Kathgodam
(0)
Author:
Krishna KumarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
595
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कृष्ण कुमार सिर्फ़ पेशे से नहीं, पैशन से भी शिक्षाशास्त्री हैं और अपने गहरे मानव-बोध के चलते समाजशास्त्री। उनके लेखन में कहीं भी, कभी भी यह नहीं लगता कि यह उन्होंने किसी व्यावसायिक तक़ाज़े पर लिखा है। उनकी चिन्ताओं की वास्तविकता को उनके गद्य की संरचना स्वयं बयान कर देती है।</p> <p>इस पुस्तक में उनकी कहानियाँ हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह उनका वैचारिक लेखन अपने सरोकारों और चिन्ताओं को स्पष्ट ढंग से रेखांकित करते हुए हमें एक समर्थ गद्य भी उपलब्ध कराता है जिससे हिन्दी के लिक्खाड़ भी कुछ सीख सकते हैं, उसी तरह उनकी ये कहानियाँ कहानी के मौजूदा बाज़ार में एक अलग कोने से किया गया हस्तक्षेप हैं। ये एक समाजशास्त्री द्वारा लिखी हुई कहानियाँ हैं जिनमें वह कहानी विधा के प्रचलित पैमानों से ज़्यादा फ़िक्र इस बात की करता है कि उसके देखे-जाने सुख-दु:ख अपनी पूरी गहराई और फैलाव के साथ भाषा में अंकित हो सकें।</p> <p>वे अपनी बात को पहुँचाना चाहते हैं, सिर्फ़ 'रच' देना भर उनका उद्देश्य नहीं है, और पहुँचाने की यह इच्छा भी उनकी भाषा की शिराओं में बिंधी मिलती है। वे भाषा को वह पूरा का पूरा दे देना चाहते हैं जो उनकी संवेदना ने अपने परिवेश से पाया, महसूस करने की अपनी क्षमता के चलते जो उन्होंने जाना, और जिसने उन्हें व्यथित किया। और इसके लिए वे भाषा को इतना समर्थ बनाने का प्रयास करते हैं जितनी वह अपने देश और काल की सीमाओं के भीतर हो सकती है। हर बड़ा लेखक यही करता है। वह अभिव्यक्ति के उपलब्ध और प्रचलित भाषिक उपकरणों में अपनी बात कहकर सन्तुष्ट नहीं होता। वह जान रहा होता है कि उसे अपने शब्दों को उस तरह प्रशिक्षित करके बाहर भेजना है कि वे अपनी पूरी बात कहकर ही रहें।</p> <p>इन कहानियों के विषय विविध हैं। हिन्दी में और भी कहानियाँ इन्हीं विषयों पर या इन जैसे विषयों पर लिखी गई हैं, लिखी जाएँगी, लेकिन जिस तरह कृष्ण कुमार उन्हें लिखते हैं, वह अपनी एक अलग श्रेणी बनाता है।
Read moreAbout the Book
कृष्ण कुमार सिर्फ़ पेशे से नहीं, पैशन से भी शिक्षाशास्त्री हैं और अपने गहरे मानव-बोध के चलते समाजशास्त्री। उनके लेखन में कहीं भी, कभी भी यह नहीं लगता कि यह उन्होंने किसी व्यावसायिक तक़ाज़े पर लिखा है। उनकी चिन्ताओं की वास्तविकता को उनके गद्य की संरचना स्वयं बयान कर देती है।</p>
<p>इस पुस्तक में उनकी कहानियाँ हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह उनका वैचारिक लेखन अपने सरोकारों और चिन्ताओं को स्पष्ट ढंग से रेखांकित करते हुए हमें एक समर्थ गद्य भी उपलब्ध कराता है जिससे हिन्दी के लिक्खाड़ भी कुछ सीख सकते हैं, उसी तरह उनकी ये कहानियाँ कहानी के मौजूदा बाज़ार में एक अलग कोने से किया गया हस्तक्षेप हैं। ये एक समाजशास्त्री द्वारा लिखी हुई कहानियाँ हैं जिनमें वह कहानी विधा के प्रचलित पैमानों से ज़्यादा फ़िक्र इस बात की करता है कि उसके देखे-जाने सुख-दु:ख अपनी पूरी गहराई और फैलाव के साथ भाषा में अंकित हो सकें।</p>
<p>वे अपनी बात को पहुँचाना चाहते हैं, सिर्फ़ 'रच' देना भर उनका उद्देश्य नहीं है, और पहुँचाने की यह इच्छा भी उनकी भाषा की शिराओं में बिंधी मिलती है। वे भाषा को वह पूरा का पूरा दे देना चाहते हैं जो उनकी संवेदना ने अपने परिवेश से पाया, महसूस करने की अपनी क्षमता के चलते जो उन्होंने जाना, और जिसने उन्हें व्यथित किया। और इसके लिए वे भाषा को इतना समर्थ बनाने का प्रयास करते हैं जितनी वह अपने देश और काल की सीमाओं के भीतर हो सकती है। हर बड़ा लेखक यही करता है। वह अभिव्यक्ति के उपलब्ध और प्रचलित भाषिक उपकरणों में अपनी बात कहकर सन्तुष्ट नहीं होता। वह जान रहा होता है कि उसे अपने शब्दों को उस तरह प्रशिक्षित करके बाहर भेजना है कि वे अपनी पूरी बात कहकर ही रहें।</p>
<p>इन कहानियों के विषय विविध हैं। हिन्दी में और भी कहानियाँ इन्हीं विषयों पर या इन जैसे विषयों पर लिखी गई हैं, लिखी जाएँगी, लेकिन जिस तरह कृष्ण कुमार उन्हें लिखते हैं, वह अपनी एक अलग श्रेणी बनाता है।
Book Details
-
ISBN9789388183055
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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