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Anugoonj Zindagi Ki

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कुसुम खेमानी अपने कथा-साहित्य के लिए मनुष्य के परिष्कार से समाज-संस्कृति का परिष्कार और समाज-संस्कृति के परिष्कार से मनुष्य के परिष्कार का विधान और वितान जिस कलात्मकता से रचती हैं, वह अद्भुत ही नहीं, विलक्षण है। विलक्षण है एक पुरुष के भीतर एक स्त्री और एक स्त्री के भीतर एक पुरुष का अपने समय की विघटन-प्रक्रिया में द्वन्द्वात्मक अन्वेषण और उसका रचा जाना। घर-परिवार से अछूता संसार कोई संसार नहीं होता, अगर होता है तो वह कुसुम खेमानी का नहीं है। उनका यह कथा-संग्रह 'अनुगूँज जि़न्दगी की’ घर-परिवार और उससे जुड़े तमाम रिश्तों का ऐसा कथा-संसार है जो अपनी ज़मीन पर अपनी जड़ों के साथ है। इसके बावजूद अपनी हज़ारों क़ि‍स्म की विसंगतियों और विडम्बनाओं से तो घिरा ही है, ऊपर से बदलते युग में न तो पूरी तरह आधुनिक हो पा रहा, न उत्तर-आधुनिक। कुसुम खेमानी इन्हीं जटिलताओं से कथा में टकराती हैं और टकराते हुए कई बार जोखिम भी उठाती हैं। निस्सन्देह, इस संग्रह की उपस्थिति एक ऐसी उपस्थिति है जिससे हिन्दी कथा-साहित्य में जीवन, प्रेम और उसके मूल्य; संघर्ष, सम्पूर्णता और उसकी चेतना जिस संवेदन-सघनता की सृष्टि रचते हैं, वह सृष्टि अपने संश्लिष्ट यथार्थ की ज़मीन पर अपने लोक और उसकी स्मृतियों की उम्मीद के साथ दर्ज होती है।

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कुसुम खेमानी अपने कथा-साहित्य के लिए मनुष्य के परिष्कार से समाज-संस्कृति का परिष्कार और समाज-संस्कृति के परिष्कार से मनुष्य के परिष्कार का विधान और वितान जिस कलात्मकता से रचती हैं, वह अद्भुत ही नहीं, विलक्षण है। विलक्षण है एक पुरुष के भीतर एक स्त्री और एक स्त्री के भीतर एक पुरुष का अपने समय की विघटन-प्रक्रिया में द्वन्द्वात्मक अन्वेषण और उसका रचा जाना।

घर-परिवार से अछूता संसार कोई संसार नहीं होता, अगर होता है तो वह कुसुम खेमानी का नहीं है। उनका यह कथा-संग्रह 'अनुगूँज जि़न्दगी की’ घर-परिवार और उससे जुड़े तमाम रिश्तों का ऐसा कथा-संसार है जो अपनी ज़मीन पर अपनी जड़ों के साथ है। इसके बावजूद अपनी हज़ारों क़ि‍स्म की विसंगतियों और विडम्बनाओं से तो घिरा ही है, ऊपर से बदलते युग में न तो पूरी तरह आधुनिक हो पा रहा, न उत्तर-आधुनिक। कुसुम खेमानी इन्हीं जटिलताओं से कथा में टकराती हैं और टकराते हुए कई बार जोखिम भी उठाती हैं।

निस्सन्देह, इस संग्रह की उपस्थिति एक ऐसी उपस्थिति है जिससे हिन्दी कथा-साहित्य में जीवन, प्रेम और उसके मूल्य; संघर्ष, सम्पूर्णता और उसकी चेतना जिस संवेदन-सघनता की सृष्टि रचते हैं, वह सृष्टि अपने संश्लिष्ट यथार्थ की ज़मीन पर अपने लोक और उसकी स्मृतियों की उम्मीद के साथ दर्ज होती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2015
Weight
290 grams
ISBN-13
9788126727858
Pages
128
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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