Kannadada Muvattu Kathegalu
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ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾದೆಮಿಯ ಪ್ರಧಾನ ಉದ್ದೇಶದಂತೆ ಇತರ ಭಾರತೀಯ ಭಾಷೆಗಳಿಗೆ ಅನುವಾದಗೊಳ್ಳಲು ಒಂದು ಪ್ರಾತಿನಿಧಿಕ ಕಥಾ ಸಂಕಲನವನ್ನು ಸಂಪಾದಿಸಿಕೊಡುವಂತೆ 2008ರಲ್ಲಿ ಅಕಾದೆಮಿಯ ಕನ್ನಡ ಸಲಹಾ ಸಮಿತಿ ಲೇಖಕರಾದ ಶ್ರೀ ಫಕೀರ್ ಮಹಮದ್ ಕಟ್ಟಾಡಿ ಹಾಗೂ ಡಾ.ಕೃಷ್ಣಮೂರ್ತಿ ಹನೂರು ಅವರನ್ನು ಕೇಳಿಕೊಂಡಿತು. ಅದಕ್ಕನುಗುಣವಾಗಿ ಆಧುನಿಕ ಕನ್ನಡ ಕಥಾಲೋಕದ ಹಿರಿಯ ಚೇತನ ಮಾಸ್ತಿಯವರಿಂದ ಮೊದಲುಗೊಂಡು ವಿವಿಧ ಮನೋಧರ್ಮಗಳಿಗೆ ಸೇರಿದಂತಹ ಮೂವತ್ತು ಕಥೆಗಾರರ ಕಥೆಗಳನ್ನು ಸಂಪಾದಕರು ಇಲ್ಲಿ ಕೊಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ. ಕಳೆದೊಂದು ಶತಮಾನದಲ್ಲಿ ಕನ್ನಡ ಕಥಾ ಜಗತ್ತು ತೆರೆದುಕೊಂಡ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆ, ಅದರ ವೈವಿಧ್ಯತೆ ಹಾಗೂ ಅನಾವರಣಗೊಂಡ ರೀತಿಯನ್ನು ಸಮರ್ಥವಾಗಿ ಪ್ರತಿಪಾದಿಸುವ ಕಥೆಗಳು ಈ ಸಂಕಲನದಲ್ಲಿವೆ. ಶ್ರೀ ಫಕೀರ್ ಮಹಮದ್ ಕಟ್ಟಾಡಿ ಹಾಗೂ ಡಾ.ಕೃಷ್ಣಮೂರ್ತಿ ಹನೂರು ಇಬ್ಬರೂ ವಿಶಿಷ್ಟ ಕಥೆಗಾರರಾಗಿ ಪ್ರಸಿದ್ದರು ಹಾಗೂ ಕಾದಂಬರಿ, ವಿಮರ್ಶೆ ಇನ್ನಿತರ ಸಾಹಿತ್ಯ ಪ್ರಕಾರಗಳಲ್ಲೂ ಗಣನೀಯ ಕೊಡುಗೆಗಳನ್ನು ನೀಡಿರುವ ಲೇಖಕರಾಗಿ ಜನಪ್ರಿಯರಾಗಿದ್ದಾರೆ.
