Sookhi Ret
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Author:
Jeelani Bano, Surjeet, Zilani BanoPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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जीलानी बानो के उपन्यासों और कहानियों से आज के समय के बदलते जीवन–मूल्यों और सामाजिक अन्तर्विरोधों की जो तस्वीर बनती है, वह बहुत संजीदा तो है ही साथ ही पूरी तरह दोमुँही सोच की असलियत को बेपर्दा करते हुए समाज और जीवन से तआल्लुक़ रखनेवाली हर चीज़ को अपने में शामिल करती चलती है।</p> <p>‘सूखी रेत’ की कहानियाँ स्त्री–जीवन के उस मरुस्थल को भी प्रतिबिम्बित करती हैं, जो सदियों से विस्तारित होता चला आया है और उसकी तपिश और ख़लिश से वह न तो उकताती है और न ही हार मानती है। नारी का यही अन्तर्विरोध एक प्रतिकार बनने से कैसे, कहाँ चूक जाता है, इसी मसले की दास्ताँ है ‘सूखी रेत’, जहाँ ढेर सारे बहलावे हैं और ख़ूब सारे सपने, जो पूरी तरह मृग–मरीचिका बन जाते हैं। वह हमेशा इत्मीनान करती है कि अब पानी पास ही है, वहाँ तक पहुँचने की जद्दोजहद और फिर प्यासे रह जाने की तड़प। लेकिन जीलानी बानो की कहानियों के नारी–पात्र बार–बार प्यासे रह जाने और अपनी तकमील की तलाश के नाकाम हो जाने को अपनी क़िस्मत नहीं मानते, वे सब न तो छिछला विद्रोह करते हैं और न ही अपनी गरिमा से च्युत होते हैं; बस वे सुलग रहे हैं भीतर ही भीतर। इस रेगिस्तान से निकलने की मुकम्मल राह तलाशते हुए।</p> <p>एक उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण कथा-संग्रह।
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जीलानी बानो के उपन्यासों और कहानियों से आज के समय के बदलते जीवन–मूल्यों और सामाजिक अन्तर्विरोधों की जो तस्वीर बनती है, वह बहुत संजीदा तो है ही साथ ही पूरी तरह दोमुँही सोच की असलियत को बेपर्दा करते हुए समाज और जीवन से तआल्लुक़ रखनेवाली हर चीज़ को अपने में शामिल करती चलती है।</p>
<p>‘सूखी रेत’ की कहानियाँ स्त्री–जीवन के उस मरुस्थल को भी प्रतिबिम्बित करती हैं, जो सदियों से विस्तारित होता चला आया है और उसकी तपिश और ख़लिश से वह न तो उकताती है और न ही हार मानती है। नारी का यही अन्तर्विरोध एक प्रतिकार बनने से कैसे, कहाँ चूक जाता है, इसी मसले की दास्ताँ है ‘सूखी रेत’, जहाँ ढेर सारे बहलावे हैं और ख़ूब सारे सपने, जो पूरी तरह मृग–मरीचिका बन जाते हैं। वह हमेशा इत्मीनान करती है कि अब पानी पास ही है, वहाँ तक पहुँचने की जद्दोजहद और फिर प्यासे रह जाने की तड़प। लेकिन जीलानी बानो की कहानियों के नारी–पात्र बार–बार प्यासे रह जाने और अपनी तकमील की तलाश के नाकाम हो जाने को अपनी क़िस्मत नहीं मानते, वे सब न तो छिछला विद्रोह करते हैं और न ही अपनी गरिमा से च्युत होते हैं; बस वे सुलग रहे हैं भीतर ही भीतर। इस रेगिस्तान से निकलने की मुकम्मल राह तलाशते हुए।</p>
<p>एक उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण कथा-संग्रह।
Book Details
-
ISBN9788126702824
-
Pages151
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रेणु ने अपने आत्म-कथ्य में चित्रगुप्त महाराज द्वारा निर्मित भाग्य-लेख के अंशों में अपना परिचय देते हुए कहा है कि यह आदमी ‘एक ही साथ सुर और असुर, सुन्दर और असुन्दर, पापी और विवेकी, दुरात्मा और सन्त, आदमी और साँप, जड़ और चेतन—सब कुछ होगा।’ क्या यही परिचय अपने विविध और विस्तृत रूप में उनकी समस्त रचनाओं में नहीं लहरा रहा है? जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को गतिशील और व्यापक फ़लक प्रदान करनेवाली रेणु की कहानियों ने हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी है—सामाजिक परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है। यह दिशा ही रेणु की रचनाओं की मूल सोच है। बड़े चुपके से कभी उनकी कहानियाँ किसानों और खेत मज़दूरों के कान में कह देती हैं कि ज़मींदारी प्रथा अब नहीं रह सकती और ज़मीन जोतनेवाले की ही होनी चाहिए। कभी मज़दूरों को यह सन्देश देने लगती हैं कि तुम्हारी मुक्ति में ही असली सुराज का अर्थ छिपा है—भूल-भुलैया में पड़ने की जरूरत नहीं। क्या कला, क्या भाषा, क्या अन्तर्वस्तु और विचारधारा, कोई भी कसौटी क्यों न हो, रेणु की कहानियाँ एकदम खरी उतरती हैं, लोगों का रुझान बदल देती हैं और यही रचनात्मक गतिविधि रेणु के साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को अक्षुण्ण बनाती है। ‘अच्छे आदमी’ में संग्रहीत विधित रंगों की ये कहानियाँ रेणु की इसी विशिष्ट रचना-यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
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