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Author:
Chanchal SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
150
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दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की कहानियाँ हिन्दी कहानियों में कुछ नए ढंग का हस्तक्षेप करती हैं। यहाँ बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनका मैं ज़िक्र करना चाहता हूँ, लेकिन दो-तीन कहानियाँ तो अद्भुत हैं। आमतौर पर इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ दो-ढाई पेज से ज़्यादा की नहीं हैं और सबका अपना प्रभाव है। कई कहानियाँ तो इतने नए अनुभव लिए हुए हैं कि हिन्दी कहानी में दुर्लभ हैं।</p> <p>आप ‘ढेढ़-मेढ़े रास्ते’ पढ़िए। आपको लगेगा कि आप एक नए महाभारत से जूझ रहे हैं जहाँ से स्त्री-स्वाभिमान की एक नई दुनिया खुलती है। पारम्परिक स्त्री-विमर्श से अलग यहाँ एक नए तरह का स्त्री-विमर्श है। चौसर पर यहाँ भी स्त्री है लेकिन अबकी स्त्री अपनी देह का फ़ैसला ख़ुद करती है। इसी के उलट ‘कॉल सेंटर’ स्त्री-स्वाधीनता के दुरुपयोग की अनोखी कथा है जो बहुत सीधे-सपाट लहज़े में लिखी गई है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ कहानियों में विविधता बहुत है। यहाँ आप अल्ट्रा मॉड समाज की विसंगतियों की कथा पाएँगे तो बिलकुल निचले तबक़े के अनोखे अनुभव भी, जो बिना यथार्थ अनुभव के सम्भव नहीं हैं। जैसे एक कहानी है—‘कच्चे-पक्के आशियाने’। यह कहानी ग़रीबी रेखा से नीचे जीनेवाले बच्चों की कहानी है जहाँ एक लड़की सिर्फ़ जीने के लिए अपनी देह का सौदा करती है। इसका अन्त तो अद्भुत है जब देह बेचनेवाली लड़की उस पर आरोप लगानेवाले सम्भ्रान्त मेहता से उनकी पत्नी के सामने कहती है कि मेहता साहब, आपके पाँच सौ रुपए मुझ पर बाक़ी हैं, आपकी बीवी को दे दूँगी। कहानी यहाँ सम्भ्रान्त समाज के पाखंड पर एक करारा तमाचा बन जाती है।</p> <p>कुल मिलाकर दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की ये कहानियाँ इसलिए भी पढ़ी जानी चाहिए</p> <p>कि इन्होंने हिन्दी कथा को कुछ नए और अनूठे अनुभव दिए हैं।</p> <p>—शशिभूषण द्विवेदी</p> <p>
Read moreAbout the Book
दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की कहानियाँ हिन्दी कहानियों में कुछ नए ढंग का हस्तक्षेप करती हैं। यहाँ बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनका मैं ज़िक्र करना चाहता हूँ, लेकिन दो-तीन कहानियाँ तो अद्भुत हैं। आमतौर पर इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ दो-ढाई पेज से ज़्यादा की नहीं हैं और सबका अपना प्रभाव है। कई कहानियाँ तो इतने नए अनुभव लिए हुए हैं कि हिन्दी कहानी में दुर्लभ हैं।</p>
