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मैं कुमार अंबुज की कविताओं का तो प्रशंसक रहा हूँ लेकिन मुझे दूर-दूर तक यह ख़याल नहीं था कि वे कहानी की दुनिया में भी क़दम रखेंगे। क़दम भी ऐसा कि कहानी की परिभाषा ही बदल दी है। ये चित्रों में कही गई कहानियाँ हैं। एक कैमरे की आँख है जो एक-एक बारीक दृश्य को देखती है। भाषा अंबुज की इन कहानियों की सबसे बड़ी ताक़त है जो हर दृश्य की सूक्ष्म परतों को खोलती चली जाती है। —नामवर सिंह इन कहानियों की रेंज बहुत व्यापक है, प्राय: ही अपने समय, समाज और जीवन का बहुत कुछ घेरते हुए। छोटे-छोटे उदाहरण या ब्यौरों से कुमार अंबुज क़िस्सागोई की कला को जैसे एक नया आयाम देते हैं। इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों से वे समाज और राष्ट्र की बड़ी चिन्ता से जुड़ते हैं, यहीं से वे भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के बढ़ते संक्रमण के प्रतिवाद और प्रतिरोध के सूत्र उठाते हैं। ये प्रच्छन्न इच्छाएँ ही वस्तुत: एक दुनिया के प्रतिवाद के साथ दूसरी वैकल्पिक दुनिया का संकेत देती हैं। ये गहरे में जाकर मनुष्य को मानवीय बनाने और बने रहने के उद्यम के अंग हैं। कुमार अंबुज की ये कहानियाँ बार-बार पढ़े जाने को उकसाएँगी। —मधुरेश ये कहानियाँ हमारे जीवन के बेहद मामूली अनुभवों के बीच से असाधारणता का विरल तत्त्व खोजने का जो साहस दिखाती हैं, वह हिन्दी के सन्दर्भ में बेहद औचक और नया है। समूचे सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन में जो ठहराव धीरे-धीरे घर कर रहा है, उसकी तह तक पहुँचने, उसे तोड़ने और उसका सर्जनात्मक विकल्प तैयार करने का महत्त्वपूर्ण काम ये कहानियाँ सहजता और बेहद सादगी के साथ करती हैं। यही इन विलक्षण कहानियों की सबसे बड़ी सफलता भी है। —जितेन्द्र भाटिया

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मैं कुमार अंबुज की कविताओं का तो प्रशंसक रहा हूँ लेकिन मुझे दूर-दूर तक यह ख़याल नहीं था कि वे कहानी की दुनिया में भी क़दम रखेंगे। क़दम भी ऐसा कि कहानी की परिभाषा ही बदल दी है। ये चित्रों में कही गई कहानियाँ हैं। एक कैमरे की आँख है जो एक-एक बारीक दृश्य को देखती है। भाषा अंबुज की इन कहानियों की सबसे बड़ी ताक़त है जो हर दृश्य की सूक्ष्म परतों को खोलती चली जाती है।

—नामवर सिंह

इन कहानियों की रेंज बहुत व्यापक है, प्राय: ही अपने समय, समाज और जीवन का बहुत कुछ घेरते हुए। छोटे-छोटे उदाहरण या ब्यौरों से कुमार अंबुज क़िस्सागोई की कला को जैसे एक नया आयाम देते हैं। इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों से वे समाज और राष्ट्र की बड़ी चिन्ता से जुड़ते हैं, यहीं से वे भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के बढ़ते संक्रमण के प्रतिवाद और प्रतिरोध के सूत्र उठाते हैं। ये प्रच्छन्न इच्छाएँ ही वस्तुत: एक दुनिया के प्रतिवाद के साथ दूसरी वैकल्पिक दुनिया का संकेत देती हैं। ये गहरे में जाकर मनुष्य को मानवीय बनाने और बने रहने के उद्यम के अंग हैं। कुमार अंबुज की ये कहानियाँ बार-बार पढ़े जाने को उकसाएँगी।

—मधुरेश

ये कहानियाँ हमारे जीवन के बेहद मामूली अनुभवों के बीच से असाधारणता का विरल तत्त्व खोजने का जो साहस दिखाती हैं, वह हिन्दी के सन्दर्भ में बेहद औचक और नया है। समूचे सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन में जो ठहराव धीरे-धीरे घर कर रहा है, उसकी तह तक पहुँचने, उसे तोड़ने और उसका सर्जनात्मक विकल्प तैयार करने का महत्त्वपूर्ण काम ये कहानियाँ सहजता और बेहद सादगी के साथ करती हैं। यही इन विलक्षण कहानियों की सबसे बड़ी सफलता भी है।

—जितेन्द्र भाटिया

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2015
Weight
282 grams
ISBN-13
9788183616898
Pages
128
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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