठकों के मुँह से बरबस वाह-वाह निकल पड़ती है। एलिस मनरो हमारी आँखों के सामने ही जीवन की किसी साधारण घटना को एक ऐसे रत्न में परिवर्तित कर देती हैं जो हमें चकाचौंध कर देता है।" —हैमिल्टन स्पेक्टेटर दैनिक “प्रेम, विस्मय, भय से सराबोर यह कहानियाँ मंत्रमुग्ध कर देती हैं...भरपूर प्रतिभा और विशाल पर्स्पेक्टिव की लेखिका।” —लॉस ऐंजल्स टाइम्स “विश्व के अग्रणी समकालीन कहानी लेखकों में गणना किए जाने के लिए एलिस मनरो का ज़ोरदार दावा।” —न्यूयॉर्क टाइम्स “नारीत्व के विभिन्न पहलुओं का अनूठा अन्वेषण...आज के लेखकों में इससे अधिक ईमानदार, संवेदनशील, भरपूर, हृदयस्पर्शी प्रेरणा का उदाहरण मिल पाना कठिन होगा।” —मिज पत्रिका “हमारे युग के महानतम कहानी लेखकों में से एक।” —ग्लोब एंड मेल
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
“प्रतिभा का शानदार नमूना...लेखिका की कला का चमत्कार देखकर पाठकों के मुँह से बरबस वाह-वाह निकल पड़ती है। एलिस मनरो हमारी आँखों के सामने ही जीवन की किसी साधारण घटना को एक ऐसे रत्न में परिवर्तित कर देती हैं जो हमें चकाचौंध कर देता है।"
—हैमिल्टन स्पेक्टेटर दैनिक
“प्रेम, विस्मय, भय से सराबोर यह कहानियाँ मंत्रमुग्ध कर देती हैं...भरपूर प्रतिभा और विशाल पर्स्पेक्टिव की लेखिका।”
—लॉस ऐंजल्स टाइम्स
“विश्व के अग्रणी समकालीन कहानी लेखकों में गणना किए जाने के लिए एलिस मनरो का ज़ोरदार दावा।”
—न्यूयॉर्क टाइम्स
“नारीत्व के विभिन्न पहलुओं का अनूठा अन्वेषण...आज के लेखकों में इससे अधिक ईमानदार, संवेदनशील, भरपूर, हृदयस्पर्शी प्रेरणा का उदाहरण मिल पाना कठिन होगा।”
—मिज पत्रिका
“हमारे युग के महानतम कहानी लेखकों में से एक।”
—ग्लोब एंड मेल
Book Details
-
ISBN9789386863553
-
Pages215
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Belagam
- Author Name:
Alice Munro +1
- Book Type:

- Description:
एलिस मनरो को कहानी के पारम्परिक शिल्प में निर्णायक दख़ल देने वाली रचनाकार माना जाता है। अपने सरल दिखने वाले कथानकों में उन्होंने जीवन के जटिलतम प्रश्नों को पकड़ा है और उन्हें अपने ऐसे पात्रों के माध्यम से रेखांकित किया है जिन्हें अखिल मानवता के प्रतिनिधि पात्र कहा जा सकता है। उनकी ज़्यादातर कहानियों का परिवेश उनका अपना क़स्बा रहा है जहाँ वे रहती हैं और इसे उनकी रचनात्मकता का एक विशेष पहलू माना जाता है। यही अहमियत उनकी कहानियों में निहित औपन्यासिक तत्त्वों की भी है जिसके लिए अनेक आलोचकों ने गम्भीरतापूर्वक उनका उल्लेख किया है। उनकी कहानियों में विडम्बनामूलक व्यंग्य और गम्भीर अवलोकन साथ-साथ चलते हैं। यथार्थ के टटके बिम्ब, स्पष्ट विवरण और इन सबके बीच अपने अस्तित्व का अर्थ खोजते उनके पात्र एक गहरा प्रभाव पाठक के मन पर छोड़ते हैं। कहा जाता है कि एलिस मनरो एक ऐसी कथाकार हैं जिन्होंने जीवन की ऊब का अंकन इतने दिलचस्प ढंग से किया है कि उसे पढ़ते हुए किसी को ऊब नहीं होती। ‘बेलगाम’ में उनके मूल कहानी-संग्रह ‘रनअवे’ की कुछ कहानियों का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है। 2004 में प्रकाशित इस पुस्तक को कनाडा के शीर्षस्थ साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
Palayan
- Author Name:
Alice Munro +1
- Book Type:

