Chaku, Aine Aur Bhool - Bhulaiya
(0)
Author:
Jorge Luis BorgesPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
195
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बोर्खेज़ ने एक भी उपन्यास नहीं लिखा। नाटक भी नहीं, कोई ‘बड़ी’ कविता नहीं, कोई आत्मकथात्मक या आलोचना-पुस्तक नहीं, कोई दार्शनिक प्रबन्ध भी नहीं। उन्होंने</p> <p>बड़े गर्व के साथ आधुनिक साहित्य की समस्त विषय-वस्तुओं की उपेक्षा की। यौन सम्बन्ध के बारे में कुछ नहीं लिखा, सामाजिक अतिरेक के विषय में भी नहीं, राजनीतिक विचारधाराओं या यथार्थ जीवन के टेक्सचर पर भी कुछ नहीं। उन्होंने प्रकृति में भी कोई रुचि नहीं ली, उनकी सेटिंग्स इतनी उजाड़ और बेहलचल है जितनी डि शिरिका की चित्रकला। बोर्खेज़ किसी ऐसी साहित्यिक परम्परा के रचनाकार हैं जो आज तक अज्ञात है, जो उस परम्परा से बिलकुल भिन्न है जिससे हम परिचित हैं और जिसमें अपना बौद्धिक जीवन जी रहे हैं। ...लेकिन बोर्खेज़ को ऐसा ‘आदिम’ नहीं कह सकते जो अनभिज्ञता की वजह से मौलिकता की ओर आकृष्ट हुआ हो। वे अपनी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति की तरह अनेक साहित्यिक परम्पराओं के ज्ञाता थे। जॉयस, सूरत, काफ़्का, वर्जीनिया वुल्फ़ (जिसका उन्होंने अनुवाद किया) से वे बख़ूबी परिचित थे, फिर भी उनके अपने समूचे जीवनकाल में यूरोप और अमेरिका में जो कुछ लिखा गया। उसके अधिकांश की उन्होंने अपेक्षा की। वे ज़्यादातर उन्हीं लेखकों से प्रभावित रहे जिनकी पुस्तकें उनके पिता की निजी, समृद्ध लाइब्रेरी में सजी हुई थीं : ब्राउने. डी. क्विंसी कॉलरिज, स्पेंसर, शॉ, वेल, किपलिंग, स्टीवेंसन, और वे विद्वान् जिन्होंने एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के लिए लेख लिखे। ये सभी उनकी दुर्नामी (नटोरियस) विद्वत्ता का स्रोत हैं।</p> <p>जेम्स नेल्सन की नज़रों में बोइंग के समूचे काम में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति एक ‘एलोक्वेंट’ है, शब्द-चातुर्य, जो अनोखा है और अकादमीय मतों के खंडन में किए गए अपने सारे प्रयास की पुष्टि करता है फिर भी, फिर भी...।</p> <p>कालिक क्रम को नकारना, स्व को नकारना, खगोलीय ब्रह्मांड को नकारना—बेशक हताशा है, मन को गुपचुप ढांढ़स देना है। हमारी नियति (अगर उसे स्वीडनबर्ग के नर्क के और तिब्बती पुराण के नर्क के कंट्रास्ट में देखें तो) भ्रामक बनी होकर भयावह नहीं है। वह इसलिए भयावह है, क्योंकि वह अनुत्क्रमणीय और लौहकवचबद्ध है। समय कोई नदी है जो मुझे साथ बहाती है, लेकिन मैं ही नदी हूँ। शेर मेरा विनाश करता है, लेकिन मैं ही शेर हूँ। अग्नि मुझे भस्म करती है, लेकिन मैं ही अग्नि हूँ। संसार, दुर्भाग्यवश, वास्तविक है; मैं, दुर्भाग्यवश, बोर्खेज़ हूँ।
Read moreAbout the Book
बोर्खेज़ ने एक भी उपन्यास नहीं लिखा। नाटक भी नहीं, कोई ‘बड़ी’ कविता नहीं, कोई आत्मकथात्मक या आलोचना-पुस्तक नहीं, कोई दार्शनिक प्रबन्ध भी नहीं। उन्होंने</p>
<p>बड़े गर्व के साथ आधुनिक साहित्य की समस्त विषय-वस्तुओं की उपेक्षा की। यौन सम्बन्ध के बारे में कुछ नहीं लिखा, सामाजिक अतिरेक के विषय में भी नहीं, राजनीतिक विचारधाराओं या यथार्थ जीवन के टेक्सचर पर भी कुछ नहीं। उन्होंने प्रकृति में भी कोई रुचि नहीं ली, उनकी सेटिंग्स इतनी उजाड़ और बेहलचल है जितनी डि शिरिका की चित्रकला। बोर्खेज़ किसी ऐसी साहित्यिक परम्परा के रचनाकार हैं जो आज तक अज्ञात है, जो उस परम्परा से बिलकुल भिन्न है जिससे हम परिचित हैं और जिसमें अपना बौद्धिक जीवन जी रहे हैं। ...