<p>आप ‘ढेढ़-मेढ़े रास्ते’ पढ़िए। आपको लगेगा कि आप एक नए महाभारत से जूझ रहे हैं जहाँ से स्त्री-स्वाभिमान की एक नई दुनिया खुलती है। पारम्परिक स्त्री-विमर्श से अलग यहाँ एक नए तरह का स्त्री-विमर्श है। चौसर पर यहाँ भी स्त्री है लेकिन अबकी स्त्री अपनी देह का फ़ैसला ख़ुद करती है। इसी के उलट ‘कॉल सेंटर’ स्त्री-स्वाधीनता के दुरुपयोग की अनोखी कथा है जो बहुत सीधे-सपाट लहज़े में लिखी गई है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ कहानियों में विविधता बहुत है। यहाँ आप अल्ट्रा मॉड समाज की विसंगतियों की कथा पाएँगे तो बिलकुल निचले तबक़े के अनोखे अनुभव भी, जो बिना यथार्थ अनुभव के सम्भव नहीं हैं। जैसे एक कहानी है—‘कच्चे-पक्के आशियाने’। यह कहानी ग़रीबी रेखा से नीचे जीनेवाले बच्चों की कहानी है जहाँ एक लड़की सिर्फ़ जीने के लिए अपनी देह का सौदा करती है। इसका अन्त तो अद्भुत है जब देह बेचनेवाली लड़की उस पर आरोप लगानेवाले सम्भ्रान्त मेहता से उनकी पत्नी के सामने कहती है कि मेहता साहब, आपके पाँच सौ रुपए मुझ पर बाक़ी हैं, आपकी बीवी को दे दूँगी। कहानी यहाँ सम्भ्रान्त समाज के पाखंड पर एक करारा तमाचा बन जाती है।</p>
<p>कुल मिलाकर दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की ये कहानियाँ इसलिए भी पढ़ी जानी चाहिए</p>
<p>कि इन्होंने हिन्दी कथा को कुछ नए और अनूठे अनुभव दिए हैं।</p>
<p>—शशिभूषण द्विवेदी</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9789387462625
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
यह परसाई की शुरुआती रचनाओं का संकलन है। कह सकते हैं कि इस दौर की अपने लेखन में वे भाषा के स्तर पर अपनी राह बना रहे थे, और अपने व्यंग्य की धार को भी परख रहे थे। लेकिन यह देखकर आश्चर्य होता है कि समाज और राजनीति को लेकर उनकी समझ तब भी उतनी ही साफ़ थी।
इस संग्रह में शामिल ‘भेड़ें और भेड़िये’, ‘गो-भक्ति’, ‘देव-भक्ति’ और ‘रासलीला’ जैसी कहानियाँ हैं जो धर्म के स्वार्थ-आधारित दुरुपयोग के ख़तरों के प्रति हमें आगाह करती है। रोज़गार और जीवन-यापन के संघर्ष, मध्यवर्ग का पाखंड और स्त्री-स्वाधीनता जैसे प्रश्न इन रचनाओं में उतनी ही तीव्रता से आते हैं, जिस तरह उनकी बाद की रचनाओं में, लेकिन आज़ादी के फ़ौरन बाद वाले दशक में इन अवरोधों को देख पाना अपने आप में एक उपलब्धि है।
संग्रह में शामिल ‘बाबू की बदली’ शीर्षक कहानी ने अपने समय में काफ़ी हलचल पैदा की थी, परसाई पर स्त्री की गुलामी का समर्थन करने तक के आरोप लगे थे, जिनका उत्तर वे यहाँ संकलित ‘अपनी बात’ में देते हैं। अपने व्यंग्य की तीक्ष्णता के सन्दर्भ में उनका कहना है कि चट्टान-सी बुराई पर अगर कोई सुनार की छोटी हथौड़ी से प्रहार करे, तो यह उसकी नासमझी ही कही जाएगी।
अच्छा हुआ कि उन्होंने शुरू से ही घन का इस्तेमाल किया और हमें उन जैसा व्यंग्यकार मिला।
Mr. Kanoonwalla's Chamber
- Author Name:
Apoorv Agarwal
- Book Type:

- Description: कहीं सत्य और न्याय की जीत, कहीं चरमराई हुई व्यवस्था की हार! जुर्म, जुल्म, क़ानून और सज़ा की आग धधकती आँधी में झूलती-झुलसती ज़िन्दगियाँ! हुस्न, आशिकी, प्रेम, सेक्स, दोस्ती, वैर-वैमनस्य, षड्यंत्र, पश्चात्ताप, आइडेंटिटी-थैप्ट, मर्डर के अस्त्रों और बेड़ियों से बँधी क्रिमिनल लॉ और जस्टिस की क्लासिकल रहस्यमयी-रोमांचक कहानियाँ, जिनमें न्याय-तंत्र की बीते सौ सालों की तस्वीरें हमारे सामने ख़ुद-ब-ख़ुद ज़िन्दा खड़ी हो जाती हैं।
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