- Description:
मानव-मन की बहुस्तरीय जटिलताओं को सरल, पठनीय कथानकों के माध्यम से पाठक तक पहुँचाना एलिस मनरो की कहानियों की विशेषता रही है। छोटे क़स्बाई परिदृश्य में बुनी गई उनकी ज़्यादातर कहानियाँ ऐसी होती हैं जो अपने छोटे कलेवर में गहरी और व्यापक औपन्यासिक सम्भावनाओं का निर्वाह सफलतापूर्वक करती हैं। रिश्तों की पेचीदगी, नैतिक अन्तर्संघर्ष और स्मृति तथा यथार्थ के तनाव उनकी कहानियों में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ‘पलायन’ में उनके मूल कहानी-संग्रह ‘रनअवे’ की कुछ कहानियों का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है। 2004 में प्रकाशित इस पुस्तक को कनाडा के शीर्षस्थ साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आठ कहानियों के इस संग्रह में दाम्पत्य के अन्तर्विरोधों, प्रेम की आकांक्षा, पारिवारिक सम्बन्धों की टूटन और अकेलेपन की विभिन्न छवियों को अंकित किया गया है। अपनी बौद्धिक क्षमता, आत्मसम्मान और स्वातंत्र्य को लेकर सचेत स्त्रियों का अपने ही क़रीबी लोगों के बीच अकेले पड़ जाना एक आधुनिक घटना है, और इस पुस्तक से गुज़रने के बाद लगता है कि दुनिया के इस सिरे से उस सिरे तक वह एक ही तरह की पीड़ा के साथ घटित होती है। हिन्दी पाठकों को ये कहानियाँ निश्चय ही अपने बहुत नज़दीक महसूस होंगी!
Yashpal Ka Viplav : Vols. 2
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

Yashpal Ka Viplav
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

- Description:
“स्वाधीनता आन्दोलन के अन्तिम दशक में ‘विप्लव’ का प्रकाशन हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में एक विस्फोट सरीखा था। यशपाल ने अपने क्रान्तिकारी दौर की वैचारिक सम्पदा को इस पत्रिका के मंच से व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ प्रदान किए। ‘विप्लव’ की विशिष्टता एक आन्दोलन सरीखी थी! ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नेस्तनाबूद किए जाने के सारे प्रयत्नों के साथ सहभागिता दर्ज करते हुए भी यशपाल ने ‘विप्लव’ को स्वाधीनता आन्दोलन के वर्चस्वशाली नेतृत्व के प्रतिपक्षी की भूमिका में ढाल रखा था। ‘विप्लव’ के सम्पादकीयों का स्वरूप प्रायः राजनीतिक व सामाजिक हुआ करता था। ‘विप्लव’ को समय-समय पर ब्रिटिश शासन के कोप का शिकार होना पड़ा। दरअसल ‘विप्लव’ के सम्पादकीय अग्रलेखों के माध्यम से स्वाधीनता-संग्राम की उस दौर की उन हलचलों और बहसों का भी पता चलता है जो प्रायः मुख्यधारा की इतिहास में अनुपस्थित हैं। कहना न होगा कि यशपाल एक व्यक्ति नहीं, आन्दोलन थे और ‘विप्लव’ इस आन्दोलन का उद्घोष।”
Yatharthwad Aur Uski Samasyayen
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

- Description:
बहसों और विवादों से यशपाल का गहरा नाता था। उनके सोचने का अपना ढंग था जो मार्क्सवादी विश्वदृष्टि से अनुशासित एवं नियंत्रित था। वे सवालों से बचकर निकलने में नहीं, उनसे टकराने में विश्वास करनेवाले लेखक थे। सामाजिक एवं राजनीतिक महत्त्व के जनता के जीवन से जुड़े मुद्दे और सवाल हमेशा उनकी चिन्ता के केन्द्र में रहे। साहित्य में कलावाद और व्यक्तिवाद का विरोध करके वे परिवर्तनकामी चेतना के वाहक थे। अपने लम्बे रचनाकाल में साहित्यिक एवं कलात्मक समस्याओं, लेखक के परिवेश और दायित्व आदि सवालों पर उन्होंने गम्भीरता से विचार किया है। प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित सामग्री कुछ तो सैद्धान्तिक सवालों और मुद्दों से सम्बन्धित है और कुछ विविध साहित्यिक प्रसंगों, विवादों या फिर अपने स्पष्टीकरण के रूप में लिखित लेखों एवं टिप्पणियों से बनी है। भाषा के प्रश्न पर उनकी अनेक टिप्पणियाँ और लेख हैं जिनमें हिन्दी-उर्दू विवाद के साथ पंजाबी भी शामिल है। आज उस सारी सामग्री के एक जगह होने पर इन सवालों पर यशपाल को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इधर मार्क्सवाद के संकट की चर्चा प्राय: होती रही है। सोवियत संघ के पतन के बाद उसकी देशज प्रकृति पर भी विचार किया जाता है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारवाद ने सब कहीं मार्क्सवाद के लिए संकट पैदा किया। चीन की पूँजीवादी छलाँग से इस संकट को समझा जा सकता है। यहाँ साठ के दशक में लिखित और तब पर्याप्त विवादास्पद रहा लेख ‘मार्क्सवाद में पुनर्विचार’ भी सम्मिलित है। निश्चय ही यह संकलन चिन्तक यशपाल को समझने में उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है।
Ve Azad The
- Author Name:
Anand
- Book Type:

- Description:
‘वे आज़ाद थे’ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल रहे ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के सदस्यों द्वारा लिखित आलेखों और संस्मरणों का संकलन है। इन सभी आलेखों का प्रथम प्रकाशन यशपाल द्वारा सम्पादित तथा प्रकाशवती द्वारा प्रकाशित मासिक ‘विप्लव’ में हुआ था। स्वतंत्रता आन्दोलन और ख़ासतौर पर भगतसिंह की क्रान्तिकारी धारा के आन्दोलनकर्ताओं और उनके कार्यों के अनेक जाने-अनजाने तथ्यों को सामने लाने के अलावा यह प्रस्तुति हिन्दी के विशिष्ट कथाकार और स्वतंत्रता आन्दोलन में एक क्रान्तिकारी के रूप में सक्रिय यशपाल के विषय में फैलाई गईं भ्रान्तियों और दुष्प्रचार का भी निराकरण करती है, जो उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन के उपरान्त विशेष रूप में देखा गया था। इन आलेखों से गुज़रते हुए हम उस समय के क्रान्तिकारियों और उनके कार्यों से जुड़े ऐसे तथ्यों को भी जान पाएँगे, जो कालान्तर में किंवदन्तियों और कई बार इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत मिथ्या धारणाओं के घटाटोप में छिपे रह गए या अतिरंजनाओं के रूप में प्रचलित हुए। यहाँ प्रकाशित मूल सामग्री हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ और आज़ाद तथा भगतसिंह से सम्बन्धित ऐसी अनेक भ्रान्तियों को भी निरस्त करती है, जिनके चलते हम स्वाधीनता संघर्ष के उस दौर और उसके विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट रूप में नहीं समझ पाते। भारत के निर्णायक ऐतिहासिक क्षणों से साक्षात्कार करानेवाली यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी इतिहासकारों के लिए।
Main Aur Mera Parivesh
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

- Description:
यशपाल की मूल पहचान भले ही एक कथाकार की हो, लेकिन कथा-साहित्य के बाहर भी उन्होंने बहुत-कुछ लिखा था। उनका यह लेखन उनके पर्याप्त लम्बे और व्यवस्थित रचनाकाल में समय की अपनी ज़रूरतों एवं दबावों के हिसाब से हुआ। ‘विप्लव’ के सम्पादकीय, क्रान्तिकारी जीवन के अपने संस्मरणों, यात्रावृत्त, प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों के सम्बन्ध में अभिभूत टिप्पणियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में उन्होंने राजनीतिक निबन्ध भी लिखे। यशपाल के बारे में एक आम धारणा यह है कि अपने वैचारिक आग्रहों के प्रति वे बहुत अनन्य और दृढ़ थे। इसी कारण अपने समय के साहित्यिक-राजनीतिक विवादों और बहसों में भी उनकी सक्रिय हिस्सेदारी रही। मार्क्सवादी और ग़ैर-मार्क्सवादी दोनों तरह के आलोचकों के विरोध के बीच उनका लेखन हुआ। जब-तब उन्हें अपने इन आलोचकों से भी उलझना होता था, भरसक सैद्धान्तिक रूप में वे अपना पक्ष रखते थे। अनुशासन, व्यवस्था और निरन्तरता सम्भवत: यशपाल के लेखन के केन्द्रीय सूत्र हैं। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर तो लिखा ही, व्यक्तिगत सन्दर्भों पर उनका आत्मगत लेखन भी काफ़ी मात्रा में है। यशपाल के असंकलित इन लेखों में बहुत-सी ऐसी सामग्री है जो आत्मगत प्रकृति की है। इस सामग्री को एक जगह देख और पढ़कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। यहाँ अपने लेखकीय जीवन के वैविध्यपूर्ण अनुभवों का खुलासा उन्होंने किया है—कभी अपनी इच्छा से और कभी दूसरों के अनुरोध पर। इस संकलन में उनके अनेक विवादास्पद लेख भी हैं जो इधर वर्षों से अप्राप्य थे। इस ढेर सारी सामग्री के एक जगह उपलब्ध हो जाने से यशपाल जैसे बड़े क़द-बुत के लेखक की रचना-प्रक्रिया और रचनात्मक सरोकारों की दृष्टि से भी इस सामग्री का अपना महत्त्व है।
Yashpal Ka Viplav : Vols. 3
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