लेकिन बोर्खेज़ को ऐसा ‘आदिम’ नहीं कह सकते जो अनभिज्ञता की वजह से मौलिकता की ओर आकृष्ट हुआ हो। वे अपनी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति की तरह अनेक साहित्यिक परम्पराओं के ज्ञाता थे। जॉयस, सूरत, काफ़्का, वर्जीनिया वुल्फ़ (जिसका उन्होंने अनुवाद किया) से वे बख़ूबी परिचित थे, फिर भी उनके अपने समूचे जीवनकाल में यूरोप और अमेरिका में जो कुछ लिखा गया। उसके अधिकांश की उन्होंने अपेक्षा की। वे ज़्यादातर उन्हीं लेखकों से प्रभावित रहे जिनकी पुस्तकें उनके पिता की निजी, समृद्ध लाइब्रेरी में सजी हुई थीं : ब्राउने. डी. क्विंसी कॉलरिज, स्पेंसर, शॉ, वेल, किपलिंग, स्टीवेंसन, और वे विद्वान् जिन्होंने एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के लिए लेख लिखे। ये सभी उनकी दुर्नामी (नटोरियस) विद्वत्ता का स्रोत हैं।</p>
<p>जेम्स नेल्सन की नज़रों में बोइंग के समूचे काम में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति एक ‘एलोक्वेंट’ है, शब्द-चातुर्य, जो अनोखा है और अकादमीय मतों के खंडन में किए गए अपने सारे प्रयास की पुष्टि करता है फिर भी, फिर भी...।</p>
<p>कालिक क्रम को नकारना, स्व को नकारना, खगोलीय ब्रह्मांड को नकारना—बेशक हताशा है, मन को गुपचुप ढांढ़स देना है। हमारी नियति (अगर उसे स्वीडनबर्ग के नर्क के और तिब्बती पुराण के नर्क के कंट्रास्ट में देखें तो) भ्रामक बनी होकर भयावह नहीं है। वह इसलिए भयावह है, क्योंकि वह अनुत्क्रमणीय और लौहकवचबद्ध है। समय कोई नदी है जो मुझे साथ बहाती है, लेकिन मैं ही नदी हूँ। शेर मेरा विनाश करता है, लेकिन मैं ही शेर हूँ। अग्नि मुझे भस्म करती है, लेकिन मैं ही अग्नि हूँ। संसार, दुर्भाग्यवश, वास्तविक है; मैं, दुर्भाग्यवश, बोर्खेज़ हूँ।
Book Details
-
ISBN9788171787456
-
Pages187
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हरीश चन्द्र पाण्डे की अभिव्यक्ति में अनुभवों का वैविध्य है। ‘बोहनी’, ‘साथी’ व ‘प्रोत्साहन’ कहानियों से इसे परखा जा सकता है। अपनी सरलता और सहजता में ये रचनाएँ बेजोड़ हैं। शब्द-स्फीति के संक्रामक समय में लेखक का संयम और सन्तुलन सराहने योग्य है। भाषा में अद्भुत लय है, जैसे—‘अरे भई, शब्द की अपनी एक सुगन्ध होती है? व्याप्ति होती है?...बुरूंश कहते ही चारों ओर उजाला-सा फैल जाता है। फूलों से लदी पहाड़ियों और घरों की देहरियाँ कौंधने लगती हैं?’
इन कहानियों को पढ़ना सहज दिखते जटिल यथार्थ से गुज़रना है।
Sagar Yaraa
- Author Name:
Sagar Sarhadi
- Book Type:

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Description:
सागर यारा की कहानियाँ हमें बीसवीं सदी के उस दौर में ले जाती हैं जब रूमान की हैसियत एक समाजी ताक़त की होती थी। ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से वह बराबर की टक्कर लेता था। किताबें पढ़ना, सपने देखना, ख़ुद के दायरे से निकलकर पूरी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचना, पैसे की क़ुदरत को चुनौती देना और ज़िन्दगी के इस तरीक़े पर सवाल उठानेवाली रुकावटों से जान पर खेलकर लड़ना उस दौर के रौशन दिमाग़ों की अपनी जीवन-शैली थी, जो आज के संचार-सम्पन्न इकहरे माहौल में दूर की चीज़ लगती है।
लेकिन ऐसा नहीं कि ये आज की कहानियाँ नहीं हैं। वे सवाल, जो इन कहानियों के लिखे जाने की वजह बने, आज भी हमारे सामने हैं। आज भी आख़िरी कहानी के सफ़दर की तरह हर देशी भाषा के लेखक पूछ सकते हैं कि ‘इस मुल्क में हर आदमी, हर पेशेवाला अपना काम कर सकता है, सिर्फ़ लेखक, लेखक नहीं रह सकता। उसे या तो टीचर बनना पड़ता है या क्लर्क या मैकेनिक।’ या फिर मेरे भाईजान की शबनम जो परम्परागत मुस्लिम घर की दीवारों से निकलकर जब दुनिया देखती है तो ज़िन्दगी से वापस प्यार करने लगती है।
