Ajneya Ki Lokpriya Kahaniyan
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कुशीनगर (देवरिया) में सन् 1911 में जन्म। पहले बारह वर्ष की शिक्षा पिता (डॉ. हीरानंद शास्त्री) की देख-रेख में घर ही पर। आगे की पढ़ाई मद्रास और लाहौर में। एम.ए. अंग्रेजी में प्रवेश, किंतु तभी देश की आजादी के लिए एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल होना। शिक्षा में बाधा तथा सन् ’30 में बम बनाने के आरोप में गिरफ्तारी। जेल में रहकर ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना। क्रमशः सन् ’36-37 में ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’ का संपादन। सन् ’43 से ’46 तक ब्रिटिश सेना में भर्ती। सन् ’47-50 तक ऑल इंडिया रेडियो में काम। सन् ’43 में ‘तार सप्तक’ का प्रवर्तन और संपादन। क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे सप्तक का संपादन। ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘वाक्’, ‘एवरीमैन’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से पत्रकारिता में नए प्रतिमानों की सृष्टि। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ, जिनसे भारतीय सभ्यता की सूक्ष्म पहचान और पकड़, विदेश में भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्यापन। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, जिनमें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ सन् ’79, यूगोस्लाविया का अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान ‘गोल्डन रीथ’ सन् ’83 भी शामिल। सन् ’80 से वत्सल निधि के संस्थापन और संचालन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के बोध निर्माण में कई नए प्रयोग। अज्ञेय का संपूर्ण रचना-संसार डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में प्रकाशित है।
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कुशीनगर (देवरिया) में सन् 1911 में जन्म। पहले बारह वर्ष की शिक्षा पिता (डॉ. हीरानंद शास्त्री) की देख-रेख में घर ही पर। आगे की पढ़ाई मद्रास और लाहौर में। एम.ए. अंग्रेजी में प्रवेश, किंतु तभी देश की आजादी के लिए एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल होना। शिक्षा में बाधा तथा सन् ’30 में बम बनाने के आरोप में गिरफ्तारी। जेल में रहकर ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना। क्रमशः सन् ’36-37 में ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’ का संपादन। सन् ’43 से ’46 तक ब्रिटिश सेना में भर्ती। सन् ’47-50 तक ऑल इंडिया रेडियो में काम। सन् ’43 में ‘तार सप्तक’ का प्रवर्तन और संपादन। क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे सप्तक का संपादन। ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘वाक्’, ‘एवरीमैन’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से पत्रकारिता में नए प्रतिमानों की सृष्टि।
देश-विदेश की अनेक यात्राएँ, जिनसे भारतीय सभ्यता की सूक्ष्म पहचान और पकड़, विदेश में भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्यापन। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, जिनमें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ सन् ’79, यूगोस्लाविया का अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान ‘गोल्डन रीथ’ सन् ’83 भी शामिल। सन् ’80 से वत्सल निधि के संस्थापन और संचालन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के बोध निर्माण में कई नए प्रयोग।
अज्ञेय का संपूर्ण रचना-संसार डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में प्रकाशित है।
Book Details
-
ISBN9789390101740
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
मेहनतकश लोगों के सुख-दुख, राग-द्वेष, हँसी-ख़ुशी, जिजीविषा और उनके जीवन के तमाम अनुभवों से भरी कहानियों का संग्रह है—‘सुनहरी उँगलियाँ’। हमारे शानदार अतीत की सुन्दर व भव्य निशानियों से सजी हमारी यह दुनिया हमें प्रेरणा देती है कि जीवन सदैव बहता है, इनसान आता और चला जाता है लेकिन जीवन के इस प्रवाह के बीच मेहनतकशों के हुनर और कारीगरी की रचनात्मक उपलब्धियाँ हमेशा बची रहती है। हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँजोते आ रहे हैं।
इस संग्रह की कहानियों में कई ऐसे किरदार हैं जिनके हाथों में बेहतरीन हुनर है। ‘आँचल के बीज’ और ‘सुनहरी उँगलियाँ’ शीर्षक कहानियों के साथ-साथ ‘शीराज़ लोहार’, ‘फुलवा’ जैसी कहानियों में ऐसे ही कुछ ज़िन्दादिल किरदार हैं जो हिन्दुस्तान की सामासिक संस्कृति को उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त संग्रह की कई कहानियों में जटिल सामाजिक संरचना पाठकों को किरदारों की ज़िन्दादिली के क़रीब ले जाती है। ऐसी कहानियों में ‘अलाव’, ‘सबूत’, ‘फ़ितरत’, ‘क्रोशिया के फंदे’, ‘ख़ौफ़’, ‘रामपुरी चाकू’ आदि उल्लेखनीय हैं। नासिरा शर्मा की कहानियों में भारतीय मानस की जटिलताओं का संवाद मानवीय रिश्तों की पारिवारिक संरचना के साथ आत्मसात हो जाता है और यहीं से गंगा-जमुनी तहजीब की पकड़ से ‘सदाबहार का फूल’, ‘स्वर्ग व नर्क का फ़ासला’, ‘ईदी’, ‘नये रंग की गन्ध’, ‘हथेली में पोखर’ जैसी कहानियाँ बन पड़ती हैं जो सामाजिक सौहार्द का निर्वाह करती हैं।
बीस साल बाद आ रहा नासिरा शर्मा का यह कहानी-संग्रह बीते समय की सामाजिक हलचलों की अक्कासी करता है और इन कहानियों का कथानक-शिल्प एवं कथा-भाषा का प्रवाह उनके पाठकों के लिए एक उपहार है।
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