Mahakaushal Anchal Ki Lokkathyen
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Veriar Elwin, Dinesh MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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इस पुस्तक में संकलित महाकोशल अंचल की लोककथाओं को मध्य प्रदेश के मंडला, सिवनी, बालाघाट, बिलासपुर एवं रायपुर ज़िलों और रीवा, कवर्धा, सारंगढ़ और बस्तर से एकत्र किया गया है। इन कहानियों को स्थानीय जनजातियों के लोगों से सुनकर और बातचीत कर यहाँ लिपिबद्ध किया गया है। मध्यवर्ती भारत में प्रचलित कहानियों के अनेक रूप हैं। इनमें से कुछ को हम गद्य कह सकते हैं—सीधे–सीधे विवरण जिन्हें संकेतों और भंगिमाओं के माध्यम से सुनाया गया, फिर भी उनमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। कुछ कहानियों में संवादों के अंशों को गाकर बताया गया था। सूक्तियाँ या पद्य लयबद्ध सरल धुनों में गाई गई थीं। किसी–किसी कहानी में सभी संवाद संगीत में नहीं थे। कुछ विशेष पद्य और भाव ही संगीत में थे। यह जानना दिलचस्प होगा कि कहानी का गाया हुआ अंश कहानी के साथ जुड़ा ही रहा जिससे इन कहानियों की आत्मीयता बनी रही। प्रस्तुत पुस्तक आदिवासियों की कहानियों के ज़रिए हमें उनके नज़दीक ले जाती है। आदिवासियों के विभिन्न संस्कारों के साथ–साथ उनकी मासूमियत और भोलापन भी हमें इन कहानियों में देखने को मिलता है। इसके अलावा इस पुस्तक को आनन्द के उद्देश्य से पढ़ा जाए तो यह और मनोरंजक तथा सरस लगेगी।
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इस पुस्तक में संकलित महाकोशल अंचल की लोककथाओं को मध्य प्रदेश के मंडला, सिवनी, बालाघाट, बिलासपुर एवं रायपुर ज़िलों और रीवा, कवर्धा, सारंगढ़ और बस्तर से एकत्र किया गया है। इन कहानियों को स्थानीय जनजातियों के लोगों से सुनकर और बातचीत कर यहाँ लिपिबद्ध किया गया है।
मध्यवर्ती भारत में प्रचलित कहानियों के अनेक रूप हैं। इनमें से कुछ को हम गद्य कह सकते हैं—सीधे–सीधे विवरण जिन्हें संकेतों और भंगिमाओं के माध्यम से सुनाया गया, फिर भी उनमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
कुछ कहानियों में संवादों के अंशों को गाकर बताया गया था। सूक्तियाँ या पद्य लयबद्ध सरल धुनों में गाई गई थीं। किसी–किसी कहानी में सभी संवाद संगीत में नहीं थे। कुछ विशेष पद्य और भाव ही संगीत में थे। यह जानना दिलचस्प होगा कि कहानी का गाया हुआ अंश कहानी के साथ जुड़ा ही रहा जिससे इन कहानियों की आत्मीयता बनी रही।
प्रस्तुत पुस्तक आदिवासियों की कहानियों के ज़रिए हमें उनके नज़दीक ले जाती है। आदिवासियों के विभिन्न संस्कारों के साथ–साथ उनकी मासूमियत और भोलापन भी हमें इन कहानियों में देखने को मिलता है।
इसके अलावा इस पुस्तक को आनन्द के उद्देश्य से पढ़ा जाए तो यह और मनोरंजक तथा सरस लगेगी।
Book Details
-
ISBN9788126715770
-
Pages391