सागर सरहदी मूलत: नाटककार थे, उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, इसलिए इन कहानियों की दृश्य और संवाद योजना हमें कहानीपन के एक अलग ही आस्वाद तक ले जाती है। ऊपर से उर्दू अफ़सानानिगारी की रवानी और अपने किरदारों से लेखक की मुहब्बत इन कहानियों को एक खास पाठ बना देता है। इस लिहाज से देखें तो डायलॉग लिखवा लो, बाबूजी की बस निकल गई, रामलीला का राम, हर्षद मेहता का सूटकेस आदि कहानियाँ गहरा और देर तक रहनेवाला असर छोड़ती हैं। सरहदी साहब को सन् ’47 के विभाजन और शरणार्थी जीवन का भी निजी तजुर्बा रहा, इस किताब में उसकी भी कुछ झलकें दिखाई देती हैं, और हिन्दी फ़िल्म-संसार की भी जहाँ उनकी रचनात्मकता के कई पहलू उजागर हुए और जिसके विरोधाभासों को भी उन्होंने जिया-झेला।
Pratinidhi Kahaniyan : Arun Prakash
- Author Name:
Arun Prakash
- Book Type:

- Description: साहित्य के मौजूदा दौर में पाठ-सुख वाली कहानियाँ कम होती जा रही हैं। इस संकलन की कहानियों में पाठ-सुख भरपूर है। लेकिन यह सुख तात्कालिक नहीं है बल्कि ये निर्विवाद कहानियाँ देर तक स्मृति में बनी रहती हैं। लोकप्रियता और विचार-केन्द्रित कथा का मिज़ाज मुश्किल से मिलता है, पर इन कहानियों में यह सुमेल इसलिए सम्भव हो पाया, क्योंकि यहाँ पाठकों के प्रति गम्भीर सम्मान है। ये कहानियाँ पाठकों को उपभोक्ता नहीं, सहभोक्ता; श्रोता नहीं, संवादक बनने का अवसर देती हैं। इनमें विचार उपलाता नहीं, अन्तर्धारा की तरह बहता है, क्योंकि यह सृजन पाठक-लेखक सहभागिता पर टिका है। युग की प्रमुख आवाज़ों को सुरक्षित रखना इतिहास की ज़िम्मेवारी है, छोटी-छोटी अनुगूँजों को सहेजना साहित्य की। मनुष्य विरोधी मूल्यों, सत्ताओं और संगठित संघर्षों की बड़ी उपस्थिति के बावजूद लघु, असंगठित और प्राय: व्यक्तिगत संघर्षों की बड़ी दुनिया है। इन कहानियों में उसी की अनुगूँजें हैं। ये कहानियाँ किसी एक शैली में नहीं बँधी हैं, बल्कि हर कहानी का अलग और स्वतंत्र व्यक्तित्व नई भाषा, नई संरचना और आन्तरिक गतिशीलता के सहारे निर्मित किया गया है।
Tukdon Tukdon Mein Aurat
- Author Name:
Mamta Mehrotra
- Book Type:

- Description: ‘‘हाँ! क्या मामला है? न्याय की प्रक्रिया शुरू की जाए।’’ ‘‘जी, ये इस शहर के एक युवक के साथ शहर की सीमा पार कर रही थी। यह जुर्म किया है इसने।’’ ‘‘नहीं! मैंने जुर्म नहीं किया है। इस युवक ने मेरे आगे पेशकश की थी कि यह मुझे गाँव छोड़ आएगा। वहाँ मेरे बच्चे भूखे हैं। मैं उनके लिए रोटी लेकर जा रही थी।’’ ‘‘पाप! अब तो तुमने महापाप किया है। शहर की रोटी गाँव लेकर जा रही थी। तुमको दंड मिलेगा और युवक की गलती भी नहीं है। जरूर एक स्त्री होकर तुमने उसको पथभ्रमित किया होगा। कोई पुरुष इतना साहसिक कदम उठा ही नहीं सकता है, अगर स्त्री उसको न उकसाए।’’ —इसी संग्रह से प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश कहानियाँ नारी के अस्तित्व की लड़ाई को दरशानेवाली हैं। कैसे एक महिला समाज में हर स्तर पर प्रताड़ना और अवहेलना झेलती है। उसका किस प्रकार शोषण होता है। नारी के जीवन जीने की जद्दोजहद को लेखिका ने इन कहानियों में बड़ी सूक्ष्मता और सहजता से अभिव्यक्त किया है। समस्त कहानियाँ कहीं-न-कहीं हमारे अंदर की दोयम सोच एवं खोखलेपन को बखूबी दरशाती हैं। पठनीयता से भरपूर, मन को उद्वेलित करनेवाली कहानियाँ।
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