Kahaniyan Rishton Ki : Gaon-Ghar
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Author:
Pankaj Mitra, AkhileshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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हिन्दी में गाँव-घर या जड़ों से लगाव की बहुत सारी कहानियाँ लिखी गई हैं और अभी भी लिखी जा रही हैं; क्योंकि जड़ों से लगाव ही तो देता है जीवन और स्थायित्व। आज जब आभासी यथार्थ ने व्यक्ति को सचमुच के यथार्थ से दूर और जड़ों से अलग कर दिया है, ऐसे समय में इस संचयन की ज़रूरत और ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हिन्दी कहानी की लोकधर्मी परम्परा का ध्यान रखते हुए चुनी हुई इन कहानियों को पढ़कर हम अपने अतीत की आत्म-मुग्धता के शिकार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से सजग प्रेम के प्रति जागरूक होते हैं।
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About the Book
हिन्दी में गाँव-घर या जड़ों से लगाव की बहुत सारी कहानियाँ लिखी गई हैं और अभी भी लिखी जा रही हैं; क्योंकि जड़ों से लगाव ही तो देता है जीवन और स्थायित्व। आज जब आभासी यथार्थ ने व्यक्ति को सचमुच के यथार्थ से दूर और जड़ों से अलग कर दिया है, ऐसे समय में इस संचयन की ज़रूरत और ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हिन्दी कहानी की लोकधर्मी परम्परा का ध्यान रखते हुए चुनी हुई इन कहानियों को पढ़कर हम अपने अतीत की आत्म-मुग्धता के शिकार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से सजग प्रेम के प्रति जागरूक होते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126725496
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी कहानी को जिन लेखकों ने अपनी रचनाशीलता से समृद्ध किया है, उनमें पंकज मित्र का नाम प्रमुख है। एक ख़ास तरह की देशज स्थानीयता के साथ वे ज़िन्दगी के तमाम रंगों को प्रकट कर देते हैं।
‘ज़िद्दी रेडियो’ पंकज मित्र का नया कहानी-संग्रह है। इसकी 10 कहानियाँ भारतीय समाज के वर्तमान की गहरी पड़ताल करती हैं। विशेषकर भूमंडलीकरण और उन्मुक्त पूँजीवाद के बाद परिवार से बाज़ार तक रिश्तों के बदलते समीकरणों पर लेखक ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है। अपने स्वभाव और बचे-खुचे जीवन के लिए ज़िद करते स्वप्नमय बाबू, क़र्ज़ की दहशत और उसके लोलुप आकर्षण के मारे बिलौटी महतो, ऊलजुलूल जीवन में उलझे बंटी, बबली, विचित्र विस्थापन के शिकार अनिकेत बाबू—ऐसे अनेक चरित्रों से सम्पन्न ये कहानियाँ आम आदमी का सच्चा चित्रण करती हैं।
पंकज मित्र इन कहानियों के ज़रिए कुछ ज़रूरी बहसें उठाते हैं। फिर भी, कहीं भी ऊपरी सतह पर तैरती सैद्धान्तिकी यहाँ नज़र नहीं आती। सहज सरस भाषा, आंचलिकता जिसका प्रभावी गुण है, में लिखी ये कहानियाँ पाठक को नई शताब्दी की सक्रिय सामाजिकता के बीच ला खड़ा करती हैं।
Maqbool Fida Husain : Jivani Aur Vichar
- Author Name:
Akhilesh +1
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मक़बूल फ़िदा हुसेन समकालीन भारतीय चित्रकला के अकेले ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने समकालीनता को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलवाई और जीवन-भर इस दिशा में काम किया। प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेख उनकी इसी जीवटता, समर्पण, दूरदृष्टि और अथक परिश्रम को रेखांकित करते हैं। वे न सिर्फ़ सक्रिय रहे, बल्कि उन्होंने अनेक चित्रकारों को प्रेरित भी किया। युवा चित्रकारों के लिए आज भी वे प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। उनकी चुम्बकीय उपस्थिति, उनका बेफ़िक्राना अन्दाज़, उनके सरोकार आदि सभी इतने व्यापक और पारम्परिक रहे कि उनमें आधुनिकता अपने उच्चतम रूप में प्रकट होती है। हुसेन के चित्रों को यदि एक वाक्य में परिभाषित किया जाए तो वह कुछ इस तरह का हो सकता है— “परम्परा अपनी आधुनिकता को हुसेन के चित्रों में सहजता से प्रकट करती है।” हुसेन पर लिखे गए इन लेखों को एक जगह एकत्र करने के पीछे मेरी मंशा यह भी रही है कि अलग-अलग समय पर अन्यान्य कारणों से लिखे गए इन निबन्धों में हुसेन की बहुमुखी प्रतिभा का स्वाद पाठकगण ले सकें। हुसेन निश्चित ही देश-काल, धर्म-विधर्म से परे अपनी रचनात्मकता में डूबे एक सच्चे कलाकार थे जिन्होंने जीवन-भर अपने को कसौटी पर कसे रखा। वे सक्रियता के पर्याय थे।
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
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ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
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पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
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