Maati
Author:
Shailendra SagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
शैलेन्द्र सागर का यह कहानी-संग्रह समय के अलक्षित किंतु असहनीय आतंक को अद्भुत रचनात्मक दक्षता के साथ अभिव्यक्त करता है। लेखक ने मानो यथार्थ की केंचुल उतार कर उसे और चमकदार बना दिया है। परिचित जीवन में अप्रत्याशित का अन्वेषण करते हुए शैलेन्द्र सागर ने संबंधों, आस्थाओं और मूल्यों के आत्मसंघर्ष को शब्दबद्ध किया है। समकालीन समाज का कलह एवं कोलाहल इन कहानियों में पार्श्व-संगीत की भाँति अनुभव किया जा सकता है। ये कहानियाँ जाने-अनजाने जीवन के शाश्वत प्रश्नों से टकराती हैं। कई बार चरित्रों के अंतर्द्वंद्व से छनती दार्शनिकता पाठक को मन के अगाध में उतरने का अवसर देती है। <br>इसे कहानीकार का कौशल कहा जाएगा कि कथा-रस का पूर्ण परिपाक तथा प्रतिबद्ध रचनाकर्म का अनुशासन यहाँ संभव हुआ है। मध्यवर्ग की विसंगतियाँ, राजनीति के दारुण सच, जीवन की अतृप्त कामनाएँ और रागरंजित संसार में रक्तरंजित संवेदनाएँ इन कहानियों की अंतर्वस्तु का हिस्सा हैं। शैलेन्द्र सागर <br>ने शिल्प की प्रयोगधर्मिता के स्थान पर ‘निरायास विन्यास’ को अंगीकार किया है।<br>यही ‘सहज शिल्प’ इन समस्त कहानियों का सौंदर्य है। ये कहानियाँ एक अर्थवान प्रतिवाद का पक्ष निर्मित करती हैं।
ISBN: 9788171195602
Pages: 156
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
राजेन्द्र प्रसाद पांडेय उन विरले कहानीकारों में से हैं, जो अपने समय, समाज और व्यक्ति के चेहरे पर ओढ़ी हुई कृत्रिम परतों को प्याज के छिलके की तरह उकेरकर तह में छिपे उसके वास्तविक चेहरे को पाठकों के सामने पेश कर देते हैं। ‘बड़प्पन-छुटपन’ ऐसी ही कहानी है। उनकी कहानियाँ व्यक्ति मनोविज्ञान के साथ सामाजिक और समूह मनोविज्ञान का अनुभवजन्य आख्यान भी हैं। वे शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह की संवेदना के चितेरे कथाकार हैं। वे वहाँ के सामाजिक परिवेश, स्थिति-परिस्थति और संघर्ष के स्याह-सफेद पक्षों को आमने-सामने रखकर निर्णय के लिए पाठक को स्वतंत्र छोड़ देते हैं। वे समाज के तलहट में जीवनयापन करने वाले लोगों के जीवन के उस क्रूर और विकृत यथार्थ का दस्तावेजीकरण करते हैं, जो इससे पहले हिन्दी कथा संसार में लगभग अनुपस्थित था। उनकी कहानियाँ हर तरह के भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम छेड़ती हैं। उनकी कहानी ‘ठठरी’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। कहानियाँ उनका अनुभवजन्य यथार्थ बनकर लोगों को संवेदित-उद्वेलित करती हैं, जिनमें देशज भाषा की छौंक सुगन्ध की तरह व्याप्त है। कहानियों का शिल्प बेहद चुस्त है। ‘फरिश्ते’ की कहानियाँ किसी वाद या आन्दोलन से न जुड़कर स्वतंत्रचेता लेखन की राह चलती हैं। इसलिए पाठक से तादात्म्य स्थापित कर उसे अलग तरह का पाठकीय आस्वाद प्रदान करती हैं।
—विनय दास
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