Raat Din
About the book
विष्णु नागर का यह पाँचवाँ कहानी-संग्रह है ‘रात-दिन’। कविता और व्यंग्य की दुनिया में जितने वह सक्रिय हैं, उतने ही कहानी की दुनिया में भी। उनका यह कहानी-संग्रह इस मायने में दूसरों से बहुत भिन्न है कि इसकी चंदेक कहानियों को छोड़कर लगभग सारी कहानियों-लघुकथाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है। वह चाहे ‘प्रेम-कहानियाँ’ हो या ‘पापा मैं ग़रीब बनूँगा’ हो या ‘भगत सिंह बिल्डर्स’ हो या ‘साले तू किसकी इजाज़त से मरा’ है। वह चाहे प्रेम-प्रसंग हो, शैतान के अच्छा आदमी दीखने की कोशिश हो या जीवन-भर भ्रष्टाचार और काहिली के बाद सत्य और न्याय के पथ पर चलने की कोशिश करनेवाले ढोंगी और कायर बूढ़े हों, करियर और पैसे के पीछे भागते लोग हों या साम्प्रदायिक शक्तियाँ हों या गाँव और देश से बनावटी प्रेम करनेवाले लोग हों या महात्मा गांधी के नाम पर तरह-तरह के धन्धे करनेवाले लोग हों—सभी उनकी कहानियों का विषय बनते हैं। यहाँ तक कि सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के प्रति शोकाकुल मित्र के प्रेम को भी उन्होंने व्यंग्यात्मक अन्दाज़ में व्यक्त किया है। यह व्यंग्य, व्यंग्य-विनोदवाला नहीं है—यह चुभता है, गड़ता है, परेशान करता है, उत्तेजित करता है, विकल करता है। हमेशा की तरह दिलचस्प और पठनीय विष्णु नागर के इस संग्रह में ‘भटकनेवाला आदमी’, ‘बेटा और माँ’, ‘बचपन के पहाड़’, ‘दयालु पागल’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो एक तरह से कहानी होकर भी कविता हैं और कविता होकर भी कहानी हैं। वे कहानी में कविता और व्यंग्य की ताक़त के साथ आते हैं और कविता में कहानी और व्यंग्य की शक्ति के साथ और उनका व्यंग्य, कविता भी होता है, कहानी भी, निबन्ध भी, राजनीतिक टिप्पणी भी। बहरहाल यह कहानी-संग्रह आपके हाथों में है और यह परखने का मौक़ा देगा कि जो कहा गया। वह कितना सच है। विश्वास है कि यह सब कुछ आपको सच लगेगा।
Read more₹
395
316 20% off
Available
Format
About the Book
विष्णु नागर का यह पाँचवाँ कहानी-संग्रह है ‘रात-दिन’। कविता और व्यंग्य की दुनिया में जितने वह सक्रिय हैं, उतने ही कहानी की दुनिया में भी। उनका यह कहानी-संग्रह इस मायने में दूसरों से बहुत भिन्न है कि इसकी चंदेक कहानियों को छोड़कर लगभग सारी कहानियों-लघुकथाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है। वह चाहे ‘प्रेम-कहानियाँ’ हो या ‘पापा मैं ग़रीब बनूँगा’ हो या ‘भगत सिंह बिल्डर्स’ हो या ‘साले तू किसकी इजाज़त से मरा’ है। वह चाहे प्रेम-प्रसंग हो, शैतान के अच्छा आदमी दीखने की कोशिश हो या जीवन-भर भ्रष्टाचार और काहिली के बाद सत्य और न्याय के पथ पर चलने की कोशिश करनेवाले ढोंगी और कायर बूढ़े हों, करियर और पैसे के पीछे भागते लोग हों या साम्प्रदायिक शक्तियाँ हों या गाँव और देश से बनावटी प्रेम करनेवाले लोग हों या महात्मा गांधी के नाम पर तरह-तरह के धन्धे करनेवाले लोग हों—सभी उनकी कहानियों का विषय बनते हैं। यहाँ तक कि सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के प्रति शोकाकुल मित्र के प्रेम को भी उन्होंने व्यंग्यात्मक अन्दाज़ में व्यक्त किया है। यह व्यंग्य, व्यंग्य-विनोदवाला नहीं है—यह चुभता है, गड़ता है, परेशान करता है, उत्तेजित करता है, विकल करता है।
हमेशा की तरह दिलचस्प और पठनीय विष्णु नागर के इस संग्रह में ‘भटकनेवाला आदमी’, ‘बेटा और माँ’, ‘बचपन के पहाड़’, ‘दयालु पागल’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो एक तरह से कहानी होकर भी कविता हैं और कविता होकर भी कहानी हैं। वे कहानी में कविता और व्यंग्य की ताक़त के साथ आते हैं और कविता में कहानी और व्यंग्य की शक्ति के साथ और उनका व्यंग्य, कविता भी होता है, कहानी भी, निबन्ध भी, राजनीतिक टिप्पणी भी।
बहरहाल यह कहानी-संग्रह आपके हाथों में है और यह परखने का मौक़ा देगा कि जो कहा गया। वह कितना सच है। विश्वास है कि यह सब कुछ आपको सच लगेगा।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2008
- Weight
- 284 grams
- ISBN-13
- 9788126715404
- Pages
- 176
- Reading time
- ~6 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
Customer reviews
Be the first to write a review
Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

