Antaheen
(0)
Author:
Ramesh Pokhariyal 'Nishank'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
450
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Available
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कहानियाँ हमारे आसपास बिखरी होती हैं। उन्हें तलाशने के लिए दूर की कौड़ी नहीं लानी पड़ती। एक पारखी निगाह और संवेदनशील मन इनकी शिनाख़्त कर लेता है। ‘अन्तहीन’ कहानी-संग्रह में शामिल रचनाएँ इस बात को साबित करती हैं। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने ज़िन्दगी के खुरदुरे धरातल पर खड़ी सच्चाइयों को अपनी कहानियों में आवाज़ दी है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि ‘निशंक’ की अनेक कहानियाँ हाशिये का जीवन जी रहे लोगों की व्यथा-कथा हैं। ग़रीबी, रिश्तों में घुसता बाज़ारवाद, स्त्रियों से जुड़े कई प्रश्न, परिस्थितियों की विडम्बना आदि से ‘निशंक’ ने कथा-सूत्र एकत्र किए हैं। सूत्रों का विस्तार करते हुए वे पाठकों को कल्पना की भूलभुलैया में भटकाते नहीं। सीधी सरल सादगी से भरी भाषा शैली में अपनी बात कह जाते हैं। ‘गेहूँ के दाने’ इस सन्दर्भ में पठनीय है। मध्यवर्गीय कश-म-कश को भी लेखक ने लक्षित किया है। ‘कैसे सम्बन्ध’ और ‘दहलीज़’ सरीखी कहानियों से पता चलता है कि अभी तक जाने कितनी वर्जनाएँ प्रगति का रास्ता रोककर खड़ी हैं। ‘फिर ज़िन्दा कैसे' कहानी के नायक सुनील का पागलपन अन्दर तक झकझोर देता है। ‘अन्तहीन’ की कहानियाँ जीवन के अँधेरे और उजाले की गवाहियाँ हैं।
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कहानियाँ हमारे आसपास बिखरी होती हैं। उन्हें तलाशने के लिए दूर की कौड़ी नहीं लानी पड़ती। एक पारखी निगाह और संवेदनशील मन इनकी शिनाख़्त कर लेता है। ‘अन्तहीन’ कहानी-संग्रह में शामिल रचनाएँ इस बात को साबित करती हैं। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने ज़िन्दगी के खुरदुरे धरातल पर खड़ी सच्चाइयों को अपनी कहानियों में आवाज़ दी है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि ‘निशंक’ की अनेक कहानियाँ हाशिये का जीवन जी रहे लोगों की व्यथा-कथा हैं। ग़रीबी, रिश्तों में घुसता बाज़ारवाद, स्त्रियों से जुड़े कई प्रश्न, परिस्थितियों की विडम्बना आदि से ‘निशंक’ ने कथा-सूत्र एकत्र किए हैं। सूत्रों का विस्तार करते हुए वे पाठकों को कल्पना की भूलभुलैया में भटकाते नहीं। सीधी सरल सादगी से भरी भाषा शैली में अपनी बात कह जाते हैं। ‘गेहूँ के दाने’ इस सन्दर्भ में पठनीय है। मध्यवर्गीय कश-म-कश को भी लेखक ने लक्षित किया है। ‘कैसे सम्बन्ध’ और ‘दहलीज़’ सरीखी कहानियों से पता चलता है कि अभी तक जाने कितनी वर्जनाएँ प्रगति का रास्ता रोककर खड़ी हैं। ‘फिर ज़िन्दा कैसे' कहानी के नायक सुनील का पागलपन अन्दर तक झकझोर देता है। ‘अन्तहीन’ की कहानियाँ जीवन के अँधेरे और उजाले की गवाहियाँ हैं।
Book Details
-
ISBN9788183616539
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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फूल वालों की सैर दिल्ली वालों के बीच हमेशा से लोकप्रिय रही है। अकबर शाह सानी के ज़माने में शुरू हुई ये सैर सांस्कृतिक एकता का परिचायक है। इस किताब में बहादुरशाह ज़फ़र के ज़माने की फूल वालों की सैर का नक़्शा खींचा गया है। इस के लेखक मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग हैं, मूल रूप से उर्दू की इस किताब का हिंदी लिप्यंतरण ज़ुबैर सैफ़ी ने किया है। मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग उर्दू के जाने-माने व्यंग्यकार थे। उनक जन्म सन् 1883 में दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम हशमत बेग था। उन्होंने शुरुआती शिक्षा-दीक्षा गर्वनमेंट हाई स्कूल दिल्ली में हासिल की। बी. ए. की डिग्री हासिल करने के बाद वे हैदराबाद में नौकरी करने लगे। वहाँ पर वे न्यायपालिका में अलग-अलग पदों पर रहे। अंत में होम सेक्रेटरी होकर सेवानिवृत्त हुए और पेंशन पाई। हैदराबाद के साहित्यिक माहौल ने मिर्ज़ा की साहित्यिक दृष्टि को ख़ूब निखारा और वो उच्च स्तर के व्यंग्यकार बने। फ़रहतउल्लाह बेग का सबसे पहला व्यंग्य आलेख 'इस्मत बेग' के छद्म नाम से रिसाले 'इफ़ादा' में छपा। उस आलेख का शीर्षक 'हम और हमारा इम्तिहान' था। 27 अप्रैल सन् 1947 को उनकी मृत्यु हो गई। 1993 में गुलावठी (बुलंदशहर) में जन्मे ज़ुबैर सैफ़ी नई पीढ़ी के कवि और गंभीर अध्येता हैं। उनकी कविताएँ सदानीरा, हिंदवी और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से सम्बद्ध हैं।
Peele Kagaj Ki Ujli Ibarat
- Author Name:
Kailash Banwashi
- Book Type:

- Description:
Short Stories
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