Yashpal Ka Viplav-Vol. 4
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

- Description:
‘यशपाल का विप्लव’-4 में संकलित लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत के लगभग सभी पहलुओं पर मंत्रणा करते दिखते है। फिर चाहे मुद्दा साहित्य, संस्कृति और भाषा का हो, कांग्रेसवाद बनाम मार्क्सवाद का हो, या एक नयी वैश्विक व्यवस्था में भारत की छवि और कर्तव्यों का हो। यहाँ एक ऐसी विस्तृत और समावेशी तस्वीर उभरती है जिसे किसी एक उपन्यास या कई कहानियों में भी समेटना नामुमकिन है। इस लिहाज़ से 'विप्लव' का चौथा भाग भारत के बौद्धिक इतिहास की प्रस्तावना उकेरता है—एक ऐसी पृष्ठभूमि जो आजादी से लेकर अबतक हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित-पोषित करता आई है। इन लेखों में यशपाल एक दुस्साहसी संपादक के रूप में निखरते हैं जो अपनी लेखनी में तटस्थ पत्रकारिता, तथ्यपरक विवेचना और साहित्यिक स्वायत्तता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। शैली और भाषा का एक ऐसा नमूना जो आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह कहना उचित होगा कि यशपाल का साहित्य और उनकी पत्रकारिता, दोनों क्रांतिकारी संघर्ष की बौद्धिक उपज हैं। और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसलिए यह किताब हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य है।
Meri Jail Diary
- Author Name:
Yashpal +1
- Book Type:

- Description:
अपनी क्रान्तिकारी एवं साम्राज्य विरोधी गतिविधियों के लिए पुलिस-मुठभेड़ के बाद यशपाल 23 जनवरी, 1932 को इलाहाबाद में गिरफ़्तार हुए। इसके लिए उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई। अपने कारावास के दौर में वे नैनी, सुल्तानपुर, बरेली, फतेहपुर आदि विभिन्न जेलों में रहे। राजनीतिक बन्दी होने से बी क्लास की सुविधाओं के कारण, जीवन की कोई विशेष आशा न होने पर भी, उन्होंने अपने इस समय को पढ़ने-लिखने और विभिन्न भाषाएँ सीखने में लगाया। उन्होंने कहानियाँ लिखीं और पढ़ी गई सामग्री के विस्तृत नोट्स लिए। दोस्तोवस्की, जुलियस फ्युचिक, ग्राम्शी और भगत सिंह आदि की तरह जेल-जीवन में एक तरह से उनका अधिकतर समय इस रचनात्मक उद्यम में ही बीता। जेल-प्रवास का दौर यशपाल के लिए वस्तुतः ढेर सारे फ़ैसलों का दौर भी था। जीवित बाहर निकलने के बाद भविष्य की चिन्ता तो थी ही, यह भी तय करना था कि अब करना क्या है। यशपाल की यह डायरी उनकी रचनात्मक तैयारी का साक्ष्य है। इसमें उन अनेक कहानियों का पहला ड्राफ़्ट मिलता है जो बाद में ‘पिंजरे की उड़ान’ और ‘वो दुनिया’ में संकलित की गई। इस सामग्री में महात्मा गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह, लेनिन की राजनीतिक पद्धति और फ़्रायड के मनोविश्लेषण जैसे परस्पर-विरोधी विचार-सरणियों तक पहुँचने और चीज़ों को देखने, समझने की यशपाल की चिन्ता को देखा जा सकता है। कुल मिलाकर यह सारी सामग्री उनकी उस रचनात्मक बेचैनी का साक्ष्य है जिससे उबरकर ही वे एक पत्रकार और लेखक के रूप में अपना रूपान्तरण करते हैं। इन्हें उनके जीवन के समान्तर रखकर पढ़ा जा सकता है। ये सिर्फ़ कुछ उदाहरण हैं कि यशपाल की यह जेल-डायरी उन्हें कैसे एक बेहतर रूप में समझने का अवसर देती है।
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
- Book Type:


- Description:
ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Anugoonj
- Author Name:
Geetanjali Shree
- Book Type:

- Description:
‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान। यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
- Book Type:


- Description:
पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Gyandan
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

- Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘ज्ञानदान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ज्ञानदानֺ’, ‘एक राज़’, ‘गण्डेरी’, ‘कुछ समझ न सका’, ‘दु:ख का अधिकार’, ‘पराया सुख’, ‘80/100’, या ‘सांई सच्चे!’, ‘ज़बरदस्ती’, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘मनुष्य’, ‘बदनाम’ और ‘अपनी चीज़’।
Mansarovar Vol. 3 : Uddhar Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

- Description:
स्पष्टता के मैदान में प्रेमचन्द बड़ी-से-बड़ी बात को बड़े उलझन के अवसर पर कुछ इस तरह सुलझा कर कह जाते हैं कि मुश्किल-से-मुश्किल बात हमारे रोजमर्रा के, घरेलू जीवन की जानी-पहचानी चीज हो जाती है। उनकी बातों में कुछ ऐसा अनुभव का मर्म भरा होता है कि आदमी उसे कंठस्थ कर लेना चाहता है। उनकी बात स्पष्ट, दो टूक निर्णय होती है। और उनकी कलम सब जगह पहुँचती है, अँधेरे में भी धोखा नहीं देती। —जैनेन्द्र कुमार
Mansarovar Vol. 2 : Lottery Aur Anya kahaniyan
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

- Description:
प्रेमचन्द की रचनाएँ आधुनिक भारत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्हीं के समय से भारतीय पुनर्जागरण का प्रारम्भ होता है, जिसके पैरों की आहट उनकी रचनाओं में महसूस होती है। राष्ट्रीय जीवन की परिवर्तनशीलता, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रगति एवं प्रतिक्रियावादिता, धर्म की, मानवता की परछाइयाँ प्रेमचन्द की रचनाओं में झलकती हैं। —डॉ. जाफ़र रज़ा
Katha Saptak - Mamta Kalia
- Author Name:
Mamta Kalia
- Book Type:

- Description:
7 Short Stories
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description:
एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है। आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया। इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
Dharohar Kahaniyaan : Suryakant Tripathi ‘Nirala’
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

- Description:
निराला के कथा-साहित्य में दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं। एक प्रवृत्ति काल्पनिक इच्छापूर्ति के सपने रचने की है, दूसरी वास्तविक जीवन-संघर्ष को चित्रित करने की। ‘देवी’ और ‘चतुरी चमार’ में कहानी का पुराना ढाँचा टूट गया है। कथानक लेकर चलने वाली, समस्या के समाधान, नायक-नायिका के विवाह से समाप्त होनेवाली कहानियाँ ये नहीं हैं। इनमें परिवेश, पात्र ज्यों के त्यों उठाकर कहानी में रख दिये गए हैं। उनकी कहानियाँ कथा-रचना में यथार्थवादी साहित्य के विकास में नया चरण हैं। —रामविलास शर्मा
Dharohar Kahaniyaan : Suryakant Tripathi ‘Nirala’
Suryakant Tripathi 'Nirala'
20% off₹ 250
₹ 200
Available
Mansarovar Vol. 7 : Jail Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

- Description:
प्रेमचन्द जहाँ भी समाज में अन्याय था, उसका प्रतिकार अपने ढंग से कर रहे थे। ईश्वर द्वारा मनुष्य के प्रति किया गया अन्याय ही नहीं, वे ग्रीक ट्रेजेडी नहीं लिख रहे थे, मनुष्य द्वारा मनुष्य के प्रति किया गया अन्याय, इसी समाज द्वारा इसी समाज में रहने वाले लोगों के प्रति किया गया अन्याय, उसे भी सतह पर लाकर दिखा रहे थे। जहाँ दमन और अन्याय था, उस अन्याय की व्यथा, पीड़ा सामने रख रहे थे और साथ ही उस व्यथा-पीड़ा का ऐसा चित्रण कर रहे थे, जो हमें आपको इस हद तक झकझोर दे कि हम स्वयं उस व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो सकें, जो अमानवीय है ग़ैरबराबरी पर खड़ी है, जिसको हम अनजाने संस्कारवश ढोए चले जा रहे हैं और कभी-कभी परम्परा के प्रति श्रद्धा के नाम पर हम जिसका पोषण-समर्थन करते हैं। —नामवर सिंह
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book