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ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾದೆಮಿಯ ಪ್ರಧಾನ ಉದ್ದೇಶದಂತೆ ಇತರ ಭಾರತೀಯ ಭಾಷೆಗಳಿಗೆ ಅನುವಾದಗೊಳ್ಳಲು ಒಂದು ಪ್ರಾತಿನಿಧಿಕ ಕಥಾ ಸಂಕಲನವನ್ನು ಸಂಪಾದಿಸಿಕೊಡುವಂತೆ 2008ರಲ್ಲಿ ಅಕಾದೆಮಿಯ ಕನ್ನಡ ಸಲಹಾ ಸಮಿತಿ ಲೇಖಕರಾದ ಶ್ರೀ ಫಕೀರ್ ಮಹಮದ್ ಕಟ್ಟಾಡಿ ಹಾಗೂ ಡಾ.ಕೃಷ್ಣಮೂರ್ತಿ ಹನೂರು ಅವರನ್ನು ಕೇಳಿಕೊಂಡಿತು. ಅದಕ್ಕನುಗುಣವಾಗಿ ಆಧುನಿಕ ಕನ್ನಡ ಕಥಾಲೋಕದ ಹಿರಿಯ ಚೇತನ ಮಾಸ್ತಿಯವರಿಂದ ಮೊದಲುಗೊಂಡು ವಿವಿಧ ಮನೋಧರ್ಮಗಳಿಗೆ ಸೇರಿದಂತಹ ಮೂವತ್ತು ಕಥೆಗಾರರ ಕಥೆಗಳನ್ನು ಸಂಪಾದಕರು ಇಲ್ಲಿ ಕೊಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ. ಕಳೆದೊಂದು ಶತಮಾನದಲ್ಲಿ ಕನ್ನಡ ಕಥಾ ಜಗತ್ತು ತೆರೆದುಕೊಂಡ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆ, ಅದರ ವೈವಿಧ್ಯತೆ ಹಾಗೂ ಅನಾವರಣಗೊಂಡ ರೀತಿಯನ್ನು ಸಮರ್ಥವಾಗಿ ಪ್ರತಿಪಾದಿಸುವ ಕಥೆಗಳು ಈ ಸಂಕಲನದಲ್ಲಿವೆ.
ಶ್ರೀ ಫಕೀರ್ ಮಹಮದ್ ಕಟ್ಟಾಡಿ ಹಾಗೂ ಡಾ.ಕೃಷ್ಣಮೂರ್ತಿ ಹನೂರು ಇಬ್ಬರೂ ವಿಶಿಷ್ಟ ಕಥೆಗಾರರಾಗಿ ಪ್ರಸಿದ್ದರು ಹಾಗೂ ಕಾದಂಬರಿ, ವಿಮರ್ಶೆ ಇನ್ನಿತರ ಸಾಹಿತ್ಯ ಪ್ರಕಾರಗಳಲ್ಲೂ ಗಣನೀಯ ಕೊಡುಗೆಗಳನ್ನು ನೀಡಿರುವ ಲೇಖಕರಾಗಿ ಜನಪ್ರಿಯರಾಗಿದ್ದಾರೆ.
Book Details
-
ISBN9788126044713
-
Pages299
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Avg Reading Time10 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘मालूशाही...मेरा छलिया बुरांश’ संग्रह की नौ कहानियाँ यथार्थ के विविध रूप हैं। कहीं अच्छे आदमी का अपने भीतर के बुरे को पहचाना जाना है तो कहीं प्रतिकूल समय की नब्ज़ को टटोलना है। कोई कहानी शिक्षा के दरीचे को पाठक के लिए नए सिरे से खोलती है तो कोई माटी का राग छेड़ देती है। यथार्थ के अन्तर्विरोधी स्वरों को पकड़ना हो या फिर उसके भीतर प्रवाहित छिपी हुई धवल लहर को देख पाना-कथाकार प्रज्ञा की कहानियाँ उसे पाठक के सामने लाती रही हैं। प्रज्ञा की कहानियों के विषय विविध हैं। श्रमशील वर्ग से लेकर मध्यवर्ग, शहर से लेकर गाँव और उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तनों को पकड़ने की दृष्टि प्रज्ञा के पास है। उपेक्षित हाशिए के विविध चेहरों को, उनकी आवाज़ों को कथाकार ने बेहद मज़बूती के साथ दर्ज कराया है। उनकी कहानियाँ हों या उपन्यास यह ख़ासियत उनमें देखी जा सकती है। प्रज्ञा के रचे किरदार अनेक समस्याओं से जूझते हैं पर उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते। प्रतिरोध की ताक़त और उत्कट जिजीविषा के साथ वे हौसले की डोर थामे रहते हैं। कई बार टूटते भी हैं पर जीवन से भागते नहीं।
परिवेश, शिल्प और बारीक़ बुनावट ‘मालूशाही...मेरा छलिया बुरांश’ की कहानियों में देखी जा सकती है। स्वाभाविक की आशा और नियत की अनिश्चितता से प्रज्ञा अपनी कहानियों का संसार बुनती हैं। इसीलिए उनकी अधिकांश कहानियाँ रहस्य और जिज्ञासा से भरी होकर पाठक को उस अन्त पर ले जाकर खड़ा करती हैं जो उसकी चेतना में लगभग कल्पनातीत होता है। कथा-रस से भरपूर प्रज्ञा की कहानियाँ तेज़ी से भाग रहे समय को न सिर्फ़ ठहरकर देखती हैं बल्कि उनका घटनाक्रम समकाल के विविध ज्वलंत सवालों को साफ़गोई से सामने रखता है। एक दशक से अधिक की अपनी कथा-यात्रा में प्रज्ञा ने अपने समकालीन कथाकारों के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है।