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मार्च 2009 में हार्वर्ड मेडिकल कॉलेज का उनके लगभग आधे से अधिक वरिष्ठ शिक्षकों का फार्मास्युटिकल्स इंडस्ट्री का स्थायी कर्मचारी होने का खुलासा उस सत्य को स्पष्ट करता है, जिसे मैं इस पुस्तक में प्रकट करने का प्रयास कर रहा हूँ। चिकित्सकीय पाठ्य पुस्तकें आमतौर पर दवा कंपनियों द्वारा मेडिकल कॉलेजों में अपने लेखकों के संपर्कों द्वारा वित्त-पोषित होती हैं। मेरे शिक्षा काल की बीती यादें और इसके सुख व दु:ख मेरी इस पुस्तक रचना का प्रथम कारण रहा। आशा करता हूँ कि यह प्रयास चिकित्सकों की सोच को रोगी शय्या पर आने के लिए प्रेरित करेगा, जो स्वास्थ्य सेवा का मर्म है। इससे मानवता अधिक खुशहाल होगी। मेरा सपना है कि मैं डॉक्टरों को दवा और प्रौद्योगिकी विक्रेता नहीं, बल्कि उनके उपचारक के नियत स्थान पर देखूँ। काश, यह पुस्तक डॉक्टरों की मदद करे और वे रोगियों को दिलचस्प मामले की तरह नहीं, बल्कि परेशान मनुष्यों के रूप में देखने लगें! मैं उस दिन की प्रतीक्षा में हूँ, जब स्वास्थ्य सेवा प्रतिपादन में दुनियाभर के अनेकानेक प्राचीन ज्ञान को सम्मिलित कर इन्हें मानक वैज्ञानिक पद्धति से परखने के बाद प्रमाणीकरण करके अधिक मानवीय, रोगी-मित्रवत तथा सस्ता बनाया जा सके। हमें इतना विनम्र अवश्य होना चाहिए कि हम अपनी कमजोरियों को स्वीकार करें और दूसरों की अच्छाइयों को बिना किसी भय या पक्षपात के स्वीकार कर सकें। आखिरकार, डॉक्टर यहाँ समाज को स्वस्थ करने के लिए हैं, न कि बीमार को जोड़-तोड़ प्रदान करने के लिए।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी दर्शन प्रकृतिवादी है। आदिवासी समाज धरती, प्रकृति और सृष्टि के ज्ञात-अज्ञात निर्देश, अनुशासन और विधान को सर्वोच्च स्थान देता है। उसके दर्शन में सत्य-असत्य, सुन्दर-असुन्दर, मनुष्य-अमनुष्य जैसी कोई अवधारणा नहीं है, न ही वह मनुष्य को उसके बुद्धि-विवेक अथवा ‘मनुष्यता’ के कारण 'महान' मानता है। उसका दृढ़ विश्वास है कि सृष्टि में जो कुछ भी सजीव और निर्जीव है, सब समान है। न कोई बड़ा है, न कोई छोटा है। न कोई दलित है, न कोई ब्राह्मण। सब अर्थवान है एवं सबका अस्तित्व एकसमान है—चाहे वह एक कीड़ा हो, पौधा हो, पत्थर हो या कि मनुष्य हो। वह ज्ञान, तर्क, अनुभव और भौतिकता को प्रकृति के अनुशासन की सीमा के भीतर ही स्वीकार करता है, उसके विरुद्ध नहीं। अन्वेषण, परीक्षण और ज्ञान को आदिवासी दर्शन सुविधा और उपयोगिता की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि धरती, प्रकृति और समस्त जीव-जगत के साथ सहजीवी सामंजस्य और अस्तित्वपूर्ण संगति के बतौर देखता है। मानव की सभी गतिविधियों और व्यवहारों को, समूची विकासात्मक प्रक्रिया को प्रकृति व समष्टि के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पूरक के रूप में देखता है। उन सबका उपयोग वह वहीं तक करता है, जहाँ तक समष्टि के किसी भी वस्तु अथवा जीव को, प्रकृति और धरती को कोई गम्भीर क्षति नहीं पहुँचती हो। जीवन का क्षरण अथवा क्षय नहीं होता हो। आदिवासी साहित्य इसी दर्शन को लेकर चलता है।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
Vandana Tete
20% off₹ 199
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Available
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
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Vandana Tete
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वासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन
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