Vimarsh Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Pankaj Subeer
- Book Type:

- Description: Book
Raat Din
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

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Description:
विष्णु नागर का यह पाँचवाँ कहानी-संग्रह है ‘रात-दिन’। कविता और व्यंग्य की दुनिया में जितने वह सक्रिय हैं, उतने ही कहानी की दुनिया में भी। उनका यह कहानी-संग्रह इस मायने में दूसरों से बहुत भिन्न है कि इसकी चंदेक कहानियों को छोड़कर लगभग सारी कहानियों-लघुकथाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है। वह चाहे ‘प्रेम-कहानियाँ’ हो या ‘पापा मैं ग़रीब बनूँगा’ हो या ‘भगत सिंह बिल्डर्स’ हो या ‘साले तू किसकी इजाज़त से मरा’ है। वह चाहे प्रेम-प्रसंग हो, शैतान के अच्छा आदमी दीखने की कोशिश हो या जीवन-भर भ्रष्टाचार और काहिली के बाद सत्य और न्याय के पथ पर चलने की कोशिश करनेवाले ढोंगी और कायर बूढ़े हों, करियर और पैसे के पीछे भागते लोग हों या साम्प्रदायिक शक्तियाँ हों या गाँव और देश से बनावटी प्रेम करनेवाले लोग हों या महात्मा गांधी के नाम पर तरह-तरह के धन्धे करनेवाले लोग हों—सभी उनकी कहानियों का विषय बनते हैं। यहाँ तक कि सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के प्रति शोकाकुल मित्र के प्रेम को भी उन्होंने व्यंग्यात्मक अन्दाज़ में व्यक्त किया है। यह व्यंग्य, व्यंग्य-विनोदवाला नहीं है—यह चुभता है, गड़ता है, परेशान करता है, उत्तेजित करता है, विकल करता है।
हमेशा की तरह दिलचस्प और पठनीय विष्णु नागर के इस संग्रह में ‘भटकनेवाला आदमी’, ‘बेटा और माँ’, ‘बचपन के पहाड़’, ‘दयालु पागल’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो एक तरह से कहानी होकर भी कविता हैं और कविता होकर भी कहानी हैं। वे कहानी में कविता और व्यंग्य की ताक़त के साथ आते हैं और कविता में कहानी और व्यंग्य की शक्ति के साथ और उनका व्यंग्य, कविता भी होता है, कहानी भी, निबन्ध भी, राजनीतिक टिप्पणी भी।
बहरहाल यह कहानी-संग्रह आपके हाथों में है और यह परखने का मौक़ा देगा कि जो कहा गया। वह कितना सच है। विश्वास है कि यह सब कुछ आपको सच लगेगा।
Punarsrijan Mein Renu
- Author Name:
Rakesh Bihari
- Book Type:

- Description: पूर्वज कथाकारों की कालजयी कहानियों से गुजरते हुए यह प्रश्न कई बार सामने आता है कि आज यदि वे कथाकार हमारे साथ होते और अपनी उन्हीं कहानियों को फिर से लिखते तो उनका स्वरूप क्या होता? अपने पूर्ववर्ती कथाकारों की उन खास कहानियों को बार-बार पढ़ते हुये बाद के किसी कथाकार के भीतर यह भाव आना भी अस्वाभाविक नहीं कि ‘यदि इन कहानियों को मैं लिखता तो कैसे लिखता’? अमर कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की छ: प्रतिनिधि कहानियों की पुनर्रचना और उनके विश्लेषण के बहाने यह पुस्तक स्वप्न, चुनौती और जोखिम से भरे ऐसे ही प्रश्नों के उत्तरों की तलाश करता है। पुनर्सृजित कहानियों का ऐसा संग्रह विश्व साहित्य के इतिहास में पहली बार प्रकाशित हो रहा है।
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